चिंतन - क्या प्रेम का सर्वोच्च रूप सुख नहीं, सत्य है?

 चिंतन - क्या प्रेम का सर्वोच्च रूप सुख नहीं, सत्य है?

प्रेम की चर्चा होते ही मन में कोमलता, निकटता और आनंद के चित्र उभर आते हैं। हम प्रेम को प्रायः उस अनुभूति के रूप में देखते हैं, जो जीवन को सुंदर बना दे, अकेलेपन को भर दे और हृदय को प्रसन्न कर दे।

पर तभी मेरे भीतर एक प्रश्न जन्म लेता है—क्या प्रेम का सर्वोच्च रूप सुख नहीं, सत्य है?

सुख प्रेम का एक पुष्प हो सकता है,

पर उसकी जड़ नहीं।

यदि प्रेम केवल सुख देने के लिए हो,

तो वह परिस्थितियों का बंदी बन जाएगा।

जिस दिन सुख कम होगा,

प्रेम भी डगमगाने लगेगा।

पर जो प्रेम सत्य पर आधारित हो,

वह सुख और दुःख दोनों में अपना प्रकाश बनाए रखता है।

मुझे लगता है कि प्रेम का पहला दायित्व प्रसन्न करना नहीं,

जगाना है।

जो हमें हमारी दुर्बलताओं से परिचित न करा सके,

वह केवल आकर्षण हो सकता है,

प्रेम नहीं।

जो हमारी भूलों पर केवल मुस्कुरा दे,

पर हमें बेहतर मनुष्य बनने की प्रेरणा न दे,

वह साथ तो हो सकता है,

साधना नहीं।

सच्चा प्रेम कभी-कभी असुविधाजनक भी होता है।

वह प्रश्न पूछता है।

वह आईना दिखाता है।

वह हमारी आत्मा को उसकी संभावनाओं का स्मरण कराता है।

इसीलिए प्रेम केवल स्वीकार नहीं करता,

वह परिष्कार भी करता है।

प्रकृति को देखिए।

सूर्य केवल प्रकाश नहीं देता।

वह तपन भी देता है।

वर्षा केवल हरियाली नहीं लाती।

वह बाढ़ की चेतावनी भी देती है।

नदी केवल जल नहीं देती।

वह कठोर चट्टानों को भी तराशती है।

प्रकृति का प्रेम लाड़ नहीं है।

वह विकास है।

भारतीय परंपरा में गुरु और शिष्य का संबंध प्रेम का ही एक रूप है।

गुरु शिष्य को प्रसन्न रखने के लिए सत्य नहीं बदलता।

वह सत्य कहता है,

भले ही वह सुनने में कठिन लगे।

क्योंकि उसका प्रेम व्यक्ति की सुविधा से बड़ा होता है।

वह उसके जागरण की चिंता करता है।

मुझे कभी-कभी लगता है कि आज प्रेम का सबसे बड़ा संकट यह नहीं है कि प्रेम कम हो गया है।

संकट यह है कि हमने प्रेम को केवल भावनात्मक संतोष तक सीमित कर दिया है।

हम चाहते हैं कि कोई हमें समझे,

पर यह नहीं चाहते कि कोई हमें बदलने की प्रेरणा दे।

हम चाहते हैं कि कोई हमारा साथ दे,

पर यह नहीं चाहते कि कोई हमारे भीतर छिपे हुए असत्य को पहचान ले।

जबकि प्रेम का अर्थ केवल साथ चलना नहीं है।

कई बार सही दिशा दिखाना भी प्रेम होता है।

और यदि आवश्यक हो,

तो किसी प्रिय व्यक्ति को उसकी भूल के सामने खड़ा कर देना भी।

क्योंकि प्रेम का उद्देश्य अधिकार नहीं,

उत्थान है।

अंततः प्रेम किसी को अपने जैसा बना लेने की इच्छा नहीं है।

प्रेम उसे उसके श्रेष्ठतम स्वरूप तक पहुँचाने की आकांक्षा है।

जहाँ दूसरे की स्वतंत्रता सुरक्षित रहे।

उसकी गरिमा अक्षुण्ण रहे।

और उसका अंतःकरण अधिक निर्मल होता जाए।

तभी लगता है—

प्रेम वह नहीं जो केवल सुख दे।

प्रेम वह है जो दूसरे के जीवन को सत्य की दिशा दे।

क्योंकि सुख क्षणिक हो सकता है,

पर सत्य से प्रकाशित जीवन—

वह स्वयं प्रेम का सबसे सुंदर प्रतिफल है।

— मुकेश

Comments

Popular posts from this blog

एक मुसाफिर की डायरी से --------------

एकांत एक नदी है

बात दोनों तरफ हो तो मज़ा देता है