ईशावास्योपनिषद् के तृतीय मन्त्र की मीमांसात्मक व्याख्या
ईशावास्योपनिषद् के तृतीय मन्त्र की मीमांसात्मक व्याख्या
अविद्या, आत्मविस्मृति और आध्यात्मिक पतन का दार्शनिक विवेचन
ईशावास्योपनिषद् का तृतीय मन्त्र प्रथम और द्वितीय मन्त्रों के उपदेश का स्वाभाविक परिणाम प्रस्तुत करता है। प्रथम मन्त्र में उपनिषद् ने ईश्वरव्याप्ति का दर्शन कराया, द्वितीय मन्त्र में कर्तव्य-कर्म के माध्यम से जीवन को पवित्र बनाने का मार्ग बताया और अब तृतीय मन्त्र यह स्पष्ट करता है कि जो मनुष्य इस दिव्य दृष्टि की उपेक्षा करता है, उसका आध्यात्मिक परिणाम क्या होता है। इस प्रकार यह मन्त्र भय उत्पन्न करने के लिए नहीं, बल्कि आत्मविद्या की अनिवार्यता को स्थापित करने के लिए कहा गया है।
मन्त्र है—
"असुर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसाऽवृताः।
ताँस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चात्महनो जनाः॥"
सामान्य अर्थ में इस मन्त्र का आशय यह बताया जाता है कि जो आत्मा का नाश करने वाले हैं, वे मृत्यु के पश्चात् अन्धकारमय लोकों को प्राप्त होते हैं। किन्तु मीमांसात्मक दृष्टि से इस मन्त्र का वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या यहाँ किसी परलोक का वर्णन किया जा रहा है, अथवा मनुष्य की आध्यात्मिक स्थिति का दार्शनिक निरूपण किया जा रहा है? यदि वेद का प्रत्येक वाक्य प्रयोजनयुक्त है, तो इस मन्त्र का प्रयोजन क्या है? क्या यह केवल भय दिखाकर धर्म का पालन कराना चाहता है, या यह मनुष्य की चेतना के पतन का सूक्ष्म विश्लेषण प्रस्तुत करता है?
महर्षि जैमिनि के मीमांसा-सूत्रों के अनुसार वैदिक वाक्य का अर्थ उसके प्रसंग और प्रयोजन से पृथक् नहीं किया जा सकता। तृतीय मन्त्र से पहले उपनिषद् ने ईश्वरव्याप्ति तथा निष्काम कर्म का प्रतिपादन किया है। यदि इन दोनों का उद्देश्य आत्मविद्या की ओर ले जाना है, तो तृतीय मन्त्र उसी मार्ग की उपेक्षा के परिणाम का वर्णन करता है। इस प्रकार यह मन्त्र स्वतंत्र नहीं है; यह पूर्ववर्ती मन्त्रों का अनिवार्य पूरक है। मीमांसा की भाषा में यही प्रकरण-संगति है, जो किसी वाक्य के तात्पर्य-निर्णय में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण मानी जाती है।
मन्त्र का प्रथम पद "असुर्या नाम ते लोका" विशेष ध्यान देने योग्य है। सामान्यतः "असुर" का अर्थ दैत्य या राक्षस लिया जाता है, किन्तु मीमांसात्मक दृष्टि से शब्द का अर्थ उसके प्रसंग से निर्धारित होता है। यहाँ "असुर्य" का आशय उस चेतना से है जहाँ आत्मप्रकाश का अभाव है। "सूर्य" प्रकाश का प्रतीक है और "असुर्य" उस अवस्था का द्योतक है जहाँ विवेक का प्रकाश नहीं पहुँचता। इसलिए इन लोकों को केवल किसी भौगोलिक या पारलौकिक स्थान के रूप में समझना पर्याप्त नहीं है; वे अज्ञान से आच्छन्न चेतना की अवस्थाओं का भी प्रतीक हैं।
"अन्धेन तमसा आवृताः"—यह पद भी गहन दार्शनिक अर्थ रखता है। यहाँ अन्धकार बाह्य प्रकाश का अभाव नहीं, बल्कि आत्मस्वरूप के अज्ञान का संकेत है। उपनिषद् बार-बार यह प्रतिपादित करता है कि मनुष्य का सबसे बड़ा संकट बाहरी अभाव नहीं, बल्कि आत्मविस्मृति है। जब मनुष्य स्वयं को केवल शरीर, मन या अहंकार तक सीमित कर लेता है, तब वह उसी अन्धकार में प्रवेश करता है जिसका उल्लेख इस मन्त्र में किया गया है। इसलिए यह अन्धकार ज्ञान के अभाव का दार्शनिक रूपक है।
मन्त्र का सबसे महत्त्वपूर्ण शब्द है—"आत्महनः"। पहली दृष्टि में यह विरोधाभासी प्रतीत होता है, क्योंकि आत्मा अविनाशी है; उसका वध कैसे सम्भव है? यहीं मीमांसा शब्दार्थ और तात्पर्यार्थ के भेद को सामने लाती है। यहाँ आत्मा का नाश नहीं, बल्कि आत्मा की उपेक्षा का बोध कराया गया है। जो मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप को जाने बिना केवल इन्द्रियसुख, अहंकार और स्वार्थ में जीवन व्यतीत करता है, वह आत्मा का विनाश नहीं करता, बल्कि आत्मविद्या की सम्भावना का स्वयं हनन करता है। इसीलिए उपनिषद् उसे "आत्महन्ता" कहता है।
शबरस्वामी की प्रयोजन-दृष्टि के अनुसार वैदिक वाक्य का लक्ष्य केवल सूचना देना नहीं होता, बल्कि साधक की बुद्धि को सत्य की ओर प्रवृत्त करना भी होता है। यदि इस मन्त्र में केवल अन्धकारमय लोकों का वर्णन होता, तो उसका प्रयोजन सीमित रह जाता। किन्तु "आत्महनः" शब्द के माध्यम से उपनिषद् साधक को यह चेतावनी देता है कि सबसे बड़ा विनाश बाहरी नहीं, बल्कि आत्मविस्मृति का है। यही इस मन्त्र का वास्तविक प्रयोजन है।
कुमारिल भट्ट की वाक्य-संगति की पद्धति से भी यही निष्कर्ष निकलता है। प्रथम मन्त्र में ईश्वर-दृष्टि, द्वितीय में निष्काम कर्म और तृतीय में आत्मविस्मृति का परिणाम—ये तीनों मिलकर एक अखण्ड दार्शनिक क्रम बनाते हैं। यदि तीसरे मन्त्र को केवल नरक-वर्णन मान लिया जाए, तो यह क्रम टूट जाता है। किन्तु जब इसे आत्मविद्या की उपेक्षा के परिणाम के रूप में समझा जाता है, तब सम्पूर्ण उपनिषद् का आन्तरिक तर्क पूर्णतः संगत हो जाता है।
प्रभाकराचार्य के मत में ज्ञान और आचरण का सम्बन्ध अभिन्न है। इस दृष्टि से आत्मविस्मृति केवल बौद्धिक त्रुटि नहीं, बल्कि सम्पूर्ण जीवन की दिशा को प्रभावित करने वाली भूल है। जो स्वयं को शरीर मात्र मानता है, उसके निर्णय, उसके सम्बन्ध, उसके लक्ष्य और उसके कर्म भी उसी सीमित दृष्टि से संचालित होते हैं। परिणामस्वरूप वह बाह्य उपलब्धियों के बीच रहते हुए भी आन्तरिक अशान्ति, भय और असन्तोष से मुक्त नहीं हो पाता। यही आध्यात्मिक अन्धकार है।
शंकराचार्य ने "आत्महनः" का अर्थ आत्मज्ञान से विमुख व्यक्ति किया है। वे स्पष्ट करते हैं कि आत्मा का वास्तविक विनाश असम्भव है, क्योंकि आत्मा नित्य और अविनाशी है। अतः यहाँ "हनन" का अर्थ आत्मस्वरूप की अवहेलना है। इस व्याख्या को मीमांसात्मक दृष्टि से भी बल मिलता है, क्योंकि शब्द का मुख्य अर्थ जहाँ असंगत हो, वहाँ प्रसंगानुकूल गौण अर्थ ग्रहण किया जाता है। यहाँ भी "हनन" का गौण अर्थ—आत्मविद्या की उपेक्षा—ही स्वीकार करना युक्तिसंगत है।
स्वामी परमार्थानन्द जी भी इस मन्त्र की व्याख्या करते हुए कहते हैं कि उपनिषद् का उद्देश्य भय उत्पन्न करना नहीं, बल्कि आत्मज्ञान के महत्त्व को रेखांकित करना है। मनुष्य जब अपने वास्तविक स्वरूप को भूल जाता है, तभी वह बाह्य वस्तुओं में स्थायी सुख खोजता है और अन्ततः निराशा, भय तथा असन्तोष का अनुभव करता है। इस प्रकार "असुर्य लोक" मृत्यु के बाद का ही नहीं, अज्ञानमय जीवन का भी प्रतीक बन जाता है।
समकालीन सन्दर्भ में यह मन्त्र अत्यन्त प्रासंगिक है। आज विज्ञान, तकनीक और भौतिक समृद्धि के अभूतपूर्व विकास के बावजूद मनुष्य के भीतर असुरक्षा, अकेलापन, हिंसा और मानसिक अशान्ति बढ़ती जा रही है। इसका मूल कारण बाहरी संसाधनों का अभाव नहीं, बल्कि आत्मबोध का अभाव है। उपनिषद् इस संकट की जड़ को पहचानता है और बताता है कि जो व्यक्ति अपने भीतर के चैतन्य से कट जाता है, वह बाहरी उपलब्धियों के बावजूद अन्धकार में ही जीवन व्यतीत करता है। इसलिए इस मन्त्र का सन्देश केवल परलोक के लिए नहीं, वर्तमान जीवन के लिए भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है।
अतः मीमांसात्मक दृष्टि से ईशावास्योपनिषद् का तृतीय मन्त्र किसी काल्पनिक दण्ड का वर्णन नहीं, बल्कि आत्मविस्मृति के दार्शनिक परिणाम का उद्घाटन है। जैमिनि की प्रकरण-संगति, शबरस्वामी की प्रयोजन-मीमांसा, कुमारिल भट्ट की वाक्य-एकता, प्रभाकर की ज्ञान-आधारित व्याख्या तथा शंकराचार्य के अद्वैत भाष्य—इन सबके आलोक में यह स्पष्ट होता है कि "आत्महनः" वह व्यक्ति है जो अपने वास्तविक स्वरूप की उपेक्षा करके अज्ञान में जीवन बिताता है। उसका अन्धकार किसी बाहरी लोक से अधिक उसकी अपनी चेतना की अवस्था है। इस प्रकार यह मन्त्र भय का नहीं, आत्मजागरण का मन्त्र है। यह मनुष्य को स्मरण कराता है कि सबसे बड़ी हानि धन, पद या शरीर की नहीं, बल्कि आत्मस्वरूप की विस्मृति है। उसी विस्मृति से समस्त बन्धन उत्पन्न होते हैं और उसी के निवारण से वास्तविक मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।
— मुकेश
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