चिंतन — अध्याय–27 : अनुभव क्या है? — भाग–7 : अनुभव और ज्ञान — क्या अनुभव ही ज्ञान है?

 चिंतन — अध्याय–27 : अनुभव क्या है? — भाग–7 : अनुभव और ज्ञान — क्या अनुभव ही ज्ञान है?

मनुष्य संसार को अनुभवों के माध्यम से जानता है। जन्म के बाद बालक पहले अनुभव करता है, फिर धीरे-धीरे उन अनुभवों से ज्ञान का निर्माण करता है। वह अग्नि को देखकर, छूकर और उससे उत्पन्न पीड़ा को अनुभव करके जानता है कि अग्नि जलाती है। वह भाषा सीखता है, सम्बन्धों को समझता है और संसार के नियमों का बोध अनुभवों के माध्यम से प्राप्त करता है।

किन्तु दर्शन के सामने एक मूल प्रश्न खड़ा होता है— क्या अनुभव ही ज्ञान है?

यदि अनुभव ज्ञान का आधार है, तो क्या प्रत्येक अनुभव ज्ञान उत्पन्न करता है?

यदि कोई भ्रम अनुभव में वास्तविक प्रतीत होता है, तो क्या वह भी ज्ञान कहलाएगा?

यदि तर्क किसी ऐसी बात को सिद्ध करता है जिसका प्रत्यक्ष अनुभव नहीं हुआ, तो क्या वह ज्ञान नहीं है?

इन्हीं प्रश्नों के कारण अनुभव और ज्ञान का सम्बन्ध भारतीय तथा वैश्विक दर्शन का एक प्रमुख विषय रहा है।


अनुभव और ज्ञान : सम्बन्ध और अन्तर

सामान्य जीवन में हम अनुभव और ज्ञान को लगभग एक ही मान लेते हैं।

हम कहते हैं—

"मुझे आग का अनुभव है।"

"मुझे गणित का ज्ञान है।"

किन्तु दोनों में सूक्ष्म अन्तर है।

अनुभव किसी वस्तु या घटना के साथ प्रत्यक्ष सम्बन्ध है।

ज्ञान उस अनुभव का अर्थपूर्ण बोध है।

एक व्यक्ति आग को देख सकता है, उसका ताप अनुभव कर सकता है, किन्तु यह समझना कि आग क्यों जलाती है, किस प्रकार ऊर्जा उत्पन्न करती है और उसका उपयोग कैसे किया जाए—यह ज्ञान का क्षेत्र है।

इसलिए कहा जा सकता है— अनुभव ज्ञान की भूमि है, किन्तु ज्ञान अनुभव की व्याख्या है।

अनुभवजन्य ज्ञान (Empirical Knowledge)

पाश्चात्य दर्शन में अनुभव से प्राप्त ज्ञान को Empirical Knowledge कहा गया।

यूनानी दर्शन से लेकर आधुनिक विज्ञान तक अनुभव को ज्ञान का महत्त्वपूर्ण स्रोत माना गया।

जॉन लॉक ने मनुष्य के मन को जन्म के समय एक कोरे कागज (Tabula Rasa) के समान माना और कहा कि ज्ञान अनुभव से विकसित होता है।

डेविड ह्यूम ने भी अनुभव को ज्ञान का आधार माना, किन्तु उन्होंने यह प्रश्न उठाया कि अनुभव हमें केवल घटनाओं का क्रम दिखाता है; उनके पीछे आवश्यक सम्बन्ध का प्रमाण नहीं देता।

जैसे—

हमने बार-बार देखा कि सूर्य प्रतिदिन पूर्व से उदित होता है।

किन्तु क्या केवल अनुभव के आधार पर यह निश्चित कहा जा सकता है कि कल भी सूर्य उसी प्रकार उदित होगा?

यह प्रश्न अनुभव की सीमा को दिखाता है।

न्याय दर्शन : अनुभव से प्रमाण तक

न्याय दर्शन अनुभव को स्वीकार करता है, किन्तु उसे प्रमाण बनने के लिए कुछ शर्तों से जोड़ता है।

सही ज्ञान (प्रमा) वही है जो वस्तु को उसके वास्तविक स्वरूप में जानता है।

इसलिए न्याय के अनुसार—

  • अनुभव होना आवश्यक है।

  • अनुभव का यथार्थ होना भी आवश्यक है।

रस्सी को सर्प समझना भी अनुभव है, किन्तु वह प्रमाणिक ज्ञान नहीं है।

इससे स्पष्ट होता है कि अनुभव स्वयं अन्तिम सत्य नहीं है; अनुभव की परीक्षा आवश्यक है।

क्या बिना अनुभव के ज्ञान सम्भव है?

यह प्रश्न अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।

यदि कहा जाए कि केवल अनुभव ही ज्ञान है, तो गणित, तर्क और दर्शन के अनेक क्षेत्र कठिन हो जाएँगे।

हमने कभी अनन्त संख्या नहीं देखी।

हमने न्याय के सभी सम्भावित रूपों का अनुभव नहीं किया।

हमने ब्रह्माण्ड के प्रत्येक भाग को प्रत्यक्ष नहीं देखा।

फिर भी हम इनके विषय में ज्ञान प्राप्त करते हैं।

इससे स्पष्ट होता है कि ज्ञान के अन्य साधन भी हैं—

  • तर्क

  • अनुमान

  • भाषा

  • स्मृति

  • चिन्तन

  • अन्तर्दृष्टि

अनुभव ज्ञान का एक प्रमुख स्रोत है, परन्तु एकमात्र स्रोत नहीं।

तर्क और अनुभव का सम्बन्ध

दर्शन में अक्सर अनुभव और तर्क को विरोधी माना जाता है, जबकि वास्तव में दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं।

अनुभव हमें सामग्री देता है।

तर्क उस सामग्री को व्यवस्थित करता है।

अनुभव के बिना तर्क केवल कल्पना बन सकता है।

और तर्क के बिना अनुभव अव्यवस्थित घटनाओं का संग्रह बन सकता है।

विज्ञान इसका श्रेष्ठ उदाहरण है।

वैज्ञानिक प्रयोग अनुभव प्रदान करता है, किन्तु सिद्धान्त तर्क और गणित के माध्यम से निर्मित होते हैं।

अतः ज्ञान अनुभव और विवेक के समन्वय से विकसित होता है।

भारतीय दर्शन में अनुभव और प्रमाण

भारतीय ज्ञानमीमांसा ने ज्ञान के साधनों को प्रमाण कहा।

विभिन्न दर्शनों ने अलग-अलग प्रमाण स्वीकार किए—

न्याय दर्शन -प्रत्यक्ष,अनुमान,उपमान,शब्द

मीमांसा - प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द, अर्थापत्ति, अनुपलब्धि

वेदान्त - इन प्रमाणों को स्वीकार करते हुए अन्ततः आत्मज्ञान के लिए श्रुति और आत्मानुभूति का महत्त्व बताता है।

यहाँ एक महत्त्वपूर्ण बात सामने आती है—

भारतीय दर्शन अनुभव को नकारता नहीं, किन्तु उसे विवेक और प्रमाण की कसौटी पर रखता है।

भ्रम और अनुभव

यदि अनुभव ज्ञान का आधार है, तो भ्रम का क्या होगा?

मृगतृष्णा में रेगिस्तान में जल दिखाई देता है।

स्वप्न में घटनाएँ वास्तविक प्रतीत होती हैं।

भय में साधारण वस्तु भी खतरनाक लग सकती है।

ये सभी अनुभव हैं, किन्तु क्या ये ज्ञान हैं?

यहाँ दर्शन अनुभव और वास्तविकता के बीच अन्तर स्थापित करता है।

अनुभव मन में घटित होने वाली घटना है।

ज्ञान उस घटना की वास्तविकता से संगति है।

इसलिए प्रत्येक अनुभव ज्ञान नहीं बनता।

आध्यात्मिक अनुभव और ज्ञान

आध्यात्मिक परम्पराएँ अनुभव को केवल बाहरी ज्ञान तक सीमित नहीं करतीं।

उनके अनुसार मनुष्य स्वयं के विषय में भी एक गहरे अज्ञान में जीता है।

"मैं कौन हूँ?"

"मेरा वास्तविक स्वरूप क्या है?"

"चेतना क्या है?"

इन प्रश्नों के उत्तर केवल बौद्धिक रूप से नहीं, बल्कि अस्तित्वगत अनुभव से प्राप्त होते हैं।

वेदान्त में इसे आत्मानुभूति कहा गया।

बौद्ध परम्परा में इसे प्रत्यक्ष बोध कहा गया।

योग में इसे समाधि की अनुभूति से जोड़ा गया।

अनुभव की सीमा

अनुभव अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है, किन्तु उसकी सीमाएँ भी हैं।

अनुभव व्यक्ति-विशेष पर निर्भर हो सकता है।

एक ही घटना दो व्यक्तियों में अलग-अलग अनुभव उत्पन्न कर सकती है।

एक व्यक्ति वर्षा को आनन्द के रूप में अनुभव कर सकता है, दूसरा उसी वर्षा को कठिनाई के रूप में।

इसलिए अनुभव में व्यक्तिगतता (Subjectivity) का तत्व होता है।

यही कारण है कि दर्शन अनुभव को समझने के लिए चेतना, भाषा और संस्कृति की भूमिका का भी अध्ययन करता है।

समन्वित दृष्टि

यदि अनुभव और ज्ञान के सम्बन्ध को समग्र रूप से देखें, तो कहा जा सकता है—

अनुभव ज्ञान का प्रारम्भ है।

विवेक ज्ञान का निर्माण करता है।

तर्क ज्ञान को स्पष्ट करता है।

साधना ज्ञान को जीवन में उतारती है।

और आत्मबोध ज्ञान को अस्तित्व का अनुभव बना देता है।

इस प्रकार अनुभव और ज्ञान विरोधी नहीं, बल्कि एक ही यात्रा के दो चरण हैं।

समापन

अनुभव मनुष्य को संसार से जोड़ता है, किन्तु ज्ञान उसे संसार को समझने की क्षमता देता है। अनुभव बिना विवेक के भ्रम बन सकता है और ज्ञान बिना अनुभव के केवल विचार रह सकता है।

किन्तु यहाँ एक नया प्रश्न उत्पन्न होता है—

यदि अनुभव ज्ञान का माध्यम है, तो क्या अनुभव भाषा के बिना सम्भव है?

क्या हम किसी अनुभव को शब्दों में पूरी तरह व्यक्त कर सकते हैं?

क्या भाषा अनुभव को प्रकट करती है या सीमित करती है?

क्या मौन भी एक अनुभव हो सकता है?

इन्हीं प्रश्नों की खोज अगले भाग में होगी—

"अनुभव, भाषा और स्मृति"।

मुकेश श्रीवास्तव
(आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र)
(IS BLOG KE SABHEE LEKH BLOG HOLDER KE HAIN)

Comments

Popular posts from this blog

एक मुसाफिर की डायरी से --------------

एकांत एक नदी है

बात दोनों तरफ हो तो मज़ा देता है