चिंतन - क्या साक्षी होना जीवन की सबसे कठिन साधना है?

 चिंतन - क्या साक्षी होना जीवन की सबसे कठिन साधना है?

मनुष्य जीवन भर कुछ-न-कुछ बनना चाहता है।

कभी सफल।

कभी प्रसिद्ध।

कभी विजेता।

कभी ज्ञानी।

पर भारतीय दर्शन एक ऐसा मार्ग भी दिखाता है, जहाँ मनुष्य को कुछ बनने की नहीं, केवल देखने की साधना करनी होती है।

तभी मेरे भीतर एक प्रश्न जन्म लेता है—क्या साक्षी होना जीवन की सबसे कठिन साधना है?

देखना बहुत सरल लगता है।

पर वास्तव में देखना अत्यंत कठिन है।

हम वस्तुओं को नहीं देखते।

हम उनके बारे में अपनी धारणाओं को देखते हैं।

हम मनुष्यों को नहीं देखते।

हम उनसे जुड़ी अपनी अपेक्षाओं को देखते हैं।

हम घटनाओं को नहीं देखते।

हम अपने लाभ और हानि के चश्मे से उन्हें देखते हैं।

यही कारण है कि हमारी दृष्टि प्रायः साक्षी नहीं बन पाती।

वह पक्ष बन जाती है।

साक्षी का अर्थ उदासीन होना नहीं है।

उदासीन व्यक्ति दूर चला जाता है।

साक्षी उपस्थित रहता है।

वह सब देखता है।

सब समझता है।

पर भीतर से बँधता नहीं।

कमल जल में रहता है,

पर जल उसे भिगो नहीं पाता।

आकाश बादलों को स्थान देता है,

पर किसी बादल का रंग अपना नहीं बनाता।

सूर्य हर दिशा में समान प्रकाश देता है,

पर किसी एक खिड़की का नहीं हो जाता।

शायद साक्षीभाव भी ऐसा ही है।

उसमें सहभागिता है,

पर आसक्ति नहीं।

आज का मनुष्य हर घटना में तुरंत पक्ष चुन लेता है।

हर विवाद में निर्णय सुना देता है।

हर विचार पर प्रतिक्रिया दे देता है।

वह ठहरकर देखना भूल गया है।

जबकि अनेक बार सत्य पहली दृष्टि में दिखाई नहीं देता।

उसे समय चाहिए।

मौन चाहिए।

और निष्पक्षता चाहिए।

भारतीय दर्शन में साक्षी को आत्मा का स्वभाव कहा गया है।

मन प्रसन्न होता है।

मन दुखी होता है।

शरीर युवा होता है।

शरीर वृद्ध होता है।

विचार बदलते हैं।

भावनाएँ बदलती हैं।

पर इनके पीछे कुछ ऐसा भी है, जो केवल देखता रहता है।

जो बचपन में भी था।

युवावस्था में भी है।

और वृद्धावस्था में भी रहेगा।

उसी को ऋषियों ने साक्षी कहा।

मुझे कभी-कभी लगता है कि जीवन की अधिकांश पीड़ाएँ घटनाओं से नहीं जन्मतीं।

वे उनसे हमारी पहचान जुड़ जाने से जन्मती हैं।

हम कहते हैं—

"मैं असफल हूँ।"

जबकि सत्य यह है—

"मुझे इस प्रयास में असफलता मिली है।"

हम कहते हैं—

"मैं दुख हूँ।"

जबकि सत्य यह है—

"मेरे भीतर इस समय दुःख का अनुभव हो रहा है।"

यह छोटा-सा अंतर ही साक्षी और आसक्ति का अंतर है।

जिस दिन यह अंतर स्पष्ट हो जाता है,

उसी दिन जीवन का भार थोड़ा हल्का हो जाता है।

साक्षी होना जीवन से भागना नहीं है।

यह जीवन के बीचों-बीच खड़े होकर भी स्वयं को न खोने की कला है।

युद्ध में अर्जुन को युद्ध छोड़ने के लिए नहीं कहा गया।

उन्हें अपने मोह से ऊपर उठकर देखने के लिए कहा गया।

यही साक्षीभाव का प्रारंभ है।

अंततः साक्षी होना कोई दार्शनिक अवधारणा नहीं।

यह जीने की एक परिपक्व शैली है।

जहाँ सफलता आए, तो अहंकार न बने।

असफलता आए, तो आत्मग्लानि न बने।

प्रशंसा मिले, तो मद न बने।

आलोचना मिले, तो विष न बने।

तब मनुष्य परिस्थितियों का दास नहीं रहता।

वह उनका दर्शक भी नहीं—

सजग सहभागी बन जाता है।

तभी लगता है—

साक्षी होना जीवन की सबसे कठिन साधना है।

क्योंकि संसार को बदलना कठिन हो सकता है,

पर स्वयं को देखते हुए भी स्वयं में न उलझना—

उससे कहीं अधिक कठिन है।

और शायद इसी कठिनाई के पार

वह शांति प्रतीक्षा करती है,

जिसे भारतीय मनीषा ने मुक्ति कहा है।

— मुकेश

Comments

Popular posts from this blog

एक मुसाफिर की डायरी से --------------

एकांत एक नदी है

बात दोनों तरफ हो तो मज़ा देता है