चिंतन — अध्याय–26 : सत्य क्या है? — भाग–6 : बौद्ध, जैन तथा कश्मीर शैव दर्शन में सत्य

 चिंतनअध्याय–26 : सत्य क्या है? — भाग–6 : बौद्ध, जैन तथा कश्मीर शैव दर्शन में सत्य

भारतीय दर्शन का सबसे बड़ा सौन्दर्य यह है कि यहाँ सत्य को किसी एक मत, एक पुस्तक या एक परम्परा तक सीमित नहीं किया गया। यदि वेदान्त ने सत्य को ब्रह्म की दृष्टि से समझाया, तो बौद्ध दर्शन ने उसी प्रश्न को दुःख, अनित्यता और शून्यता के परिप्रेक्ष्य में देखा। जैन दर्शन ने कहा कि किसी भी वस्तु का सम्पूर्ण सत्य एक ही दृष्टिकोण से नहीं जाना जा सकता, जबकि कश्मीर शैव दर्शन ने सम्पूर्ण जगत् को शिव-चेतना की अभिव्यक्ति मानकर सत्य की एक अद्वितीय व्याख्या प्रस्तुत की।

इन तीनों परम्पराओं में मतभेद अवश्य हैं, परन्तु एक गहरी समानता भी हैसत्य केवल मान लेने की वस्तु नहीं है; उसे समझना, अनुभव करना और उसके अनुसार जीना आवश्यक है।

 

बौद्ध दर्शन : सत्य का प्रारम्भ दुःख की स्वीकृति से

भगवान बुद्ध ने अपने उपदेशों का आरम्भ किसी ईश्वर, आत्मा या ब्रह्म की चर्चा से नहीं किया। उन्होंने जीवन के सबसे प्रत्यक्ष अनुभव से प्रारम्भ किया

दुःख।

उनके अनुसार सत्य की खोज कल्पना से नहीं, बल्कि जीवन की वास्तविकता को स्वीकार करने से आरम्भ होती है।

इसीलिए बुद्ध का प्रथम उपदेश चार आर्य सत्यों (चत्वारि आर्यसत्यानि) पर आधारित है।

 चार आर्य सत्य

. दुःख - जीवन में दुःख है।

जन्म, जरा, व्याधि, मृत्यु, प्रिय से वियोग, अप्रिय से संयोग तथा इच्छाओं की अपूर्णताये सभी दुःख के रूप हैं।

बुद्ध का उद्देश्य निराशावाद नहीं था; वे केवल जीवन की वास्तविक स्थिति को स्वीकार करने का आग्रह कर रहे थे।

. दुःख का कारण - दुःख का कारण तृष्णा (तन्हा) है।

वस्तुओं, सम्बन्धों, विचारों और स्वयं अपने अहंकार से आसक्ति मनुष्य को बाँधती है।

. दुःख का निरोध -यदि कारण समाप्त हो सकता है, तो दुःख भी समाप्त हो सकता है।

यही निर्वाण की सम्भावना है।

. दुःख निरोध का मार्ग -अष्टाङ्गिक मार्ग

सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प, सम्यक वाक्, सम्यक कर्म, सम्यक आजीविका, सम्यक प्रयास, सम्यक स्मृति, सम्यक समाधि

यह केवल नैतिक आचरण नहीं, बल्कि सत्य को देखने की चेतना का प्रशिक्षण है।

बौद्ध दर्शन में द्विसत्य सिद्धान्त

महायान बौद्ध दर्शन, विशेषकर नागार्जुन के माध्यम से, सत्य की एक अत्यन्त सूक्ष्म व्याख्या प्रस्तुत करता है।

उन्होंने दो स्तरों के सत्य की चर्चा की

संवृति सत्य (व्यवहारिक सत्य)

जिस संसार में हम रहते हैं, भाषा का उपयोग करते हैं, सम्बन्ध बनाते हैं और व्यवहार करते हैं, वह संवृति सत्य है।

यह असत्य नहीं है, किन्तु अंतिम भी नहीं है।

परमार्थ सत्य

जब वस्तुओं को उनके स्वभाव (स्वभाव-शून्यता) से देखा जाता है, तब ज्ञात होता है कि वे स्वतन्त्र एवं स्थायी सत्ता नहीं रखतीं।

यही परमार्थ सत्य है।

नागार्जुन लिखते हैंद्वे सत्ये समुपाश्रित्य बुद्धानां धर्मदेशना। लोकसंवृतिसत्यं सत्यं परमार्थतः॥

अर्थात्बुद्ध का सम्पूर्ण उपदेश दो सत्यों पर आधारित है

व्यवहारिक सत्य और परमार्थ सत्य।

शून्यता : असत्य नहीं, परस्पर निर्भरता

शून्यता का अर्थ प्रायः "कुछ भी नहीं" समझ लिया जाता है, जो कि एक गंभीर भ्रान्ति है।

बौद्ध दर्शन में शून्यता का अर्थ है

कोई भी वस्तु स्वतंत्र, स्थायी और स्वयंसिद्ध सत्ता नहीं रखती।

सब कुछ परस्पर सम्बन्धों के कारण अस्तित्व में है।

इस प्रकार शून्यता, अस्तित्व का निषेध नहीं, बल्कि उसकी परस्पर निर्भरता (Dependent Origination) का दार्शनिक विश्लेषण है।

जैन दर्शन : अनेकान्तवाद

यदि बौद्ध दर्शन सत्य को दो स्तरों में देखता है, तो जैन दर्शन कहता हैसत्य बहुआयामी है।

किसी भी वस्तु को केवल एक दृष्टि से नहीं समझा जा सकता।

इसी सिद्धान्त को अनेकान्तवाद कहा जाता है।

महावीर का आग्रह था कि सत्य का कोई भी कथन आंशिक होता है।

मनुष्य सीमित दृष्टि से देखता है।

इसलिए मतभेद का अर्थ यह नहीं कि दूसरा व्यक्ति अनिवार्य रूप से असत्य कह रहा है।

संभव है कि वह उसी सत्य का दूसरा पक्ष देख रहा हो।

अन्धों और हाथी की कथा

अनेकान्तवाद को समझाने के लिए प्रसिद्ध उदाहरण दिया जाता है

कुछ अन्धे व्यक्तियों ने हाथी को छुआ।

जिसने सूँड़ पकड़ी, उसने कहाहाथी साँप जैसा है।

जिसने पैर पकड़ा, उसने कहाहाथी खम्भे जैसा है।

जिसने कान छुआ, उसने कहाहाथी पंख जैसा है।

सभी आंशिक रूप से सही थे। किन्तु कोई भी सम्पूर्ण सत्य नहीं जानता था।

जैन दर्शन का निष्कर्ष हैआंशिक सत्य को पूर्ण सत्य मान लेना ही विवाद का मूल कारण है।

स्याद्वाद : सत्य की सापेक्ष अभिव्यक्ति

अनेकान्तवाद का व्यावहारिक रूप हैस्याद्वाद।

"स्यात्" का अर्थ हैकिसी दृष्टि से।

उदाहरण

  • किसी दृष्टि से यह है।
  • किसी दृष्टि से यह नहीं है।
  • किसी दृष्टि से यह है भी और नहीं भी।

इसका उद्देश्य भ्रम उत्पन्न करना नहीं, बल्कि यह स्मरण कराना है कि भाषा सीमित है और वास्तविकता बहुआयामी।

स्याद्वाद बौद्धिक विनम्रता का दर्शन है।

कश्मीर शैव दर्शन : सत्य ही चेतना है

कश्मीर शैव दर्शन सत्य को एक अत्यन्त सकारात्मक रूप में प्रस्तुत करता है।

इसके अनुसारसम्पूर्ण जगत् शिव की चेतना का विस्तार है।

यह जगत् भ्रम नहीं, ही केवल दुःख है।

यह चेतना की सृजनात्मक अभिव्यक्ति है।

यहाँ सत्य और चेतना अलग-अलग नहीं हैं।

शिव ही सत्य है, और वही चेतना है।

प्रत्यभिज्ञा : सत्य की पुनः पहचान

कश्मीर शैव दर्शन का प्रसिद्ध सिद्धान्त हैप्रत्यभिज्ञा।

अर्थात्अपने वास्तविक स्वरूप को पुनः पहचानना।

सत्य बाहर से प्राप्त नहीं किया जाता।

वह पहले से ही हमारे भीतर विद्यमान है।

अज्ञान केवल विस्मृति है।

ज्ञान स्मरण है।

यही प्रत्यभिज्ञा है।

 

तीनों दर्शनों का तुलनात्मक अध्ययन

दर्शन

सत्य की मुख्य अवधारणा

बौद्ध

दुःख का यथार्थ ज्ञान और परमार्थ सत्य

जैन

सत्य बहुआयामी है; अनेकान्त

कश्मीर शैव

सत्य शिव-चेतना की सार्वभौमिक अभिव्यक्ति है

तीनों का दृष्टिकोण अलग है।

फिर भी तीनों मनुष्य को अहंकार, अज्ञान और सीमित दृष्टि से मुक्त करना चाहते हैं।

समकालीन सन्दर्भ

आज का विश्व वैचारिक ध्रुवीकरण (Polarisation) से जूझ रहा है।

राजनीति, धर्म, विज्ञान और समाजहर क्षेत्र में लोग अपने मत को अंतिम सत्य मानने लगे हैं।

ऐसे समय में जैन अनेकान्तवाद हमें संवाद की संस्कृति सिखाता है।

बौद्ध दर्शन हमें अपने मानसिक आग्रहों को देखने की शिक्षा देता है।

कश्मीर शैव दर्शन हमें स्मरण कराता है कि विभाजन के पीछे भी चेतना की एकता विद्यमान है।

ये दर्शन केवल इतिहास का विषय नहीं, बल्कि आधुनिक सभ्यता के लिए भी अत्यन्त प्रासंगिक हैं।

इस भाग का निष्कर्ष

बौद्ध, जैन और कश्मीर शैव दर्शन सत्य के तीन भिन्न, किन्तु गहन आयाम प्रस्तुत करते हैं। बौद्ध दर्शन सत्य को अनुभवजन्य यथार्थ और दुःख की स्वीकृति से आरम्भ कर परमार्थ सत्य तक ले जाता है। जैन दर्शन बताता है कि सत्य बहुआयामी है और किसी एक दृष्टि से पूर्णतः व्यक्त नहीं किया जा सकता। कश्मीर शैव दर्शन सत्य को चेतना की अखण्ड सत्ता के रूप में देखता है, जहाँ सम्पूर्ण जगत् उसी दिव्य चेतना का विस्तार है। इन तीनों परम्पराओं का समन्वित संदेश यह है कि सत्य की खोज के लिए मन, दृष्टि और चेतनातीनों का विस्तार आवश्यक है।

अगले भाग की भूमिका

अब तक हमने विभिन्न दार्शनिक परम्पराओं में सत्य की अवधारणाओं का अध्ययन किया। किन्तु एक मूल प्रश्न अभी भी शेष है

क्या जो वास्तविक (Reality) है, वही सत्य है?

क्या सत्य और वास्तविकता समानार्थी हैं, या उनमें कोई सूक्ष्म अन्तर है? क्या जो दिखाई देता है वही वास्तविक है? क्या वास्तविकता हमारी चेतना से स्वतंत्र है, या उसका अनुभव ही उसे अर्थ देता है?

अगले भाग में हम "सत्य और वास्तविकता (Reality)" का दार्शनिक, वैज्ञानिक तथा तुलनात्मक अध्ययन करेंगे।

मुकेश श्रीवास्तव
(आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र)
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