चिंतन - अध्याय–4 : चेतना क्या है? भाग–3 : बौद्ध, जैन और कश्मीर शैव दर्शन की दृष्टि

चिंतन - मनुष्य से आत्मबोध तक की दार्शनिक यात्रा - अध्याय–4 : चेतना क्या है? भाग–3 : बौद्ध, जैन और कश्मीर शैव दर्शन की दृष्टि

"चेतना को समझना केवल यह जानना नहीं कि हम जानते हैं; बल्कि यह समझना भी है कि 'जानना' वास्तव में क्या है।"


चेतना का प्रश्न : एक नहीं, अनेक उत्तर

भारतीय दर्शन में चेतना को लेकर पूर्ण सहमति नहीं है।

कहीं उसे आत्मा का स्वरूप कहा गया। कहीं जीव का स्वभाव। कहीं शिव की अनंत शक्ति।

और कहीं उसे क्षण-क्षण उत्पन्न होने वाली प्रक्रिया के रूप में समझाया गया।

यह विविधता भारतीय चिंतन की कमजोरी नहीं, उसकी बौद्धिक समृद्धि है।

बौद्ध दर्शन : चेतना एक प्रवाह है

बौद्ध दर्शन में चेतना के लिए सामान्यतः "विज्ञान" (Vijñāna) शब्द का प्रयोग किया जाता है।

यहाँ विज्ञान का अर्थ आधुनिक "Science" नहीं, बल्कि चेतन अनुभव है।

बुद्ध के अनुसार चेतना कोई स्थायी सत्ता नहीं है।वह प्रत्येक क्षण उत्पन्न होती है,और अगले ही क्षण बदल जाती है।

जिस प्रकार नदी निरंतर बहती रहती है, किन्तु उसका जल प्रत्येक क्षण नया होता है,उसी प्रकार चेतना भी एक सतत प्रवाह है।

इसलिए बौद्ध दर्शन चेतना को किसी शाश्वत आत्मा का प्रमाण नहीं मानता।

वह उसे परस्पर-निर्भर कारणों से उत्पन्न होने वाली प्रक्रिया के रूप में देखता है।

विज्ञान और प्रतीत्यसमुत्पाद

बौद्ध दर्शन में चेतना अकेली उत्पन्न नहीं होती। वह अनेक कारणों और परिस्थितियों पर निर्भर करती है।

इसे प्रतीत्यसमुत्पाद के सिद्धांत से समझाया जाता है।

जब इन्द्रिय, उसका विषय, और उनके संपर्क की स्थिति उपस्थित होती है, तब चेतन अनुभव उत्पन्न होता है।

इस प्रकार चेतना कोई स्वतंत्र, शाश्वत सत्ता नहीं, बल्कि संबंधों से उत्पन्न होने वाली घटना है।

जैन दर्शन : चेतना जीव का स्वभाव है

बौद्ध दर्शन से भिन्न, जैन दर्शन चेतना को जीव का मूल गुण मानता है।

जीव स्वभावतः चेतन है। ज्ञान उसका स्वाभाविक धर्म है।

दर्शन (प्रत्यक्ष ग्रहण) उसकी अंतर्निहित क्षमता है।

किन्तु कर्मों का आवरण इस चेतना को सीमित कर देता है।

जब कर्मबंध समाप्त होता है, तो जीव का ज्ञान और दर्शन पूर्ण रूप से प्रकट हो जाते हैं।

अतः जैन दर्शन में चेतना अर्जित नहीं की जाती, बल्कि आवरण हटने पर प्रकट होती है।

चेतना और कर्म

जैन दर्शन का एक महत्वपूर्ण योगदान यह है कि वह चेतना को केवल दार्शनिक विषय नहीं रहने देता।

उसे नैतिक उत्तरदायित्व से जोड़ता है।

चेतना जितनी निर्मल होगी, उतना ही सही ज्ञान संभव होगा।

और जितना सही ज्ञान होगा, उतना ही कर्मबंधन कम होगा।

इस प्रकार ज्ञान, आचरण और मुक्ति—तीनों चेतना से जुड़े हुए हैं।

कश्मीर शैव दर्शन : चित् ही परम वास्तविकता

कश्मीर शैव दर्शन में चेतना को "चित्" कहा गया है।

यह केवल जानने की शक्ति नहीं।

यह स्वयं परम वास्तविकता है।

परमशिव चित् हैं— स्वतंत्र, स्वप्रकाश, अनंत, और सृजनशील।

सम्पूर्ण जगत उसी चित् की अभिव्यक्ति है।

यहाँ संसार चेतना से अलग नहीं है, वह उसी का विस्तार है।

इसलिए कश्मीर शैव दर्शन में जगत का निषेध नहीं, उसकी दिव्यता की स्वीकृति है।

प्रकाश और विमर्श

कश्मीर शैव दर्शन का एक अत्यंत सूक्ष्म सिद्धांत है— प्रकाश और विमर्श

प्रकाश का अर्थ है— स्वयं प्रकाशित होना।

विमर्श का अर्थ है— स्वयं को जानने की क्षमता।

यदि केवल प्रकाश हो, और स्वयं की अनुभूति न हो, तो पूर्ण चेतना नहीं कही जा सकती।

कश्मीर शैव दर्शन कहता है कि परमशिव केवल प्रकाशित नहीं हैं, वे स्वयं को भी जानते हैं।

इसी स्वानुभूति से सम्पूर्ण सृष्टि का विस्तार होता है।

यह भारतीय दर्शन में चेतना की सबसे सूक्ष्म और परिष्कृत व्याख्याओं में से एक मानी जाती है।

तीनों दर्शनों का तुलनात्मक अध्ययन

यदि इन तीनों परंपराओं को साथ रखें, तो एक अत्यंत रोचक चित्र उभरता है।

बौद्ध दर्शन कहता है— चेतना क्षण-क्षण उत्पन्न होने वाली प्रक्रिया है।

जैन दर्शन कहता है— चेतना जीव का स्वाभाविक गुण है, जो कर्मों से आच्छादित हो जाता है।

कश्मीर शैव दर्शन कहता है— चेतना ही परम वास्तविकता है, और सम्पूर्ण जगत उसी की अभिव्यक्ति है।

तीनों की भाषा अलग है। तीनों के निष्कर्ष अलग हैं।

किन्तु तीनों यह स्वीकार करते हैं कि चेतना को केवल शरीर की यांत्रिक क्रिया मान लेना पर्याप्त नहीं है।

आधुनिक संदर्भ में इन दर्शनों का महत्व

आज चेतना का अध्ययन केवल दर्शन तक सीमित नहीं है।

तंत्रिका-विज्ञान, मनोविज्ञान, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, और संज्ञान-विज्ञान—

सभी इस प्रश्न से जूझ रहे हैं कि अनुभव कैसे उत्पन्न होता है।

बौद्ध दर्शन अनुभव की क्षणभंगुरता को समझने में सहायता करता है।

जैन दर्शन नैतिक चेतना और उत्तरदायित्व पर बल देता है।

कश्मीर शैव दर्शन चेतना की सृजनात्मक और सार्वभौमिक प्रकृति की ओर संकेत करता है।

इन तीनों की अंतर्दृष्टियाँ आज भी दार्शनिक और वैज्ञानिक संवाद को समृद्ध कर सकती हैं।

मुख्य दार्शनिक निष्कर्ष

  • बौद्ध दर्शन में चेतना (विज्ञान) क्षणिक और परतंत्र है।

  • जैन दर्शन में चेतना जीव का स्वाभाविक गुण है।

  • कश्मीर शैव दर्शन में चित् ही परमशिव का स्वरूप है।

  • तीनों परंपराएँ चेतना की व्याख्या अलग आधारों पर करती हैं।

  • इसलिए "चेतना" का एक सार्वभौमिक दार्शनिक अर्थ निर्धारित करना सरल नहीं है।

इस भाग का सार

बौद्ध दर्शन चेतना को क्षण-क्षण उत्पन्न होने वाली परस्पर-निर्भर प्रक्रिया के रूप में देखता है। जैन दर्शन चेतना को जीव का मूल स्वभाव मानता है, जो कर्मों से आच्छादित हो जाता है। कश्मीर शैव दर्शन चेतना को चित् के रूप में परम वास्तविकता स्वीकार करता है, जहाँ सम्पूर्ण जगत उसी की सृजनात्मक अभिव्यक्ति है। इन तीनों दृष्टियों से स्पष्ट होता है कि चेतना का प्रश्न भारतीय दर्शन में अत्यंत समृद्ध, बहुआयामी और गहन विमर्श का विषय है।

मुकेश ,,,,,,,,,,,,

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