चिंतन — अध्याय–27 : अनुभव क्या है? — भाग–9 : आधुनिक दर्शन और Phenomenology (अनुभव-दर्शन)

 चिंतन — अध्याय–27 : अनुभव क्या है? — भाग–9 : आधुनिक दर्शन और Phenomenology (अनुभव-दर्शन)

अनुभव की ओर आधुनिक दर्शन का मुड़ना

पश्चिमी दर्शन के इतिहास में एक समय ऐसा था जब दर्शन का मुख्य प्रश्न था—

"वास्तविकता क्या है?"
"बाहरी संसार का स्वरूप क्या है?"
"मनुष्य सत्य को कैसे जान सकता है?"

किन्तु आधुनिक काल में धीरे-धीरे एक नया प्रश्न उभरा—

"जिस संसार को हम जानते हैं, वह हमारे अनुभव में किस प्रकार उपस्थित होता है?"

यही प्रश्न आधुनिक Phenomenology (अनुभव-दर्शन) का आधार बना।

Phenomenology का मूल आग्रह यह है कि किसी वस्तु, विचार या संसार के बारे में सिद्धान्त बनाने से पहले यह समझा जाए कि वह हमारे अनुभव में किस प्रकार प्रकट होती है।

अर्थात्—

वस्तु क्या है? से पहले प्रश्न है—

वस्तु हमें दिखाई कैसे देती है?

क्योंकि मनुष्य संसार को सीधे नहीं, बल्कि अनुभव के माध्यम से जानता है।

एक वृक्ष केवल बाहरी पदार्थ नहीं है।
किसी व्यक्ति के लिए वह छाया है, किसी के लिए बचपन की स्मृति, किसी कलाकार के लिए सौन्दर्य, और किसी दार्शनिक के लिए अस्तित्व का प्रतीक।

वस्तु एक हो सकती है, लेकिन अनुभव के स्तर अनेक हो सकते हैं।

यहीं से आधुनिक दर्शन ने अनुभव को दर्शन के केन्द्र में स्थापित किया।

डेसकार्ट : अनुभव, संशय और चेतना की खोज

रेने डेसकार्ट आधुनिक दर्शन के प्रमुख आरम्भकर्ताओं में माने जाते हैं।

उनका मुख्य प्रश्न था— "क्या ऐसा कोई ज्ञान है जिस पर बिल्कुल संदेह न किया जा सके?"

डेसकार्ट ने बाहरी संसार, इन्द्रियों और पुराने विश्वासों पर प्रश्न उठाया।

उनका प्रसिद्ध निष्कर्ष था— "Cogito, ergo sum" "मैं सोचता हूँ, इसलिए मैं हूँ।"

डेसकार्ट के लिए सबसे निश्चित अनुभव स्वयं की चेतना का अनुभव था।

जब मनुष्य हर वस्तु पर संदेह कर सकता है, तब भी वह इस तथ्य से इनकार नहीं कर सकता कि—

कोई है जो संदेह कर रहा है।

यहाँ अनुभव पहली बार बाहरी संसार से हटकर भीतर की चेतना की ओर मुड़ता है।

किन्तु डेसकार्ट की समस्या यह थी कि उन्होंने मन और शरीर को दो अलग-अलग सत्ता मान लिया।

इससे एक बड़ा दार्शनिक प्रश्न पैदा हुआ—

यदि अनुभव मन में होता है और संसार शरीर से बाहर है, तो दोनों का सम्बन्ध कैसे स्थापित होता है?

यही प्रश्न आगे के दर्शन के लिए चुनौती बना।

कांट : अनुभव और मन की संरचना

इमैनुएल कांट ने डेसकार्ट के संशय और अनुभववाद के बीच एक नया मार्ग प्रस्तुत किया।

कांट के अनुसार—

मनुष्य संसार को जैसा वह अपने आप में है, वैसा सीधे नहीं जानता।

मनुष्य संसार को अपनी मानसिक संरचनाओं के माध्यम से अनुभव करता है।

उनके अनुसार अनुभव दो तत्वों के मिलन से बनता है—

1. बाहरी जगत से प्राप्त संवेदनाएँ (Sensations)
2. मन की पूर्व संरचनाएँ (Forms of Intuition and Categories)

उदाहरण के लिए—

हम समय और स्थान को बाहर मौजूद वस्तुओं की तरह नहीं देखते, बल्कि हमारा मन हर अनुभव को समय और स्थान के ढाँचे में व्यवस्थित करता है।

इस दृष्टि से अनुभव केवल बाहर से आने वाली सूचना नहीं है।

अनुभव एक सक्रिय प्रक्रिया है जिसमें— बाहरी जगत + मन की संरचना = अनुभव

का निर्माण होता है।

कांट ने यह स्पष्ट किया कि मनुष्य केवल संसार को ग्रहण नहीं करता, बल्कि अपने अनुभव की संरचना में उसकी भूमिका निभाता है।

हुस्सरल : Phenomenology का जन्म

एडमंड हुस्सरल ने अनुभव-दर्शन को एक स्वतंत्र दार्शनिक पद्धति के रूप में स्थापित किया।

उनका मुख्य वाक्य था— "वस्तुओं की ओर लौटो।" (Back to the things themselves)

इसका अर्थ था—

दर्शन को केवल सिद्धान्तों, पूर्व धारणाओं और कल्पनाओं से नहीं चलना चाहिए।

हमें यह देखना चाहिए कि कोई वस्तु चेतना में वास्तव में किस प्रकार प्रकट होती है।

हुस्सरल ने Intentionality (अभिप्रेरणात्मकता) की अवधारणा प्रस्तुत की।

इसके अनुसार— चेतना हमेशा किसी न किसी वस्तु की ओर उन्मुख होती है।

हम केवल "सोचते" नहीं हैं।

हम—

किसी वस्तु के बारे में सोचते हैं।
किसी व्यक्ति को याद करते हैं।
किसी भविष्य की कल्पना करते हैं।
किसी अनुभव को महसूस करते हैं।

अर्थात् चेतना सदैव सम्बन्धात्मक है।

चेतना और अनुभव अलग-अलग स्वतंत्र चीजें नहीं हैं।

चेतना का स्वरूप ही है— किसी चीज का अनुभव होना।


Epoché : अनुभव को पूर्व धारणाओं से मुक्त देखना

हुस्सरल ने एक महत्वपूर्ण पद्धति दी— Epoché (निलंबन)

इसका अर्थ है—

कुछ समय के लिए अपनी पूर्व मान्यताओं को रोककर अनुभव को उसी रूप में देखना जैसा वह प्रकट होता है।

उदाहरण—

यदि कोई व्यक्ति एक फूल देखता है, तो सामान्यतः उसके मन में कई विचार आते हैं—

यह गुलाब है। यह सुंदर है।इसका मूल्य इतना है। इसे किसने दिया?

लेकिन Phenomenology कहती है— पहले केवल यह देखो कि— फूल अनुभव में कैसे उपस्थित हो रहा है।

उसका रंग, उसकी गंध, उसका दिखाई देना, उससे उत्पन्न भावना— यह सब अनुभव की संरचना है।

इस प्रकार Phenomenology अनुभव की गहराई में जाने का प्रयास करती है।

हाइडेगर : अनुभव और अस्तित्व

मार्टिन हाइडेगर ने हुस्सरल की Phenomenology को अस्तित्व की दिशा में विकसित किया।

उनका मुख्य प्रश्न था— "अस्तित्व का अर्थ क्या है?"

हाइडेगर के अनुसार मनुष्य केवल अनुभव करने वाला जीव नहीं है।

मनुष्य स्वयं संसार में स्थित एक अस्तित्व है।

उन्होंने मनुष्य के लिए शब्द प्रयोग किया— Dasein (यहाँ-होना)

मनुष्य संसार से अलग खड़ा हुआ निरीक्षक नहीं है।

वह संसार में जीता है, सम्बन्ध बनाता है, समय को अनुभव करता है, मृत्यु को समझता है और अर्थ की खोज करता है।

इसलिए अनुभव केवल मानसिक घटना नहीं है।

अनुभव हमारे पूरे अस्तित्व की स्थिति है।

हम दुःख को केवल महसूस नहीं करते— हम दुःख में एक विशेष प्रकार से अस्तित्व में होते हैं।

हम प्रेम को केवल जानते नहीं— हम प्रेम के भीतर अपना संसार अनुभव करते हैं।

मेरलो-पोंटी : शरीर और अनुभव

मॉरिस मेरलो-पोंटी ने अनुभव में शरीर की भूमिका को केन्द्र में रखा।

उनके अनुसार शरीर केवल एक भौतिक वस्तु नहीं है।

हम शरीर के माध्यम से संसार में उपस्थित होते हैं।

आँख केवल देखने का उपकरण नहीं है।

हाथ केवल छूने का साधन नहीं है।

पूरा शरीर संसार के साथ संवाद करता है।

जब कोई व्यक्ति संगीत सुनता है, तो केवल कान सक्रिय नहीं होते।

पूरा अस्तित्व उस अनुभव में भाग लेता है।

इसलिए अनुभव— केवल मस्तिष्क में होने वाली प्रक्रिया नहीं, बल्कि शरीर, चेतना और संसार के बीच जीवित सम्बन्ध है।

विलियम जेम्स : अनुभव की बहुलता

विलियम जेम्स ने अनुभव को मनोविज्ञान और दर्शन के बीच जोड़ने का प्रयास किया।

उनके अनुसार चेतना कोई स्थिर वस्तु नहीं है।

उन्होंने इसे कहा— Stream of Consciousness (चेतना की धारा)

मनुष्य का अनुभव निरन्तर बहता रहता है।

विचार, भावनाएँ, स्मृतियाँ और संवेदनाएँ एक सतत प्रवाह बनाती हैं।

जेम्स ने धार्मिक और आध्यात्मिक अनुभवों का भी अध्ययन किया।

उनके अनुसार ऐसे अनुभव व्यक्ति के जीवन में गहरा परिवर्तन ला सकते हैं।

भारतीय दर्शन और Phenomenology : एक संवाद

आधुनिक Phenomenology और भारतीय दर्शन में कुछ महत्वपूर्ण समानताएँ दिखाई देती हैं।

उपनिषद कहते हैं— "द्रष्टा" को जानो।

योग कहता है— चित्त की वृत्तियों का निरीक्षण करो।

बौद्ध दर्शन कहता है— अनुभव को बिना आसक्ति के देखो।

Phenomenology कहती है— अनुभव को उसकी मूल उपस्थिति में देखो।

दोनों परम्पराएँ अनुभव को केवल बाहरी घटना नहीं मानतीं।

किन्तु दोनों के उद्देश्य अलग हैं।

भारतीय दर्शन प्रायः अनुभव के माध्यम से आत्म, मुक्ति और परम सत्य की खोज करता है।

Phenomenology अनुभव की संरचना और उसके प्रकट होने के ढंग को समझने का प्रयास करती है।

एक का लक्ष्य है— अस्तित्व का अंतिम सत्य।

दूसरे का लक्ष्य है— अनुभव की मूल प्रकृति।

अनुभव-दर्शन का महत्व

Phenomenology ने आधुनिक दर्शन को यह समझाया कि— 

मनुष्य संसार को केवल वस्तुओं के रूप में नहीं जानता।

वह संसार को अनुभव करता है।

और अनुभव में— स्मृति है, भावना है, शरीर है, भाषा है, समय है, अर्थ है।

इसलिए अनुभव केवल ज्ञान प्राप्त करने का माध्यम नहीं, बल्कि मनुष्य के होने की मूल अवस्था है।

भाग–9 का निष्कर्ष

आधुनिक दर्शन ने अनुभव को केवल इन्द्रिय ज्ञान नहीं माना।

डेसकार्ट ने अनुभव को चेतना की ओर मोड़ा।
कांट ने बताया कि मन अनुभव की संरचना करता है।
हुस्सरल ने अनुभव को दर्शन का केन्द्र बनाया।
हाइडेगर ने अनुभव को अस्तित्व से जोड़ा।
मेरलो-पोंटी ने शरीर को अनुभव का आधार माना।
विलियम जेम्स ने अनुभव को चेतना की प्रवाहमान धारा के रूप में देखा।

इस प्रकार आधुनिक दर्शन हमें यह समझाता है—

मनुष्य संसार को केवल देखता नहीं है, वह संसार को अनुभव करके अपना अर्थ निर्मित करता है।

अब अगला प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है—

यदि अनुभव चेतना, शरीर, स्मृति और मस्तिष्क से जुड़ा है, तो आधुनिक विज्ञान और Neuroscience अनुभव को किस प्रकार समझते हैं?

इसी प्रश्न की खोज अगले भाग में होगी।

मुकेश श्रीवास्तव
(आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र)
(IS BLOG KE SABHEE LEKH BLOG HOLDER KE HAIN)

Comments

Popular posts from this blog

एक मुसाफिर की डायरी से --------------

एकांत एक नदी है

बात दोनों तरफ हो तो मज़ा देता है