चिंतन — अध्याय–28 : आनन्द क्या है? — भाग–4 : न्याय, मीमांसा, सांख्य और योग में आनन्द

 चिंतनअध्याय–28 : आनन्द क्या है? — भाग–4 : न्याय, मीमांसा, सांख्य और योग में आनन्दप्रमाण, पुरुष, समाधि और वैराग्य की दृष्टि से तुलनात्मक अध्ययन

 क्या प्रत्येक दर्शन आनन्द को स्वीकार करता है?

अब तक हमने वेद, उपनिषद और वेदान्त की दृष्टि से आनन्द का अध्ययन किया। वहाँ आनन्द को अन्ततः ब्रह्म अथवा आत्मा के स्वरूप के रूप में समझा गया।

किन्तु भारतीय दर्शन केवल वेदान्त तक सीमित नहीं है। न्याय, मीमांसा, सांख्य और योगये चारों दर्शन आनन्द को स्वीकार तो करते हैं, परन्तु उसकी व्याख्या वेदान्त से भिन्न करते हैं।

विशेषतः न्याय और सांख्य इस बात पर बल देते हैं कि दुःख की प्रकृति को समझे बिना आनन्द को समझना सम्भव नहीं है। योग कहता है कि चित्त की अशान्ति ही आनन्द को ढक देती है, जबकि मीमांसा का आग्रह है कि धर्मानुकूल जीवन अन्ततः कल्याण का मार्ग है।

अतः इस भाग का मूल प्रश्न है

क्या आनन्द कोई वस्तु है जिसे प्राप्त किया जाए, या वह मनुष्य की अन्तःस्थिति है जो अज्ञान, अशान्ति और आसक्ति के कारण अप्रकट रहती है?

न्याय दर्शन : क्या आनन्द प्रमाण का विषय है?

न्याय दर्शन का मूल उद्देश्य हैयथार्थ ज्ञान के द्वारा दुःख की निवृत्ति।

महर्षि गौतम न्यायसूत्र के आरम्भ में ही कहते हैं

"दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानाम् उत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः।" (न्यायसूत्र 1.1.2)

अर्थ

"मिथ्याज्ञान के नष्ट होने से दोष नष्ट होते हैं, दोषों के नष्ट होने से प्रवृत्ति, प्रवृत्ति के नष्ट होने से जन्म और जन्म के नष्ट होने से दुःख समाप्त होता है। यही अपवर्ग (मोक्ष) है।"

यहाँ ध्यान देने योग्य बात है कि न्याय दर्शन मोक्ष को मुख्यतः दुःख की पूर्ण निवृत्ति के रूप में परिभाषित करता है।

वेदान्त की भाँति वह स्पष्ट रूप से "मोक्ष = ब्रह्मानन्द" नहीं कहता।

फिर भी न्याय का संकेत यह है कि जहाँ दुःख का पूर्ण अभाव है, वहाँ किसी प्रकार की बन्धनजन्य व्यथा नहीं रहती।

अर्थात् न्याय में आनन्द का प्रतिपादन नकारात्मक पद्धति (Negative Definition) से होता हैदुःख का पूर्ण क्षय।

क्या आनन्द प्रत्यक्ष प्रमाण से जाना जा सकता है?

न्याय दर्शन चार प्रमुख प्रमाण स्वीकार करता हैप्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द

प्रश्न यह उठता हैक्या ब्रह्मानन्द प्रत्यक्ष का विषय है?

न्याय का उत्तर है

सामान्य सुख और दुःख प्रत्यक्ष अनुभव के विषय हैं, किन्तु मोक्ष का स्वरूप सामान्य इन्द्रिय-प्रत्यक्ष से नहीं जाना जा सकता। उसके विषय में शास्त्र और तर्क दोनों का सहारा लेना पड़ता है।

इस प्रकार न्याय अनुभव को स्वीकार करता है, परन्तु अनुभव की विवेचना प्रमाण-शास्त्र के अनुशासन में करता है।

पूर्वमीमांसा : धर्म, कर्म और कल्याण

पूर्वमीमांसा का केन्द्र "आनन्द" नहीं, बल्कि धर्म है।

जैमिनि के अनुसार"चोदनालक्षणोऽर्थो धर्मः।"

अर्थात् वेद की आज्ञा से ज्ञात होने वाला कर्तव्य ही धर्म है।

मीमांसा का आग्रह यह है कि मनुष्य का जीवन केवल सुख-भोग के लिए नहीं, बल्कि धर्मानुकूल कर्म के लिए है।

यहाँ एक महत्त्वपूर्ण दार्शनिक बिन्दु है

मीमांसा सुख को जीवन का परम लक्ष्य नहीं मानती।

वह कहती है कि जब मनुष्य धर्मानुकूल कर्म करता है, तब उसका जीवन ब्रह्माण्डीय व्यवस्था (ऋत) के अनुरूप हो जाता है। यही जीवन अन्ततः कल्याणकारी होता है।

अतः मीमांसा में आनन्द का आधार कर्तव्य की पूर्णता है, कि इच्छा की पूर्ति।

सांख्य दर्शन : पुरुष और आनन्द का प्रश्न

सांख्य दर्शन का मूल आधार हैपुरुष और प्रकृति का भेद। यहाँ एक रोचक तथ्य है।

सांख्य परम्परा सामान्यतः पुरुष को शुद्ध चेतन, अकर्ता, असंग और द्रष्टा कहती है, किन्तु वेदान्त की भाँति उसे स्पष्ट रूप से "आनन्दस्वरूप" नहीं कहती।

क्यों?

क्योंकि सांख्य का उद्देश्य ब्रह्म की सत्ता स्थापित करना नहीं, बल्कि प्रकृति और पुरुष के भेद का विवेचन करना है।

सांख्य के अनुसार दुःख का कारण है

पुरुष का प्रकृति के साथ मिथ्या तादात्म्य।

जब विवेक उत्पन्न होता है, तब पुरुष अपने शुद्ध स्वरूप में स्थित हो जाता है।

उस अवस्था को कैवल्य कहा जाता है।

यद्यपि सांख्य "ब्रह्मानन्द" शब्द का प्रयोग नहीं करता, तथापि कैवल्य की अवस्था को गहन आन्तरिक स्वतंत्रता और शान्ति की अवस्था माना गया है।

योग दर्शन : चित्तवृत्ति और आनन्द

पतञ्जलि योगसूत्र भारतीय मनोविज्ञान की महानतम कृतियों में से एक है।

योग का प्रसिद्ध सूत्र है"योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः।" (योगसूत्र 1.2)

अर्थ"चित्त की वृत्तियों का निरोध ही योग है।"

यहाँ प्रश्न हैचित्तवृत्तियों के शांत होने पर क्या होता है?

उत्तर अगले सूत्र में मिलता है"तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्।" (योगसूत्र 1.3)

अर्थ"तब द्रष्टा अपने स्वरूप में स्थित हो जाता है।"

योगसूत्र "आनन्द" शब्द का अधिक प्रयोग नहीं करता, किन्तु सम्पूर्ण साधना इसी दिशा में ले जाती है कि मन की अशान्ति समाप्त हो और द्रष्टा अपने वास्तविक स्वरूप में स्थित हो।

इस स्थिति में उत्पन्न होने वाली गहन शान्ति को अनेक आचार्यों ने आध्यात्मिक आनन्द का आधार माना है।

समाधि का आनन्द

योग दर्शन में समाधि कोई रहस्यमयी चमत्कार नहीं, बल्कि चित्त की परिपक्व अवस्था है।

सविकल्प समाधि में अभी सूक्ष्म मानसिक संस्कार विद्यमान रहते हैं।

निर्विकल्प या असम्प्रज्ञात समाधि में चित्त अत्यन्त सूक्ष्म स्तर तक शांत हो जाता है।

यहाँ उत्पन्न अनुभव को सामान्य इन्द्रिय-सुख से तुलना नहीं की जा सकती।

यह उत्तेजना है, भावनात्मक उन्माद, इन्द्रियजन्य सुख।

यह गहन स्थिरता, स्वच्छता और आन्तरिक अखण्डता का अनुभव है।

इसीलिए योग परम्परा समाधि के अनुभव को "परमानन्द" कहने की अपेक्षा "स्वरूपस्थिति" पर अधिक बल देती है।

वैराग्य और आन्तरिक प्रसन्नता

पतञ्जलि योग में दो आधार बताए गए हैंअभ्यास, वैराग्य

वैराग्य का अर्थ संसार का त्याग नहीं है।

वैराग्य का अर्थ है

वस्तुओं पर अपनी आन्तरिक निर्भरता का क्षय।

जब मनुष्य का सुख बाहरी परिस्थितियों पर निर्भर नहीं रहता, तब उसके भीतर एक सहज प्रसन्नता जन्म लेने लगती है।

यह प्रसन्नता दमन का परिणाम नहीं,

बल्कि स्वतंत्रता का परिणाम है।

चारों दर्शनों का तुलनात्मक अध्ययन

दर्शन

आनन्द की अवधारणा

मुख्य साधन

अंतिम लक्ष्य

न्याय

दुःख की निवृत्ति के पश्चात् अपवर्ग

यथार्थ ज्ञान, तर्क, प्रमाण

अपवर्ग

पूर्वमीमांसा

धर्मानुकूल जीवन से कल्याण

वैदिक कर्म, कर्तव्य

धर्मफल एवं कल्याण

सांख्य

पुरुष की स्वतंत्र स्थिति; कैवल्य में शान्ति

विवेकज्ञान

कैवल्य

योग

चित्तवृत्ति-निरोध से स्वरूपस्थिति

अभ्यास, वैराग्य, ध्यान

समाधि एवं कैवल्य

 

 

9. समन्वित दार्शनिक विश्लेषण

इन चारों दर्शनों का अध्ययन एक महत्त्वपूर्ण तथ्य स्पष्ट करता है।

इनमें से कोई भी दर्शन इन्द्रिय-सुख को जीवन का परम लक्ष्य नहीं मानता।

सभी यह स्वीकार करते हैं किअज्ञान, आसक्ति, मिथ्या तादात्म्य, अथवा चित्त की अशान्ति

मनुष्य को उसके वास्तविक संतुलन से दूर ले जाती है।

भले ही "आनन्द" शब्द का प्रयोग सभी ने समान रूप से किया हो, परन्तु चारों दर्शनों की साधना अन्ततः ऐसी अवस्था की ओर संकेत करती है जहाँ मनुष्य बाह्य निर्भरता से मुक्त होकर आन्तरिक स्थिरता प्राप्त करता है।

यही स्थिरता भारतीय चिन्तन में आनन्द की आधारभूमि है।

समापन : भारतीय दर्शन का साझा संकेत

वेदान्त कहता हैआनन्द आत्मा का स्वरूप है।

न्याय कहता हैमिथ्याज्ञान मिटे तो दुःख मिटता है।

मीमांसा कहती हैधर्मपूर्ण जीवन ही कल्याण का आधार है।

सांख्य कहता हैपुरुष को प्रकृति से अलग पहचानो।

योग कहता हैचित्त को शांत करो और अपने स्वरूप में स्थित हो जाओ।

मार्ग अलग हैं, शब्द अलग हैं, दार्शनिक प्रतिपादन भी अलग है; किन्तु सभी का संकेत एक ही दिशा में है

मनुष्य का वास्तविक कल्याण बाहरी संचय में नहीं, बल्कि भीतरी परिष्कार और आत्मिक स्वतंत्रता में निहित है।

अगले भाग की भूमिका

अब तक हमने वैदिक और आस्तिक भारतीय दर्शनों में आनन्द की अवधारणा का अध्ययन किया। किन्तु भारतीय दर्शन की परम्परा यहीं समाप्त नहीं होती।

बौद्ध दर्शन आत्मा को स्वीकार किए बिना निर्वाण की बात करता है। जैन दर्शन आत्मा को अनन्त आनन्दस्वरूप मानता है। कश्मीर शैव दर्शन सम्पूर्ण विश्व को शिव की आनन्दमयी अभिव्यक्ति के रूप में देखता है।

अगले भाग में हम इन तीनों परम्पराओं का तुलनात्मक अध्ययन करेंगे

"बौद्ध, जैन और कश्मीर शैव दर्शन में आनन्दनिर्वाण, आत्मानन्द और शिवानन्द की दार्शनिक मीमांसा।"

मुकेश श्रीवास्तव
(आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र)
(IS BLOG KE SABHEE LEKH BLOG HOLDER KE HAIN)

 

 

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