चिंतन — अध्याय–27 : अनुभव क्या है? — भाग–1 : अनुभव क्या है? — व्युत्पत्ति, अवधारणा और मूल प्रश्न
चिंतन — अध्याय–27 : अनुभव क्या है? — भाग–1 : अनुभव क्या है? — व्युत्पत्ति, अवधारणा और मूल प्रश्न
मनुष्य जन्म लेते ही अनुभव करना आरम्भ कर देता है। वह पहले संसार को जानता नहीं, बल्कि उसे अनुभव करता है। आँख खुलते ही प्रकाश का स्पर्श, त्वचा पर हवा की हलचल, भूख की पीड़ा, माँ की गोद की ऊष्मा—ये सब किसी भाषा या विचार से पहले घटित होने वाले अनुभव हैं। ज्ञान बाद में आता है; अनुभव पहले। इसीलिए यदि पूछा जाए कि मनुष्य का सबसे पहला शिक्षक कौन है, तो उत्तर होगा—अनुभव।
किन्तु यही अनुभव, जो जीवन का सबसे निकट का तथ्य प्रतीत होता है, दर्शन के सबसे जटिल प्रश्नों में से एक बन जाता है। हम प्रतिदिन अनुभव करते हैं, पर क्या हम जानते हैं कि अनुभव वास्तव में है क्या? क्या अनुभव केवल इन्द्रियों द्वारा प्राप्त सूचना है? क्या वह मन की प्रतिक्रिया है? क्या वह चेतना की कोई अवस्था है? या फिर अनुभव वह सेतु है जिसके माध्यम से मनुष्य स्वयं, संसार और सत्य से जुड़ता है?
इसी प्रश्न से इस अध्याय की यात्रा आरम्भ होती है।
अनुभव : शब्द की व्युत्पत्ति
अनुभव शब्द संस्कृत धातु भू (होना, घटित होना) में उपसर्ग अनु के योग से बना है।
अनु = पीछे-पीछे, क्रम से, अनुसरण करते हुए।
भू = होना, प्रकट होना, अस्तित्व में आना।
इस प्रकार अनुभव का मूल अर्थ है—किसी सत्य, घटना या वस्तु के साथ प्रत्यक्ष रूप से घटित होना, उसके सम्पर्क में आना और उसे स्वयं जीना।
यह केवल सूचना प्राप्त करना नहीं है; यह किसी वस्तु या अवस्था के साथ जीवित सम्बन्ध स्थापित करना है। इसलिए अनुभव का सम्बन्ध केवल बाहरी घटनाओं से नहीं, बल्कि मनुष्य के सम्पूर्ण अस्तित्व से है।
भारतीय परम्परा में अनुभव को अनेक रूपों में व्यक्त किया गया है—अनुभूति, प्रत्यक्ष, साक्षात्कार, अपरोक्षानुभूति, आत्मानुभव, ब्रह्मानुभव आदि। प्रत्येक शब्द अनुभव की गहराई और स्तर का संकेत देता है। इन सभी का विस्तृत विवेचन आगे के भागों में किया जाएगा।
अनुभव, अनुभूति और प्रत्यक्ष
सामान्य जीवन में हम इन शब्दों का एक-दूसरे के स्थान पर प्रयोग कर लेते हैं, किन्तु दर्शन में इनके अर्थ भिन्न हैं।
अनुभूति वह प्रथम संवेदन है जो किसी वस्तु के सम्पर्क से उत्पन्न होता है। आँखों से रंग देखना, कानों से ध्वनि सुनना या त्वचा पर शीतलता का स्पर्श अनुभव करना—ये अनुभूति के उदाहरण हैं।
प्रत्यक्ष वह ज्ञान है जो इन्द्रियों अथवा प्रत्यक्ष चेतना के माध्यम से बिना किसी अनुमान के प्राप्त होता है। न्याय दर्शन में प्रत्यक्ष को ज्ञान का प्रमुख प्रमाण माना गया है।
अनुभव इन दोनों से व्यापक है। इसमें केवल इन्द्रिय-संवेदन नहीं, बल्कि मन, बुद्धि, भावना, स्मृति, अर्थ-निर्माण और चेतना का सहभाग भी सम्मिलित होता है। किसी घटना को देखना प्रत्यक्ष हो सकता है; किन्तु उसी घटना से जीवन-दृष्टि बदल जाना अनुभव है।
अर्थात्— प्रत्यक्ष देखता है, अनुभूति महसूस करती है, और अनुभव मनुष्य को बदल देता है।
सामान्य जीवन में अनुभव
हम प्रतिदिन असंख्य अनुभवों से गुजरते हैं। कुछ क्षणिक होते हैं, कुछ जीवनभर साथ रहते हैं।
एक बालक पहली बार अग्नि को छूता है। उसे केवल ताप का बोध नहीं होता; उसके भीतर अग्नि के प्रति सावधानी का ज्ञान भी जन्म लेता है।
एक विद्यार्थी पहली असफलता का सामना करता है। घटना केवल परिणाम की नहीं रहती; वह आत्मविश्वास, भय, संघर्ष और परिपक्वता का अनुभव बन जाती है।
एक कलाकार सूर्यास्त देखता है। वही दृश्य किसी अन्य व्यक्ति के लिए सामान्य हो सकता है, पर कलाकार के भीतर वह सौन्दर्य का गहरा अनुभव जगाता है।
इससे स्पष्ट होता है कि अनुभव केवल बाहर घटित नहीं होता; उसका वास्तविक रूप मनुष्य के भीतर निर्मित होता है।
दार्शनिक अर्थ में अनुभव
दर्शन के लिए अनुभव केवल मनोवैज्ञानिक घटना नहीं, बल्कि ज्ञान और वास्तविकता के बीच का सबसे महत्त्वपूर्ण सेतु है।
भारतीय दर्शनों ने अनुभव को ज्ञान का आधार माना, पर उसके स्वरूप पर मतभेद व्यक्त किए।
न्याय दर्शन ने कहा कि प्रत्यक्ष अनुभव ज्ञान का प्रमाण है।
मीमांसा ने अनुभव की प्रमाणिकता पर बल दिया।
योग ने अनुभव को चित्त की अवस्था से जोड़ा।
वेदान्त ने कहा कि अन्तिम सत्य तर्क से नहीं, बल्कि अपरोक्षानुभूति से जाना जाता है।
बौद्ध दर्शन ने प्रतिक्षण बदलते अनुभव का विश्लेषण किया और बताया कि अनुभव ही अनित्यता का प्रत्यक्ष प्रमाण है।
कश्मीर शैव दर्शन ने सम्पूर्ण जगत को शिव-चेतना का जीवित अनुभव माना।
पश्चिमी दर्शन में भी अनुभव का महत्त्व कम नहीं रहा। जॉन लॉक ने अनुभव को ज्ञान का स्रोत माना। डेविड ह्यूम ने अनुभव की सीमाओं की ओर संकेत किया। इमैनुएल कांट ने कहा कि अनुभव केवल इन्द्रियों से नहीं बनता; मन भी उसे संरचित करता है। हुस्सरल ने अनुभव को दर्शन का मूल विषय बनाया और कहा कि हमें वस्तुओं को वैसे देखना चाहिए जैसे वे चेतना में प्रकट होती हैं।
इस प्रकार पूर्व और पश्चिम, दोनों परम्पराओं में अनुभव ज्ञानमीमांसा का केन्द्र बन जाता है।
क्या अनुभव ज्ञान का आधार है?
यह प्रश्न जितना सरल दिखाई देता है, उतना ही गहरा है।
यदि कोई व्यक्ति कभी समुद्र के किनारे न गया हो, तो वह समुद्र के बारे में अनेक पुस्तकें पढ़ सकता है, चित्र देख सकता है, वैज्ञानिक तथ्य जान सकता है; पर क्या वह वास्तव में समुद्र को जानता है?
ज्ञान और अनुभव के बीच यही अन्तर है।
पुस्तक बता सकती है कि जल में लवण होता है; किन्तु समुद्र की हवा में घुली हुई नमी, लहरों का अनन्त स्वर और क्षितिज का विस्तार केवल अनुभव से जाना जा सकता है।
किन्तु दूसरी ओर, अनुभव भी सदैव सत्य नहीं होता। मृगतृष्णा में जल दिखाई देता है, स्वप्न में घटनाएँ वास्तविक लगती हैं, भ्रम में रस्सी सर्प प्रतीत होती है। यदि प्रत्येक अनुभव सत्य होता, तो भ्रम सम्भव ही न होता।
अतः प्रश्न यह नहीं है कि अनुभव आवश्यक है या नहीं; प्रश्न यह है कि अनुभव की प्रमाणिकता कैसे निर्धारित की जाए?
यही प्रश्न आगे के अध्यायों में विस्तृत रूप से सामने आएगा।
अनुभव की विविध परतें
सामान्यतः अनुभव को एक ही प्रकार का माना जाता है, जबकि वास्तव में उसके अनेक स्तर हैं।
इन्द्रियों का अनुभव।
मन का अनुभव।
भावनाओं का अनुभव।
बुद्धि की अन्तर्दृष्टि।
सौन्दर्य का अनुभव।
नैतिक अनुभव।
आध्यात्मिक अनुभव।
अस्तित्वगत अनुभव।
इन सभी स्तरों का स्वरूप, गहराई और सत्यता समान नहीं होती। इस अध्याय की आगामी यात्रा इन्हीं परतों को क्रमशः उद्घाटित करेगी।
मूल प्रश्न
इस प्रथम भाग के अन्त में कुछ प्रश्न हमारे सामने खड़े हैं—
अनुभव वास्तव में किसे कहते हैं?
अनुभव करने वाला कौन है?
क्या अनुभव केवल इन्द्रियों का विषय है?
क्या अनुभव बिना भाषा के सम्भव है?
क्या अनुभव ज्ञान उत्पन्न करता है, या ज्ञान अनुभव को अर्थ देता है?
क्या सभी अनुभव समान रूप से विश्वसनीय हैं?
क्या आध्यात्मिक अनुभव सामान्य अनुभव से भिन्न है?
और अन्ततः—क्या मनुष्य संसार को जैसा अनुभव करता है, वह वास्तव में वैसा ही है?
यही प्रश्न हमें अगले भाग की ओर ले जाते हैं, जहाँ हम वेद, उपनिषद और भगवद्गीता की दृष्टि से अनुभव की प्रकृति का अध्ययन करेंगे। वहाँ अनुभव केवल संवेदना नहीं, बल्कि ऋषियों की प्रत्यक्ष अनुभूति, आत्मबोध और ब्रह्मानुभव का विषय बन जाता है।
मुकेश श्रीवास्तव
(आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र)
(IS BLOG KE SABHEE LEKH BLOG HOLDER KE HAIN)
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