चिंतन — अध्याय–27 : अनुभव क्या है? — भाग–3 : वेदान्त में अनुभव — अपरोक्षानुभूति, ब्रह्मानुभव और ईश्वरानुभव

 चिंतन — अध्याय–27 : अनुभव क्या है? — भाग–3 : वेदान्त में अनुभव — अपरोक्षानुभूति, ब्रह्मानुभव और ईश्वरानुभव

भारतीय दर्शन में यदि किसी परम्परा ने अनुभव को ज्ञान की चरम परिणति के रूप में सबसे अधिक महत्त्व दिया है, तो वह वेदान्त है। वेदान्त के लिए सत्य केवल विचार (Thought) नहीं है, न ही केवल आस्था (Belief); वह ऐसा प्रत्यक्ष बोध है जो मनुष्य के सम्पूर्ण अस्तित्व को रूपान्तरित कर देता है।

वेदान्त का मूल प्रश्न है—क्या ब्रह्म को जाना जा सकता है?

और इसका उत्तर है—हाँ, किन्तु केवल तर्क से नहीं; अपितु अनुभव से।

यहीं से वेदान्त में अपरोक्षानुभूति की अवधारणा जन्म लेती है।

परोक्ष ज्ञान और अपरोक्षानुभूति

वेदान्त ज्ञान के दो स्तर स्वीकार करता है—

पहला—परोक्ष ज्ञान।

यह वह ज्ञान है जो हम किसी अन्य के माध्यम से प्राप्त करते हैं। शास्त्र पढ़कर, गुरु से सुनकर, तर्क करके या किसी प्रमाण के आधार पर जो समझ बनती है, वह परोक्ष ज्ञान है।

जैसे कोई व्यक्ति हिमालय के विषय में अनेक पुस्तकें पढ़ ले, उसके चित्र देख ले, उसके भूगोल का अध्ययन कर ले—फिर भी वह हिमालय का प्रत्यक्ष अनुभव नहीं करता।

दूसरा—अपरोक्षानुभूति।

यह वह स्थिति है जिसमें सत्य किसी मध्यस्थ के बिना स्वयं प्रकट होता है। यहाँ ज्ञान केवल बौद्धिक सूचना नहीं रहता; वह अस्तित्व का प्रत्यक्ष अनुभव बन जाता है।

यही कारण है कि वेदान्त कहता है— ज्ञान का अन्त अनुभव है।

अद्वैत वेदान्त : अनुभव का अर्थ

आदि शंकराचार्य के अद्वैत वेदान्त में ब्रह्म एकमात्र सत्य है। जगत् नाम-रूप का प्रपञ्च है और जीव उसी ब्रह्म का प्रतीत होने वाला सीमित रूप।

किन्तु यह निष्कर्ष केवल दार्शनिक सिद्धान्त नहीं है। यदि कोई व्यक्ति केवल यह दोहराता रहे कि "सब ब्रह्म है", तो इससे आत्मज्ञान नहीं होता।

अद्वैत कहता है कि जब साधक के भीतर अविद्या का आवरण हटता है, तब उसे यह अनुभव होता है कि जो आत्मा उसके भीतर है, वही ब्रह्म है।

यह अनुभव विचार का परिणाम नहीं, बल्कि अज्ञान के लय का परिणाम है।

इसीलिए शंकराचार्य ने "अपरोक्षानुभूति" नाम से एक स्वतंत्र ग्रन्थ की रचना की, जिसमें स्पष्ट किया गया कि आत्मबोध केवल बौद्धिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष अनुभूति है।

ब्रह्मानुभव कैसा होता है?

यह प्रश्न स्वाभाविक है। यदि ब्रह्मानुभव इतना महत्त्वपूर्ण है, तो उसका स्वरूप क्या है?

वेदान्त यहाँ अत्यन्त सावधानी से उत्तर देता है।

ब्रह्मानुभव किसी दृश्य वस्तु को देखने जैसा अनुभव नहीं है।

यह किसी प्रकाश, ध्वनि या चमत्कार का अनुभव भी आवश्यक नहीं है।

यह उस मौन बोध का उदय है जिसमें ज्ञाता, ज्ञेय और ज्ञान—तीनों का भेद विलीन होने लगता है।

यही कारण है कि उपनिषद कहते हैं— "यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह।" (तैत्तिरीयोपनिषद् २.९)

अर्थ—जहाँ से वाणी और मन भी उसे पूर्णतः ग्रहण किए बिना लौट आते हैं।

अर्थात् ब्रह्मानुभव को शब्दों में पूरी तरह बाँधना सम्भव नहीं है।

क्या ब्रह्मानुभव कोई अलौकिक घटना है?

सामान्य धारणा है कि ब्रह्मानुभव किसी अद्भुत रहस्यमयी घटना का नाम है।

किन्तु वेदान्त ऐसा नहीं कहता।

वेदान्त के अनुसार ब्रह्म कोई नई वस्तु नहीं है जिसे प्राप्त करना हो। वह तो सदैव विद्यमान है। परिवर्तन ब्रह्म में नहीं, साधक की दृष्टि में होता है।

जिस प्रकार बादलों के हटने पर सूर्य नया उत्पन्न नहीं होता, उसी प्रकार अज्ञान के हटने पर ब्रह्म का अनुभव होता है।

अतः ब्रह्मानुभव किसी नई वस्तु की प्राप्ति नहीं, बल्कि जो सदैव था उसकी पहचान है।

विशिष्टाद्वैत : ईश्वरानुभव

रामानुजाचार्य के विशिष्टाद्वैत में अनुभव की दिशा कुछ भिन्न हो जाती है।

यहाँ जीव और ब्रह्म पूर्णतः अभिन्न नहीं हैं। जीव ईश्वर का अंश है, किन्तु उसकी व्यक्तिगत सत्ता भी बनी रहती है।

इसलिए यहाँ अनुभव का केन्द्र ईश्वरानुभव है।

भक्त जब ईश्वर के प्रति सम्पूर्ण समर्पण करता है, तब उसके भीतर ऐसा प्रेम उत्पन्न होता है जिसमें अहंकार धीरे-धीरे विलीन होने लगता है।

यह अनुभव ज्ञान से विरोध नहीं करता, बल्कि ज्ञान को प्रेम में रूपान्तरित कर देता है।

यहाँ सत्य केवल जाना नहीं जाता; वह प्रेम किया जाता है।

द्वैत वेदान्त : भक्त और भगवान का अनुभव

मध्वाचार्य के द्वैत दर्शन में जीव और ईश्वर के बीच वास्तविक भेद स्वीकार किया गया है।

अतः यहाँ अनुभव का स्वरूप भी भिन्न है।

भक्त ईश्वर में विलीन नहीं होता; वह ईश्वर की निकटता, कृपा और उपस्थिति का अनुभव करता है।

यह अनुभव सम्बन्ध का अनुभव है।

यदि अद्वैत में अनुभव एकत्व का है, तो द्वैत में अनुभव निकटता का है।

यदि अद्वैत कहता है—"मैं वही हूँ", तो द्वैत कहता है—"मैं उसका हूँ।"

दोनों में अनुभूति गहन है, किन्तु उनकी दार्शनिक व्याख्या भिन्न है।

अनुभव का साधन

वेदान्त यह भी स्पष्ट करता है कि अनुभव आकस्मिक नहीं होता।

शास्त्रों में तीन चरण बताए गए हैं—

श्रवण — सत्य को सुनना।

मनन — उस पर तर्कपूर्वक विचार करना।

निदिध्यासन — उस सत्य में निरन्तर स्थित होकर उसे जीवन का प्रत्यक्ष अनुभव बना लेना।

यदि श्रवण बीज है और मनन उसका अंकुर, तो निदिध्यासन उसका फल है।

यहीं ज्ञान अनुभव में परिवर्तित होता है।

अनुभव और परिवर्तन

वेदान्त के अनुसार वास्तविक अनुभव की सबसे बड़ी पहचान यह नहीं कि साधक ने क्या देखा, बल्कि यह है कि वह कितना बदल गया।

यदि अनुभव के बाद भी अहंकार, हिंसा, लोभ और अज्ञान वैसे ही बने रहें, तो वह अनुभव केवल मानसिक उत्तेजना हो सकता है; आत्मबोध नहीं।

सच्चा अनुभव व्यक्ति की दृष्टि बदल देता है।

वह संसार को जीतने की इच्छा कम और स्वयं को समझने की आकांक्षा अधिक उत्पन्न करता है।

वह संग्रह की प्रवृत्ति को घटाकर समत्व की ओर ले जाता है।

अतः वेदान्त में अनुभव की प्रमाणिकता उसके प्रभाव से आँकी जाती है, न कि उसके चमत्कार से।

वेदान्त की विविधता और एकता

अद्वैत, विशिष्टाद्वैत और द्वैत—तीनों अनुभव को स्वीकार करते हैं।

अन्तर केवल यह है कि—

  • अद्वैत का अनुभव अभेद का है।

  • विशिष्टाद्वैत का अनुभव समर्पित एकत्व का है।

  • द्वैत का अनुभव भक्ति और सम्बन्ध का है।

तीनों मार्ग भिन्न हैं, किन्तु तीनों इस बात पर सहमत हैं कि केवल शास्त्र पढ़ लेना पर्याप्त नहीं; सत्य को जीवन में प्रत्यक्ष होना चाहिए।

समापन

वेदान्त हमें सिखाता है कि अनुभव केवल मन की घटना नहीं, बल्कि चेतना की परिपक्वता है। वह विचार का विरोध नहीं करता, बल्कि विचार को उसकी सीमा तक पहुँचाकर उससे आगे ले जाता है।

किन्तु क्या अनुभव केवल वेदान्त की ही विशेषता है? क्या अन्य भारतीय दर्शन भी अनुभव को इसी प्रकार समझते हैं? न्याय अनुभव को किस रूप में देखता है? मीमांसा प्रत्यक्ष को कितना महत्त्व देती है? योग में समाधि का अनुभव क्या है? सांख्य में पुरुष का अनुभव कैसे सम्भव है?

इन प्रश्नों का उत्तर हमें अगले भाग में मिलेगा, जहाँ न्याय, मीमांसा, सांख्य और योग दर्शन की दृष्टि से अनुभव का तुलनात्मक अध्ययन किया जाएगा।

मुकेश श्रीवास्तव
(आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र)
(IS BLOG KE SABHEE LEKH BLOG HOLDER KE HAIN)

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