चिंतन — अध्याय–27 : अनुभव क्या है? — भाग–6 : अनुभव, चेतना और साक्षी

 चिंतन — अध्याय–27 : अनुभव क्या है? — भाग–6 : अनुभव, चेतना और साक्षी

अब तक हमने अनुभव को विभिन्न दार्शनिक परम्पराओं की दृष्टि से समझने का प्रयास किया। कहीं वह ज्ञान का आधार बना, कहीं साधना का, कहीं मुक्ति का और कहीं अस्तित्व की प्रत्यक्ष अनुभूति का। किन्तु इन सभी विचारों के बीच एक प्रश्न निरन्तर उपस्थित रहा, जिसका उत्तर दिए बिना अनुभव की कोई भी चर्चा पूर्ण नहीं हो सकती—अनुभव करता कौन है?

जब हम कहते हैं—"मैंने देखा", "मैंने सुना", "मुझे दुःख हुआ", "मुझे आनन्द मिला", तब यह "मैं" कौन है?

क्या आँख देखती है?

क्या मस्तिष्क अनुभव करता है?

क्या मन अनुभव करता है?

क्या चेतना अनुभव करती है?

या इन सबके पीछे कोई ऐसा साक्षी है जो सभी अनुभवों को प्रकाशित करता है, किन्तु स्वयं उनसे बँधता नहीं?

यही प्रश्न भारतीय दर्शन के सबसे गहरे प्रश्नों में से एक है।

क्या इन्द्रियाँ अनुभव करती हैं?

पहली दृष्टि में उत्तर सरल प्रतीत होता है। हम आँखों से देखते हैं। कानों से सुनते हैं। त्वचा से स्पर्श का अनुभव करते हैं।

किन्तु यदि ध्यान से विचार करें, तो स्पष्ट होता है कि इन्द्रियाँ केवल माध्यम हैं।

मृत शरीर की आँखें भी होती हैं, किन्तु वे कुछ नहीं देखतीं।

कान होते हैं, पर कोई ध्वनि नहीं सुनते। स्पर्श होता है, पर कोई अनुभूति नहीं होती।

अतः केवल इन्द्रियाँ अनुभव का आधार नहीं हो सकतीं।

वे सूचना (Information) प्रदान करती हैं; अनुभव का निर्माण किसी गहरे स्तर पर होता है।

क्या मस्तिष्क अनुभव करता है?

आधुनिक तंत्रिका-विज्ञान (Neuroscience) बताता है कि बाहरी संकेत मस्तिष्क तक पहुँचते हैं, जहाँ उनका विश्लेषण होता है।

दृश्य, ध्वनि, गन्ध, स्वाद और स्पर्श—सभी तंत्रिका-तंत्र के माध्यम से मस्तिष्क में संसाधित होते हैं।

किन्तु यहाँ भी एक प्रश्न शेष रह जाता है।

यदि मस्तिष्क केवल विद्युत-रासायनिक संकेतों का जाल है, तो लाल रंग कैसा दिखाई देता है, संगीत कैसा सुनाई देता है, पीड़ा कैसी महसूस होती है—इसका अनुभव किसे होता है?

इसी प्रश्न को आधुनिक दर्शन में Hard Problem of Consciousness कहा जाता है।

विज्ञान अभी तक यह स्पष्ट नहीं कर पाया है कि मस्तिष्क की भौतिक प्रक्रियाओं से व्यक्तिगत अनुभव (Subjective Experience) कैसे उत्पन्न होता है।


मन : अनुभवों का संयोजक

भारतीय दर्शन सामान्यतः मन को अनुभवों का संयोजक मानता है।

आँख केवल रंग देखती है।

कान केवल ध्वनि सुनते हैं।

त्वचा केवल स्पर्श ग्रहण करती है।

इन सबको एकीकृत करके "यह एक ही वस्तु है"—यह बोध मन के माध्यम से उत्पन्न होता है।

इसीलिए यदि मन अनुपस्थित हो, तो अनुभव अधूरा रह जाता है।

हम सबने कभी न कभी यह अनुभव किया है कि कोई व्यक्ति हमें पुकारता रहा, किन्तु हमारा ध्यान कहीं और था और हमें कुछ सुनाई नहीं दिया।

ध्वनि कान तक पहुँची, पर अनुभव नहीं बना।

यह बताता है कि अनुभव केवल संवेदना नहीं है; उसमें मन की सहभागिता आवश्यक है।


चेतना : अनुभव का प्रकाश

यदि मन अनुभवों को व्यवस्थित करता है, तो चेतना उन्हें प्रकाशित करती है।

भारतीय दर्शन में चेतना को सामान्यतः उस प्रकाश के रूप में देखा गया है जिसके बिना कोई भी अनुभव सम्भव नहीं।

जिस प्रकार दीपक के बिना कमरे की वस्तुएँ दिखाई नहीं देतीं, उसी प्रकार चेतना के बिना विचार, स्मृति, भावना या इन्द्रिय-संवेदन भी अनुभव नहीं बनते।

चेतना स्वयं किसी विशेष अनुभव तक सीमित नहीं है।

वह क्रोध को भी प्रकाशित करती है।

वह प्रेम को भी प्रकाशित करती है।

वह भय को भी प्रकाशित करती है।

वह ध्यान की शान्ति को भी प्रकाशित करती है।

अनुभव बदलते रहते हैं, किन्तु उन्हें प्रकाशित करने वाली चेतना का आधार बना रहता है।


साक्षी : क्या वह अनुभव करता है?

भारतीय दर्शन में साक्षी की अवधारणा अत्यन्त सूक्ष्म है।

साक्षी का अर्थ केवल देखने वाला नहीं है।

साक्षी वह है जिसकी उपस्थिति में सभी अनुभव घटित होते हैं।

जैसे आकाश में बादल आते-जाते रहते हैं, पर आकाश उनसे भीगता नहीं; उसी प्रकार साक्षी के सम्मुख विचार, स्मृतियाँ, इच्छाएँ, सुख और दुःख आते-जाते रहते हैं, पर साक्षी स्वयं उनसे परिवर्तित नहीं होता।

इसलिए अनेक दार्शनिक परम्पराएँ कहती हैं—

साक्षी अनुभवों का विषय नहीं है।

वह अनुभवों का आधार है।


क्या साक्षी और चेतना एक ही हैं?

यह प्रश्न भारतीय दर्शन में विभिन्न उत्तर प्राप्त करता है।

अद्वैत वेदान्त सामान्यतः साक्षी और शुद्ध चेतना को अभिन्न मानता है।

सांख्य पुरुष को साक्षी मानता है।

योग भी द्रष्टा की बात करता है।

कश्मीर शैव दर्शन में यही साक्षी शिव-चेतना के रूप में विस्तृत हो जाता है।

बौद्ध दर्शन स्थायी साक्षी को स्वीकार नहीं करता, किन्तु सजग जागरूकता (Mindfulness) को अनुभव का आधार मानता है।

इन मतभेदों के बावजूद एक बात समान है—

अनुभव को समझने के लिए केवल अनुभवों का अध्ययन पर्याप्त नहीं; अनुभव के आधार का भी अध्ययन आवश्यक है।


अनुभव और आत्मबोध

जीवन का अधिकांश समय मनुष्य अनुभवों में उलझा रहता है।

वह कहता है—

"मैं क्रोधित हूँ।"

"मैं दुःखी हूँ।"

"मैं प्रसन्न हूँ।"

किन्तु जब वह सूक्ष्मता से स्वयं को देखना प्रारम्भ करता है, तो एक नया प्रश्न उत्पन्न होता है—

क्या मैं वास्तव में क्रोध हूँ?

यदि क्रोध चला जाता है और मैं बना रहता हूँ, तो मैं क्रोध कैसे हो सकता हूँ?

यदि दुःख बदल जाता है और मैं बना रहता हूँ, तो मैं केवल दुःख नहीं हूँ।

यहीं से आत्मबोध की यात्रा आरम्भ होती है।

अनुभव बदलते हैं।

अनुभवों का साक्षी अपेक्षाकृत स्थिर प्रतीत होता है।

यही अन्तर मनुष्य को स्वयं के प्रति जागरूक बनाता है।


अनुभव और अस्तित्व

दार्शनिक दृष्टि से अनुभव केवल मानसिक प्रक्रिया नहीं है।

हम संसार में रहते ही अनुभवों के माध्यम से हैं।

प्रेम, भय, मृत्यु, आशा, अकेलापन, करुणा, सौन्दर्य, मौन—ये केवल मनोवैज्ञानिक अवस्थाएँ नहीं हैं; ये हमारे अस्तित्व के मूल आयाम हैं।

इसीलिए आधुनिक अस्तित्ववादी दर्शन भी कहता है कि मनुष्य को केवल वस्तु की तरह नहीं समझा जा सकता।

वह अनुभव करने वाला अस्तित्व है।

भारतीय दर्शन इस विचार को और गहराई देता है। वह कहता है कि यदि अनुभव अस्तित्व का माध्यम है, तो अनुभव का शोधन अस्तित्व का शोधन भी है।


अनुभव और सजगता

सामान्य मनुष्य अधिकांश अनुभवों को अचेतन रूप से जीता है।

वह क्रोधित होता है, पर क्रोध को देख नहीं पाता।

वह भयभीत होता है, पर भय को समझ नहीं पाता।

वह प्रसन्न होता है, पर उस प्रसन्नता के स्रोत को नहीं पहचानता।

सजगता (Awareness) अनुभव को बदलती नहीं; वह उसके प्रति हमारे सम्बन्ध को बदल देती है।

जब अनुभव पर सजगता का प्रकाश पड़ता है, तब प्रतिक्रिया धीरे-धीरे निरीक्षण में बदलने लगती है।

यहीं से आन्तरिक स्वतंत्रता का जन्म होता है।


समापन

अनुभव, मन, चेतना और साक्षी का सम्बन्ध भारतीय दर्शन के सबसे सूक्ष्म विषयों में से एक है। अनुभव बाहरी घटनाओं से आरम्भ होकर मन में अर्थ ग्रहण करता है, चेतना में प्रकाशित होता है और साक्षी की उपस्थिति में देखा जाता है। किन्तु यह यात्रा यहीं समाप्त नहीं होती।

एक और महत्त्वपूर्ण प्रश्न सामने आता है—

यदि अनुभव का आधार चेतना है, तो क्या अनुभव ही ज्ञान का आधार भी है? क्या बिना अनुभव के ज्ञान सम्भव है? क्या तर्क अनुभव से श्रेष्ठ है, या अनुभव तर्क से? क्या भ्रम भी ज्ञान उत्पन्न कर सकता है?

इन्हीं प्रश्नों का दार्शनिक विश्लेषण अगले भाग में किया जाएगा, जहाँ हम "अनुभव और ज्ञान" के सम्बन्ध का भारतीय तथा वैश्विक दार्शनिक परम्पराओं के आलोक में अध्ययन करेंगे।


मुकेश श्रीवास्तव
(आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र)
(IS BLOG KE SABHEE LEKH BLOG HOLDER KE HAIN)

Comments

Popular posts from this blog

एक मुसाफिर की डायरी से --------------

एकांत एक नदी है

बात दोनों तरफ हो तो मज़ा देता है