चिंतन - क्या विनम्रता ज्ञान का आभूषण नहीं, उसकी अंतिम परीक्षा है?
चिंतन - क्या विनम्रता ज्ञान का आभूषण नहीं, उसकी अंतिम परीक्षा है?
ज्ञान प्राप्त करना कठिन है।
पर ज्ञान को धारण करना उससे भी अधिक कठिन।
मनुष्य जैसे-जैसे जानने लगता है, उसके भीतर यह भ्रम भी जन्म लेने लगता है कि अब वह दूसरों से अधिक जानता है। यहीं ज्ञान का प्रकाश धीरे-धीरे अहंकार की छाया में बदलने लगता है।
तभी मेरे भीतर एक प्रश्न जन्म लेता है—क्या विनम्रता ज्ञान का आभूषण नहीं, उसकी अंतिम परीक्षा है?
अधूरा ज्ञान प्रायः ऊँची आवाज़ में बोलता है।
पूर्ण ज्ञान धीरे बोलता है।
और प्रज्ञा...
वह कई बार मौन ही रहती है।
जिसे अपने ज्ञान पर अत्यधिक गर्व है,
शायद उसने अभी ज्ञान का विस्तार देखा है,
उसकी गहराई नहीं।
क्योंकि गहराई में उतरते ही मनुष्य को अपनी सीमाएँ दिखाई देने लगती हैं।
मुझे लगता है कि ज्ञान का पहला फल सूचना नहीं,
विनम्रता है।
जो जितना अधिक जानता है,
उसे उतना ही अधिक अनुभव होता है कि अभी कितना कुछ जानना शेष है।
इसीलिए समुद्र सबसे विशाल होकर भी नीचे रहता है।
ऊँचाई पर्वत की हो सकती है,
गहराई समुद्र की होती है।
और गहराई का स्वभाव विनम्र होता है।
प्रकृति का प्रत्येक महान दृश्य हमें यही सिखाता है।
फलों से लदी शाखाएँ झुक जाती हैं।
मेघ जल से भरकर नीचे उतर आते हैं।
नदी पर्वतों से निकलकर अंततः धरती के सबसे निचले मार्गों से बहती है।
जिसके भीतर जितनी समृद्धि होती है,
वह उतना ही सहज हो जाता है।
भारतीय ऋषियों ने ज्ञान को कभी प्रदर्शन की वस्तु नहीं बनाया।
उन्होंने उसे साधना कहा।
क्योंकि साधना का लक्ष्य दूसरों पर प्रभाव डालना नहीं,
स्वयं को परिष्कृत करना है।
यदि ज्ञान से करुणा न बढ़े,
यदि ज्ञान से धैर्य न बढ़े,
यदि ज्ञान से अहंकार बढ़ जाए,
तो वह ज्ञान अभी अधूरा है।
मुझे कभी-कभी लगता है कि मनुष्य की परीक्षा इस बात से नहीं होती कि वह कितना जानता है।
उसकी परीक्षा इस बात से होती है कि वह अपने ज्ञान के साथ कैसा व्यवहार करता है।
क्या वह दूसरों को छोटा महसूस कराता है?
या उनके भीतर भी सीखने का साहस जगाता है?
क्या वह उत्तर देकर समाप्त कर देता है?
या प्रश्न पूछने की स्वतंत्रता भी देता है?
यही ज्ञान की संस्कृति है।
अंततः ज्ञान का उद्देश्य श्रेष्ठ दिखाई देना नहीं है।
श्रेष्ठ बनना भी नहीं।
श्रेष्ठतर बनते रहना है।
और जो स्वयं को पूर्ण मान ले,
उसकी यात्रा वहीं रुक जाती है।
तभी लगता है—
विनम्रता ज्ञान का आभूषण नहीं, उसकी अंतिम परीक्षा है।
क्योंकि जिसने बहुत जानकर भी यह कहने का साहस बचाए रखा—
"मैं अभी भी सीख रहा हूँ।"
वास्तव में ज्ञान उसी के भीतर जीवित है।
— मुकेश
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