चिंतन — अध्याय–27 : अनुभव क्या है? — भाग–8 : अनुभव, भाषा और स्मृति — क्या अनुभव भाषा से पहले होता है?

 चिंतन — अध्याय–27 : अनुभव क्या है? — भाग–8 : अनुभव, भाषा और स्मृति — क्या अनुभव भाषा से पहले होता है?

अब तक हमने अनुभव का अध्ययन भारतीय दार्शनिक परम्पराओं, चेतना और ज्ञान के सन्दर्भ में किया। किन्तु एक प्रश्न अभी भी शेष है, जो आधुनिक दर्शन, भाषाविज्ञान, मनोविज्ञान और Phenomenology का केन्द्रीय प्रश्न है—

क्या अनुभव पहले होता है और भाषा बाद में आती है, या भाषा ही हमारे अनुभवों का निर्माण करती है?

जब कोई शिशु जन्म लेता है, तब उसके पास कोई भाषा नहीं होती, फिर भी वह भूख, स्पर्श, ऊष्मा, भय और सुरक्षा का अनुभव करता है। दूसरी ओर, जैसे-जैसे वह भाषा सीखता है, उसके अनुभवों को पहचानने, व्यक्त करने और समझने की क्षमता भी विकसित होती है। इससे स्पष्ट है कि अनुभव और भाषा का सम्बन्ध अत्यन्त गहरा है, किन्तु दोनों एक-दूसरे के पर्याय नहीं हैं।

क्या अनुभव भाषा से पहले होता है?

मनुष्य का पहला अनुभव भाषा से पहले घटित होता है।

शिशु अपनी माँ की गोद में सुरक्षा का अनुभव करता है, किन्तु वह उसे "सुरक्षा" नहीं कह सकता।

उसे पीड़ा होती है, पर वह "दर्द" शब्द नहीं जानता।

उसे भूख लगती है, पर वह उसकी परिभाषा नहीं दे सकता।

इससे प्रतीत होता है कि अनुभव का प्रारम्भिक स्तर पूर्व-भाषिक (Pre-linguistic) होता है।

भाषा अनुभव को उत्पन्न नहीं करती; वह उसे अभिव्यक्ति प्रदान करती है।

किन्तु कहानी यहीं समाप्त नहीं होती।

भाषा अनुभव को केवल व्यक्त नहीं करती, उसे आकार भी देती है

जब मनुष्य भाषा सीखता है, तब वह केवल नए शब्द नहीं सीखता; वह संसार को देखने के नए ढंग भी सीखता है।

जिस भावना का नाम हमें ज्ञात नहीं होता, उसे पहचानना भी कठिन होता है।

उदाहरण के लिए, यदि किसी संस्कृति में किसी विशेष भाव या सम्बन्ध के लिए विशिष्ट शब्द हो, तो उस संस्कृति के लोग उस अनुभव की सूक्ष्मताओं को अधिक स्पष्ट रूप से पहचान सकते हैं।

अर्थात् भाषा केवल अनुभव का दर्पण नहीं है; वह अनुभव का संगठन भी करती है।

क्या प्रत्येक अनुभव शब्दों में व्यक्त किया जा सकता है?

यह प्रश्न दर्शन और साहित्य दोनों के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।

हममें से अधिकांश ने कभी न कभी ऐसा अनुभव किया है जिसे व्यक्त करने के लिए शब्द अपर्याप्त लगे हों।

पहाड़ की चोटी पर उगते सूर्य का दृश्य।

किसी प्रियजन की पहली मुस्कान।

माता का मौन स्नेह।

गहन ध्यान की शान्ति।

किसी अपने को सदा के लिए खो देने का क्षण।

इन अनुभवों को शब्दों में व्यक्त किया जा सकता है, किन्तु क्या शब्द स्वयं उस अनुभव के समान हो जाते हैं?

स्पष्टतः नहीं।

शब्द अनुभव की ओर संकेत करते हैं; वे स्वयं अनुभव नहीं बन जाते।

उपनिषदों का मौन

भारतीय परम्परा ने इस सीमा को बहुत पहले पहचान लिया था।

उपनिषद कहते हैं— "यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह।" (तैत्तिरीयोपनिषद् २.९)

अर्थ—जहाँ से वाणी और मन भी उसे पूर्णतः ग्रहण किए बिना लौट आते हैं।

यह मन्त्र किसी निराशा का नहीं, बल्कि भाषा की सीमा का उद्घोष है।

कुछ अनुभव ऐसे होते हैं जिन्हें शब्दों में बाँधने का प्रयास ही उन्हें सीमित कर देता है।

इसीलिए भारतीय साधना-परम्पराओं में मौन को केवल बोलने का अभाव नहीं, बल्कि अनुभव की एक विशिष्ट अवस्था माना गया है।

विट्गेन्स्टाइन और भाषा की सीमा

आधुनिक दर्शन में Ludwig Wittgenstein ने भाषा की सीमा पर गहरा विचार किया।

उनका प्रसिद्ध कथन है—

"जिसके बारे में बोला नहीं जा सकता, उसके बारे में मौन रहना चाहिए।"

इस कथन का अर्थ यह नहीं कि जो कहा नहीं जा सकता, वह अस्तित्वहीन है।

अर्थ यह है कि वास्तविकता का कुछ भाग भाषा की पहुँच से बाहर भी हो सकता है।

यही कारण है कि प्रेम, मृत्यु, सौन्दर्य और आध्यात्मिक अनुभूतियाँ अक्सर कविता, संगीत और प्रतीकों के माध्यम से अधिक प्रभावी ढंग से व्यक्त होती हैं, न कि केवल तर्कपूर्ण परिभाषाओं से।

स्मृति : अनुभव का दूसरा जीवन

यदि भाषा अनुभव को व्यक्त करती है, तो स्मृति उसे समय में सुरक्षित रखती है।

जो अनुभव स्मृति में नहीं टिकता, वह शीघ्र ही चेतना से विलीन हो जाता है।

किन्तु स्मृति अनुभव की प्रतिलिपि (Copy) नहीं होती।

जब हम किसी घटना को वर्षों बाद याद करते हैं, तो हम उसे ज्यों-का-त्यों नहीं दोहराते।

हमारी वर्तमान भावनाएँ, हमारा ज्ञान, हमारी आयु और हमारे जीवन के बाद के अनुभव उस स्मृति को नया अर्थ दे देते हैं।

इस प्रकार स्मृति केवल संग्रह नहीं करती; वह पुनर्निर्माण (Reconstruction) भी करती है।

क्या स्मृति विश्वसनीय है?

आधुनिक मनोविज्ञान बताता है कि स्मृति कैमरे की तरह घटनाओं को सुरक्षित नहीं रखती।

कभी-कभी हम ऐसी घटनाओं को भी सच मान बैठते हैं जो वास्तव में हुई ही नहीं।

इन्हें False Memories कहा जाता है।

इसी प्रकार दो भाई-बहन अपने बचपन की एक ही घटना को बिल्कुल अलग प्रकार से याद कर सकते हैं।

इससे यह स्पष्ट होता है कि अनुभव और स्मृति के बीच एक रचनात्मक प्रक्रिया चलती रहती है।

अतः स्मृति अनुभव का प्रमाण है, किन्तु उसका पूर्ण प्रतिरूप नहीं।

अनुभव, भाषा और पहचान

मनुष्य केवल अनुभव नहीं करता; वह अपने अनुभवों की कहानी भी बनाता है।

हम अपने जीवन को घटनाओं की सूची के रूप में नहीं, बल्कि एक कथा (Narrative) के रूप में समझते हैं।

"मैं कौन हूँ?"—इस प्रश्न का उत्तर देते समय हम अपने अनुभवों को स्मृतियों में व्यवस्थित करते हैं और भाषा के माध्यम से उन्हें अर्थ प्रदान करते हैं।

इस प्रकार हमारी व्यक्तिगत पहचान केवल जैविक नहीं, बल्कि अनुभव, स्मृति और भाषा के संयुक्त निर्माण का परिणाम होती है।

मौन : क्या वह भी एक भाषा है?

भारतीय आध्यात्मिक परम्पराएँ और आधुनिक Phenomenology दोनों इस बात की ओर संकेत करती हैं कि मौन केवल शब्दों का अभाव नहीं है।

दो व्यक्तियों के बीच कभी-कभी एक ऐसा मौन होता है जो हजारों शब्दों से अधिक अर्थपूर्ण होता है।

ध्यान में बैठा साधक भी किसी विचार का नहीं, बल्कि मौन का अनुभव करता है।

इसलिए कहा जा सकता है कि— जहाँ भाषा समाप्त होती है, वहाँ अनुभव का एक नया आयाम प्रारम्भ हो सकता है।

समन्वित दृष्टि

यदि अनुभव, भाषा और स्मृति को एक साथ देखा जाए, तो एक रोचक संरचना सामने आती है—

  • अनुभव हमें जीवन से जोड़ता है।

  • भाषा अनुभव को अभिव्यक्ति देती है।

  • स्मृति उसे समय में संरक्षित रखती है।

  • और चेतना इन तीनों को अर्थ प्रदान करती है।

इनमें से किसी एक को हटाकर मनुष्य के अनुभव को पूरी तरह नहीं समझा जा सकता।

समापन

अनुभव भाषा से पहले जन्म ले सकता है, किन्तु भाषा उसे सामाजिक और बौद्धिक जीवन प्रदान करती है। स्मृति अनुभव को समय के पार ले जाती है, किन्तु प्रत्येक स्मृति पुनर्निर्माण भी करती है। इस प्रकार अनुभव कभी स्थिर नहीं रहता; वह निरन्तर अर्थ ग्रहण करता रहता है।

अब प्रश्न यह है कि यदि अनुभव इतना जटिल है, तो आधुनिक दर्शन ने उसे किस प्रकार समझने का प्रयास किया? विशेष रूप से Phenomenology ने अनुभव को दर्शन का केन्द्रीय विषय क्यों बनाया? हुस्सरल, हाइडेगर और मेरलो-पोंटी ने अनुभव के बारे में ऐसा क्या कहा जिसने बीसवीं शताब्दी के दर्शन की दिशा बदल दी?

इन्हीं प्रश्नों का अध्ययन अगले भाग में किया जाएगा—"आधुनिक दर्शन और Phenomenology"

मुकेश श्रीवास्तव
(आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र)
(IS BLOG KE SABHEE LEKH BLOG HOLDER KE HAIN)

Comments

Popular posts from this blog

एक मुसाफिर की डायरी से --------------

एकांत एक नदी है

बात दोनों तरफ हो तो मज़ा देता है