चिंतन - अध्याय–5 : मन क्या है? भाग–2 : वैदिक साहित्य, उपनिषद, वेदान्त, सांख्य और योग की दृष्टि

अब हम इस अध्याय के सबसे महत्वपूर्ण शास्त्रीय भाग में प्रवेश करते हैं। यहाँ विशेष सावधानी आवश्यक है, क्योंकि सामान्य पुस्तकों में मन, चित्त, बुद्धि और अहंकार को एक-दूसरे का पर्याय मान लिया जाता है, जबकि भारतीय दर्शन में इनका पृथक-पृथक स्वरूप है।

एक और महत्वपूर्ण बात—

वेदों में "मनस्" है, पर विकसित "अन्तःकरण सिद्धान्त" नहीं।

अन्तःकरण-चतुष्टय (मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार) का व्यवस्थित स्वरूप मुख्यतः उत्तरवर्ती वेदान्त, सांख्य और योग की परम्पराओं में विकसित हुआ। इस ऐतिहासिक क्रम को बनाए रखना इस ग्रंथ की शास्त्रीय विश्वसनीयता के लिए आवश्यक है।


चिंतन -मनुष्य से आत्मबोध तक की दार्शनिक यात्रा

अध्याय–5 : मन क्या है? -भाग–2 : वैदिक साहित्य, उपनिषद, वेदान्त, सांख्य और योग की दृष्टि

"मन संसार का दर्पण नहीं है; वह वह माध्यम है जिसके द्वारा संसार हमारे लिए अर्थ ग्रहण करता है।"


वैदिक साहित्य : मनस् की प्रथम झलक

वेदों में मनस् का उल्लेख अनेक स्थानों पर मिलता है।

किन्तु यहाँ मन का कोई व्यवस्थित मनोवैज्ञानिक सिद्धांत प्रस्तुत नहीं किया गया।

ऋषियों के लिए मन प्रार्थना का भी विषय है, संकल्प का भी, ध्यान का भी, और यज्ञ की आन्तरिक भावना का भी।

वेदों में मन को केवल सोचने वाली शक्ति नहीं माना गया।

वह इच्छा, संकल्प और प्रार्थना से भी जुड़ा है।

इसी कारण वैदिक ऋषि बार-बार मन की शुभ दिशा की कामना करते हैं।

उनके लिए मन केवल व्यक्तिगत अनुभव का साधन नहीं,

धर्ममय जीवन का भी आधार है।

उपनिषद : मन इन्द्रियों और आत्मा के बीच का सेतु

उपनिषदों में मन का स्वरूप अधिक स्पष्ट होने लगता है।

यहाँ मन को न आत्मा कहा गया है, न शरीर। वह दोनों के बीच कार्य करने वाला माध्यम है।

इन्द्रियाँ बाहरी विषयों का ग्रहण करती हैं।

मन उन्हें एकत्र करता है।

बुद्धि उनका निर्णय करती है।

आत्मा उनके प्रकाश में साक्षी रहती है।

इस प्रकार उपनिषद मन को अनुभव की आन्तरिक व्यवस्था का एक महत्त्वपूर्ण अंग मानते हैं।

विशेषतः कठोपनिषद में रथ-रूपक के माध्यम से यह समझाया गया है कि इन्द्रियाँ घोड़े हैं, मन लगाम है, बुद्धि सारथि है और आत्मा रथी है।

यह रूपक मन के स्थान को अत्यंत सुंदर ढंग से स्पष्ट करता है।

वेदान्त : अन्तःकरण का एक आयाम

वेदान्त में मन अकेला नहीं है। वह अन्तःकरण का एक अंग है।

अन्तःकरण के चार कार्य बताए जाते हैं—

  • मन — संकल्प-विकल्प करता है।

  • बुद्धि — निर्णय करती है।

  • चित्त — स्मृति और संस्कारों का आधार है।

  • अहंकार — "मैं" और "मेरा" की अनुभूति का केंद्र है।

ध्यान देने योग्य बात यह है कि ये चार अलग-अलग पदार्थ नहीं हैं।

ये अन्तःकरण की चार प्रमुख कार्य-प्रवृत्तियाँ हैं।

जब अन्तःकरण विचार करता है, उसे मन कहते हैं।

जब निर्णय करता है, उसे बुद्धि कहते हैं।

जब स्मरण करता है, उसे चित्त कहते हैं।

और जब स्वयं को किसी अनुभव से जोड़ता है, उसे अहंकार कहते हैं।

यह व्याख्या भारतीय मनोदर्शन की अत्यंत सूक्ष्म उपलब्धि है।

सांख्य दर्शन : मन प्रकृति का विकार

सांख्य दर्शन मन को चेतन नहीं मानता।

यह बात पहली बार सुनने पर आश्चर्यजनक लग सकती है।

सांख्य के अनुसार मन, बुद्धि और अहंकार—तीनों प्रकृति से उत्पन्न हुए हैं।

अर्थात वे जड़ तत्त्व हैं।

फिर वे सचेत क्यों प्रतीत होते हैं?

क्योंकि वे पुरुष की चेतना के निकट हैं।

जैसे चन्द्रमा स्वयं प्रकाशमान नहीं होता, किन्तु सूर्य का प्रकाश ग्रहण करके प्रकाशित दिखाई देता है, उसी प्रकार मन स्वयं चेतन नहीं है, पर पुरुष के सान्निध्य में चेतन-सा प्रतीत होता है।

यह सांख्य दर्शन की अत्यंत मौलिक स्थापना है।

योग दर्शन : मन का अनुशासन

पतंजलि का योग दर्शन मन का विश्लेषण करने के साथ-साथ उसे रूपांतरित करने की विधि भी प्रस्तुत करता है।

योग का उद्देश्य मन का दमन नहीं है।

न ही विचारों का हिंसक निषेध।

योग का उद्देश्य है— मन की चंचलता को समझना, उसे संयमित करना, और अंततः उसे इतना निर्मल बनाना कि द्रष्टा अपने वास्तविक स्वरूप में स्थित हो सके।

इसलिए योग में मन साधना का क्षेत्र है, शत्रु नहीं।

मन : मित्र भी, बाधा भी

भारतीय परंपरा मन की दो संभावनाओं को स्वीकार करती है।

असंयमित मन— भ्रम उत्पन्न करता है, आसक्ति बढ़ाता है, दुःख का कारण बनता है।

संयमित मन— ज्ञान का साधन बनता है, ध्यान में सहायक होता है, और आत्मबोध की दिशा खोलता है।

इसलिए समस्या मन का अस्तित्व नहीं, उसकी दिशा है।

पाँचों परम्पराओं का तुलनात्मक अध्ययन

यदि इन पाँच दृष्टियों को साथ रखें, तो एक सुंदर क्रम उभरता है।

वेद मन को संकल्प और प्रार्थना की शक्ति के रूप में देखते हैं।

उपनिषद उसे इन्द्रियों और आत्मा के बीच का सेतु मानते हैं।

वेदान्त मन को अन्तःकरण की एक कार्य-प्रवृत्ति के रूप में समझाता है।

सांख्य उसे प्रकृति का सूक्ष्म विकार मानता है।

योग मन को साधना और आत्मपरिवर्तन का क्षेत्र बनाता है।

इन सभी में मतभेद हैं, किन्तु एक बात समान है— मन को समझे बिना मनुष्य को नहीं समझा जा सकता।

मुख्य दार्शनिक निष्कर्ष

  • वेदों में मनस् का उल्लेख है, पर विकसित अन्तःकरण सिद्धान्त नहीं।

  • उपनिषद मन को इन्द्रियों और आत्मा के बीच का सेतु मानते हैं।

  • वेदान्त में मन अन्तःकरण की एक कार्य-प्रवृत्ति है।

  • सांख्य में मन प्रकृति से उत्पन्न सूक्ष्म तत्त्व है, पुरुष नहीं।

  • योग मन को अनुशासित कर आत्मबोध की दिशा खोलता है।

वैदिक साहित्य में मन संकल्प, प्रार्थना और आन्तरिक प्रेरणा का माध्यम है। उपनिषद उसे इन्द्रियों और आत्मा के बीच स्थित सेतु के रूप में प्रस्तुत करते हैं। वेदान्त अन्तःकरण के चार कार्यों में मन को संकल्प-विकल्प की शक्ति मानता है। सांख्य दर्शन मन को प्रकृति का सूक्ष्म विकार बताता है, जबकि योग दर्शन मन को साधना और आत्मपरिवर्तन का क्षेत्र बनाता है। इन सभी दृष्टियों से स्पष्ट होता है कि मन केवल विचारों का समूह नहीं, बल्कि मानव-अनुभव की एक अत्यंत जटिल और बहुआयामी आन्तरिक व्यवस्था है।

चिंतन-प्रश्न

  1. यदि मन प्रकृति का विकार है, तो उसमें चेतना का अनुभव कैसे होता है?

  2. क्या मन वास्तव में इन्द्रियों और आत्मा के बीच सेतु है, या यह केवल दार्शनिक रूपक है?

  3. क्या मन के बिना अनुभव संभव है?

  4. क्या मन का अनुशासन ज्ञान से आता है या अभ्यास से?

  5. क्या आधुनिक मनोविज्ञान का "Mind" भारतीय "मनस्" के समान है?

मुकेश ,,,,,,,,,,,,

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