चिंतन — अध्याय–28 : आनन्द क्या है? — भाग–8 : प्रेम, करुणा और सौन्दर्य का आनन्द

चिंतनअध्याय–28 : आनन्द क्या है? — भाग–8 : प्रेम, करुणा और सौन्दर्य का आनन्दभक्ति, कला, संगीत और सृजन के आलोक में एक दार्शनिक अध्ययन

क्या प्रेम स्वयं आनन्द है?

यदि किसी मनुष्य से पूछा जाए कि उसने अपने जीवन में सबसे गहरा आनन्द कब अनुभव किया, तो सम्भवतः वह किसी वस्तु की प्राप्ति का उल्लेख नहीं करेगा।

वह कहेगा

  • जब पहली बार माँ ने उसे अपनी गोद में लिया।
  • जब उसने अपने बच्चे को मुस्कुराते देखा।
  • जब किसी ने बिना किसी स्वार्थ के उसका हाथ थाम लिया।
  • जब किसी राग ने उसकी आँखों में आँसू भर दिए।
  • जब किसी कविता ने उसके भीतर सोई हुई संवेदनाओं को जगा दिया।
  • जब किसी पर्वत, नदी, आकाश या सूर्यास्त को देखकर वह कुछ क्षणों के लिए स्वयं को भूल गया।

इन सभी अनुभवों में एक समान तत्व हैमनुष्य कुछ क्षणों के लिए अपने सीमित 'मैं' से बाहर निकल जाता है।

यही कारण है कि भारतीय दर्शन में प्रेम, करुणा, सौन्दर्य और भक्ति को केवल भावनाएँ नहीं माना गया; इन्हें चेतना के विस्तार के रूप में देखा गया है।

प्रेम : अधिकार नहीं, विस्तार

सामान्य जीवन में प्रेम को प्रायः सम्बन्ध, आकर्षण या अधिकार के रूप में समझा जाता है।

किन्तु दार्शनिक दृष्टि से प्रेम का अर्थ इससे कहीं अधिक व्यापक है।

जहाँ 'मैं' और 'मेरा' की सीमाएँ ढीली पड़ने लगती हैं, वहाँ प्रेम जन्म लेता है।

प्रेम का सबसे बड़ा चमत्कार यह है कि वह मनुष्य को स्वयं के केन्द्र से उठाकर दूसरे के अस्तित्व से जोड़ देता है।

इसीलिए प्रेम में मिलने वाला आनन्द किसी वस्तु की प्राप्ति का आनन्द नहीं होता।

वह स्वयं के विस्तार का आनन्द होता है।

उपनिषद् का प्रसिद्ध वाक्य इस सत्य को अत्यन्त सूक्ष्म रूप में व्यक्त करता है

" वा अरे पत्युः कामाय पतिः प्रियो भवति, आत्मनस्तु कामाय पतिः प्रियो भवति।"
(बृहदारण्यकोपनिषद् 2.4.5)

अर्थ"पति, पति के कारण प्रिय नहीं है; वह आत्मा के कारण प्रिय है।"

इसी प्रकारपत्नी, पुत्र, मित्र, धन, ज्ञानसब अन्ततः उस आत्मीयता के कारण प्रिय हैं, जो हमारे भीतर विद्यमान है।

करुणा : दूसरे के दुःख में अपना हृदय देखना

यदि प्रेम आत्मीयता का विस्तार है, तो करुणा उस आत्मीयता की सक्रिय अभिव्यक्ति है।

करुणा दया नहीं है। दया में ऊपर और नीचे का भाव हो सकता है।

करुणा में समानता का भाव होता है। बुद्ध के सम्पूर्ण जीवन का आधार करुणा है।

उन्होंने कहादूसरों के दुःख को देखकर यदि हमारा हृदय नहीं बदलता, तो हमारा ज्ञान अधूरा है।

इसीलिए महायान बौद्ध परम्परा में करुणा स्वयं साधना बन जाती है।

आश्चर्य की बात यह है किदूसरों के लिए जीने वाला व्यक्ति प्रायः भीतर से अधिक आनन्दित होता है।

आधुनिक मनोविज्ञान भी इसे Helper's High कहता है।

अर्थात् निःस्वार्थ सेवा स्वयं गहरे मानसिक संतोष और प्रसन्नता का स्रोत बनती है।

सौन्दर्य : जब सत्य अनुभूति बन जाता है

सौन्दर्य केवल देखने की वस्तु नहीं है। वह देखने की एक विशेष अवस्था भी है।

एक ही पर्वत को हजार लोग देखते हैं, किन्तु सभी समान सौन्दर्य का अनुभव नहीं करते।

क्यों? क्योंकि सौन्दर्य केवल वस्तु में नहीं, दृष्टि में भी होता है।

भारतीय सौन्दर्यशास्त्र का यह मूल सिद्धान्त है कि

रस की अनुभूति तभी होती है, जब दर्शक का चित्त उस अनुभव के साथ एकात्म हो जाता है।

इसीलिए सौन्दर्य का आनन्द वस्तु से कम, और चेतना की ग्रहणशीलता से अधिक सम्बन्धित है।

रस सिद्धान्त और आनन्द

भरतमुनि के नाट्यशास्त्र और अभिनवगुप्त के अभिनवभारती में रस का सिद्धान्त भारतीय सौन्दर्य-दर्शन का शिखर माना जाता है।

रस क्या है? अभिनवगुप्त के अनुसार

जब व्यक्तिगत भाव सार्वभौमिक अनुभव में रूपान्तरित हो जाता है, तब रस उत्पन्न होता है।

करुण रस देखते समय दर्शक वास्तव में दुःखी नहीं होता, फिर भी उसकी आँखों में आँसू जाते हैं।

वीर रस देखते समय वह युद्ध नहीं कर रहा होता, फिर भी उसके भीतर साहस जाग उठता है।

यही रसानुभूति है।

अभिनवगुप्त ने रस को "ब्रह्मानन्दसहोदर" कहा है।

अर्थात्रस का आनन्द ब्रह्मानन्द का सहोदर (समान प्रकृति का) अनुभव है।

यह कथन अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। यह कला और अध्यात्म के बीच एक अद्भुत सेतु स्थापित करता है।

संगीत का आनन्द : शब्द से मौन तक

संगीत केवल ध्वनि नहीं है। वह ध्वनि और मौन के बीच का संवाद है।

भारतीय संगीत परम्परा में राग केवल सुरों का संयोजन नहीं, बल्कि चेतना की विशिष्ट अवस्था है।

कभी-कभी एक आलाप सुनते-सुनते मनुष्य समय का बोध भूल जाता है।

वह किसी वस्तु को प्राप्त कर रहा होता है, कोई इच्छा पूरी हो रही होती है।

फिर भी वह गहरे आनन्द से भर उठता है।

यह अनुभव बताता है कि

आनन्द का स्रोत बाहरी उपलब्धि नहीं, बल्कि चेतना की लयात्मक एकाग्रता भी हो सकता है।

भक्ति : प्रेम का आध्यात्मिक रूपान्तरण

भारतीय परम्परा में यदि प्रेम का सर्वोच्च रूप कहीं दिखाई देता है, तो वह भक्ति में है।

नारद भक्ति सूत्र कहते हैं"सा त्वस्मिन् परमप्रेमरूपा।"

अर्थ"भक्ति परम प्रेम का स्वरूप है।"

भक्ति का आनन्द किसी चमत्कार में नहीं, समर्पण में है।

मीरा के लिए कृष्ण केवल आराध्य नहीं, जीवन की धड़कन थे।

चैतन्य महाप्रभु का कीर्तन केवल संगीत नहीं, आनन्द का विस्फोट था।

तुलसीदास, सूरदास, नामदेव, तुकाराम, रामकृष्ण परमहंसइन सभी के जीवन में भक्ति आनन्द का माध्यम नहीं,

स्वयं आनन्द का रूप बन गई।

सृजन का आनन्द

एक वैज्ञानिक जब किसी नई खोज तक पहुँचता है,

एक कवि जब कविता पूरी करता है,

एक चित्रकार जब चित्र में जीवन का स्पर्श अनुभव करता है,

एक शिल्पी जब पत्थर में छिपी आकृति को मुक्त करता है

तब जो आनन्द उत्पन्न होता है, वह केवल सफलता का आनन्द नहीं होता।

वह सृजन का आनन्द होता है।

सृजन के क्षणों में मनुष्य स्वयं को किसी बड़े प्रवाह का माध्यम अनुभव करता है।

आधुनिक मनोविज्ञान इसे Flow Experience कहता है,

जिसका विस्तृत अध्ययन हम अगले अध्यायों में करेंगे।

क्या प्रेम, करुणा और सौन्दर्य एक ही स्रोत से आते हैं?

यदि इन तीनों का सूक्ष्म अध्ययन किया जाए, तो एक समानता स्पष्ट दिखाई देती है।

प्रेम मेंअहंकार छोटा होता है।

करुणा मेंस्वार्थ छोटा होता है।

सौन्दर्य मेंविचार छोटा होता है।

तीनों अवस्थाओं में चेतना अधिक विस्तृत, अधिक ग्रहणशील और अधिक एकात्म हो जाती है।

यही विस्तार आनन्द का आधार बनता है।

समन्वित दार्शनिक विश्लेषण

भारतीय दर्शन हमें यह नहीं सिखाता कि आनन्द केवल ध्यान में मिलेगा।

वह यह भी बताता है किप्रेम में, करुणा में, संगीत में, कला में, प्रकृति में, सेवा में, और सृजन में भी मनुष्य उसी आन्तरिक पूर्णता की झलक देख सकता है।

अन्तर केवल इतना है किइन अनुभवों में आनन्द कभी क्षणिक होता है, तो कभी स्थायी।

यदि चेतना बाहरी माध्यम पर निर्भर रहती है, तो आनन्द भी उसी माध्यम के साथ चला जाता है।

किन्तु यदि मनुष्य उस आन्तरिक स्रोत को पहचान ले, तो वही अनुभव आध्यात्मिक दिशा ग्रहण कर सकता है।

आनन्द का सौन्दर्य-दर्शन

इस भाग का निष्कर्ष यह नहीं है किप्रेम ही आनन्द है, या कला ही आनन्द है।

बल्कि यह है

प्रेम, करुणा, सौन्दर्य, संगीत और सृजन वे खिड़कियाँ हैं जिनसे मनुष्य पहली बार अपने भीतर विद्यमान उस मौन आनन्द की झलक देखता है, जो किसी वस्तु का नहीं, बल्कि स्वयं चेतना के विस्तार का अनुभव है।

इसलिए भारतीय परम्परा में प्रेम साधना बन सकता है, कला ध्यान बन सकती है, संगीत प्रार्थना बन सकता है,

और करुणा मुक्ति का मार्ग बन सकती है।

अगले भाग की भूमिका

अब तक हमने भारतीय परम्पराओं में आनन्द का अध्ययन किया। किन्तु क्या पश्चिमी दर्शन भी आनन्द को इसी प्रकार समझता है?

अरस्तू का Eudaimonia क्या है? एपिक्यूरस का सुखवाद और स्टोइकों की आन्तरिक स्वतंत्रता में क्या अन्तर है? स्पिनोज़ा, नीत्शे, बर्ट्रेंड रसेल और आधुनिक Happiness Studies आनन्द को किस रूप में देखते हैं?

अगले भाग में हम अध्ययन करेंगे

"आधुनिक दर्शन और Philosophy of Happiness — यूनानी दर्शन से समकालीन Happiness Studies तक आनन्द की यात्रा।"

मुकेश श्रीवास्तव
(आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र)
(IS BLOG KE SABHEE LEKH BLOG HOLDER KE HAIN)

 


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