चिन्तन - उपनिषदों में कर्म का स्वरूप : श्रेय से आत्मबोध तक की यात्रा
उपनिषदों
में कर्म का स्वरूप : श्रेय से आत्मबोध तक की यात्रा
उपनिषद् भारतीय दार्शनिक परम्परा
के वे आधारग्रन्थ हैं जिन्होंने कर्म को केवल बाह्य क्रिया के रूप में नहीं, बल्कि
मानव-चेतना, नैतिकता, आत्मज्ञान और मोक्ष से सम्बद्ध एक व्यापक आध्यात्मिक सिद्धान्त
के रूप में व्याख्यायित किया है। प्रत्येक उपनिषद् कर्म के किसी विशिष्ट आयाम को उद्घाटित
करता है—कठोपनिषद् श्रेय और प्रेय के माध्यम से नैतिक विवेक का आधार प्रस्तुत करता
है; ईशावास्योपनिषद् कर्म और अनासक्ति का समन्वय स्थापित करता है; मुण्डकोपनिषद् कर्म
की सीमाओं का निरूपण करते हुए आत्मविद्या की सर्वोच्चता प्रतिपादित करता है; छान्दोग्योपनिषद्
संकल्प, कर्म और व्यक्तित्व के पारस्परिक सम्बन्ध को स्पष्ट करता है; तथा बृहदारण्यकोपनिषद्
इच्छा, संकल्प, कर्म और अस्तित्व के गहन दार्शनिक सम्बन्ध का विश्लेषण करता है।
प्रस्तुत अध्याय में इन प्रमुख
उपनिषदों में प्रतिपादित कर्म-दर्शन का तुलनात्मक एवं विश्लेषणात्मक अध्ययन किया गया
है। इसका उद्देश्य यह स्पष्ट करना है कि उपनिषदों की दृष्टि में कर्म केवल कर्तव्य
या आचरण का विषय नहीं, बल्कि मनुष्य की चेतना, उसके नैतिक निर्णय, आत्मविकास और अन्ततः
आत्मसाक्षात्कार की यात्रा का आधार है। इस प्रकार उपनिषदों का कर्म-दर्शन भारतीय दर्शन
को एक ऐसी समग्र दृष्टि प्रदान करता है, जिसमें नैतिकता, आध्यात्मिकता और मानवीय अस्तित्व
एक-दूसरे के पूरक रूप में प्रतिष्ठित होते हैं।
ईशावास्योपनिषद् में कर्म और अनासक्ति का समन्वय
एक
दार्शनिक एवं नैतिक अध्ययन
ईशावास्योपनिषद्
आकार में अत्यंत लघु
(केवल 18 मंत्र) होते हुए भी
भारतीय दर्शन के सबसे गहन
ग्रंथों में से एक
है। इसका प्रमुख संदेश
यह है कि मानव
जीवन में कर्म का त्याग नहीं, बल्कि कर्म के प्रति आसक्ति का त्याग आवश्यक है। यही ईशावास्योपनिषद् का
अद्वितीय नैतिक और आध्यात्मिक सिद्धान्त
है।
यदि
कठोपनिषद् मनुष्य को श्रेय और प्रेय के मध्य विवेकपूर्ण
चयन करना सिखाता है,
तो ईशावास्योपनिषद् यह सिखाता है
कि श्रेय का मार्ग चुनने के बाद कर्म कैसे किया जाए। इस प्रकार दोनों
उपनिषद् परस्पर पूरक हैं।
ईशावास्योपनिषद्
का मूल दृष्टिकोण
उपनिषद्
का प्रथम मंत्र सम्पूर्ण दर्शन का आधार प्रस्तुत
करता है—
ईशावास्यमिदं
सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्॥ (मंत्र 1)
यह सम्पूर्ण जगत् ईश्वर से
व्याप्त है। इसलिए त्याग
की भावना के साथ इसका
उपभोग करो और किसी
वस्तु पर स्वामित्व या
लोभ का भाव मत
रखो।
यहाँ
"त्याग" का अर्थ कर्म-त्याग नहीं, बल्कि अहंकार, ममता और स्वामित्व-बोध का त्याग है।
कर्म
का अनिवार्य सिद्धान्त
द्वितीय
मंत्र स्पष्ट घोषणा करता है—
कुर्वन्नेवेह
कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः।
एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे॥ (मंत्र 2)
मनुष्य
को सौ वर्ष तक
जीवित रहने की इच्छा
करते हुए निरन्तर कर्म
करना चाहिए। यही मार्ग है
जिससे कर्म मनुष्य को
बाँधता नहीं।
यह मंत्र अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह
उपनिषद् पर लगाए जाने
वाले उस आरोप का
खण्डन करता है कि
उपनिषद् केवल संन्यास का
उपदेश देते हैं। इसके
विपरीत, ईशावास्योपनिषद् कर्मयोग का बीज प्रस्तुत
करता है।
कर्म
और अनासक्ति का समन्वय
ईशावास्योपनिषद्
के अनुसार कर्म के तीन
स्तर हैं—
(क)
कर्म -मनुष्य का स्वाभाविक कर्तव्य।
(ख)
आसक्ति -कर्म के फल,
प्रतिष्ठा, अधिकार या स्वामित्व से
जुड़ जाना।
(ग)
अनासक्ति -कर्तव्य का पूर्ण निष्ठा
से पालन करना, परन्तु
फल को अपना निजी
अधिकार न मानना।
इस प्रकार उपनिषद् कहता है— कर्म
करो, किन्तु कर्म में स्वयं को मत बाँधो।
अनासक्ति
का वास्तविक अर्थ
अनासक्ति
का अर्थ— उदासीनता नहीं, पलायन नहीं, निष्क्रियता नहीं, उत्तरदायित्व से भागना नहीं।
बल्कि—
कर्म में पूर्ण समर्पण,
फल में अनहंकार, सफलता में विनम्रता, असफलता में
धैर्य।
इसलिए
अनासक्ति कर्म की गुणवत्ता को बढ़ाती है, घटाती नहीं।
कर्म
का नैतिक आधार
ईशावास्योपनिषद्
के अनुसार नैतिक कर्म के तीन
आधार हैं—
(1) ईश्वर-दृष्टि -जब सम्पूर्ण जगत्
ईश्वरमय है, तब किसी
के साथ अन्याय करना
वस्तुतः उसी दिव्यता का
अनादर है।
(2) त्याग
-स्वामित्व की भावना कम
होने पर लोभ, हिंसा
और शोषण स्वतः घटते
हैं।
(3) कर्तव्य
-मनुष्य का अधिकार केवल
कर्म पर है, अधिकार-बोध पर नहीं।
गीता
में विकास
भगवद्गीता
ने ईशावास्योपनिषद् के इसी सिद्धान्त
को विस्तार दिया—
- कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
- योगः कर्मसु कौशलम्।
- समत्वं योग उच्यते।
इस दृष्टि से गीता का
कर्मयोग ईशावास्योपनिषद् के बीज का
विकसित स्वरूप है।
आधुनिक
सन्दर्भ
प्रशासन
-एक अधिकारी यदि केवल पदोन्नति
के लिए कार्य करे,
तो वह आसक्त है।
यदि वही लोकहित के लिए कार्य
करे, तो वह अनासक्त
कर्मयोगी है।
शिक्षा
-विद्यार्थी
यदि केवल अंक के
लिए पढ़े, तो वह फलासक्ति
है। यदि ज्ञान के लिए अध्ययन
करे, तो वह अनासक्ति
की दिशा है।
व्यवसाय
-व्यापार केवल अधिकतम लाभ
के लिए हो, तो
आसक्ति है।यदि लाभ के साथ
सामाजिक उत्तरदायित्व भी हो, तो
वह ईशावास्य की भावना है।
चिकित्सा
-चिकित्सक यदि सेवा-भाव
से उपचार करे और सफलता
का अहंकार न रखे, तो
वह अनासक्त कर्म का उदाहरण
है।
पर्यावरण
-यदि प्रकृति को केवल संसाधन
माना जाए, तो शोषण
होगा।यदि उसे ईश्वर की
अभिव्यक्ति माना जाए, तो
संरक्षण होगा।
मनोवैज्ञानिक
महत्त्व
आधुनिक
मनोविज्ञान बताता है कि अत्यधिक
परिणाम-केंद्रित व्यक्ति— तनावग्रस्त रहता है, असफलता से
टूट जाता है, सफलता पर
अहंकारी हो सकता है।
अनासक्ति—
मानसिक संतुलन देती है, कार्य-कुशलता
बढ़ाती है, आन्तरिक शान्ति प्रदान करती है।
आज
"Mindfulness" और
"Flow State" जैसी
अवधारणाएँ भी इस बात
की ओर संकेत करती
हैं कि व्यक्ति जब
वर्तमान कर्म में पूर्णतः
स्थित रहता है और
परिणाम की अत्यधिक चिंता
से मुक्त होता है, तब
उसका प्रदर्शन और मानसिक स्वास्थ्य
दोनों बेहतर होते हैं।
9. दार्शनिक
विश्लेषण -ईशावास्योपनिषद् में कर्म और
अनासक्ति का समन्वय तीन
स्तरों पर समझा जा
सकता है—
|
स्तर |
कर्म |
अनासक्ति |
|
आध्यात्मिक |
ईश्वरार्पण
बुद्धि |
अहंकार
का त्याग |
|
नैतिक |
कर्तव्यपालन |
फल-लोभ का त्याग |
|
मनोवैज्ञानिक |
पूर्ण
एकाग्रता |
चिंता
और भय से मुक्ति |
यह समन्वय भारतीय दर्शन की विशिष्ट देन
है, क्योंकि यहाँ न तो
कर्म का निषेध है
और न ही भोग
का अंध-समर्थन; बल्कि
उत्तरदायी कर्म और आन्तरिक विरक्ति का संतुलन है।
ईशावास्योपनिषद्
का संदेश है कि मानव
जीवन का आदर्श कर्म का परित्याग नहीं, बल्कि कर्म में अनासक्ति का विकास है। मनुष्य को अपने कर्तव्यों
का निष्ठापूर्वक पालन करना चाहिए,
परन्तु स्वामित्व, अहंकार और फल-लालसा
से मुक्त रहना चाहिए। यही
दृष्टि कर्म को बन्धन
से साधना में रूपान्तरित करती
है। इस प्रकार ईशावास्योपनिषद्
भारतीय नैतिक दर्शन को एक ऐसा
सार्वकालिक सिद्धान्त प्रदान करता है जिसमें
कर्तव्य, त्याग, ईश्वर-दृष्टि और आन्तरिक स्वतंत्रता का अद्वितीय समन्वय
मिलता है। यही सिद्धान्त
आज के व्यक्तिगत जीवन,
सामाजिक उत्तरदायित्व, नेतृत्व, पर्यावरणीय चेतना और वैश्विक नैतिकता
के लिए भी समान
रूप से प्रासंगिक है।
मुण्डकोपनिषद् में कर्म की सीमा और आत्मविद्या की महत्ता
एक दार्शनिक, नैतिक एवं आध्यात्मिक अध्ययन
मुण्डकोपनिषद् अथर्ववेद का एक प्रमुख
उपनिषद् है और भारतीय
दर्शन में ज्ञानमार्ग (ज्ञानयोग) का अत्यंत प्रामाणिक
ग्रंथ माना जाता है।
इसका केंद्रीय प्रतिपाद्य यह है कि
कर्म (विशेषतः वैदिक यज्ञ-कर्म) का अपना महत्त्व है, किन्तु उसकी सीमा है; आत्मज्ञान (ब्रह्मविद्या) ही मनुष्य को परम पुरुषार्थ—मोक्ष—तक पहुँचाता है।
यदि ईशावास्योपनिषद् कर्म और अनासक्ति
का समन्वय प्रस्तुत करता है, तो
मुण्डकोपनिषद् उस समन्वय को
एक व्यापक दार्शनिक परिप्रेक्ष्य में रखकर यह
स्पष्ट करता है कि
कर्म मानव-जीवन को
शुद्ध और अनुशासित अवश्य
करता है, परन्तु आत्मा
के अंतिम सत्य का बोध
केवल आत्मविद्या से ही संभव
है।
अपरा विद्या और परा विद्या का सिद्धान्त
मुण्डकोपनिषद् का सबसे प्रसिद्ध
प्रतिपादन है—
द्वे
विद्ये वेदितव्ये इति ह स्म यद् ब्रह्मविदो वदन्ति। परा चैवापरा च॥ (मुण्डकोपनिषद् 1.1.4)
इसके बाद उपनिषद्
कहता है—
तत्रापरा
ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्ववेदः...
अथ परा यया तदक्षरमधिगम्यते॥ (1.1.5)
भावार्थ
ब्रह्मविद्या के ज्ञाता दो
प्रकार की विद्याओं का
उल्लेख करते हैं—
- अपरा
विद्या
— वेद, वेदाङ्ग, यज्ञ, कर्म, भाषा, व्याकरण, छन्द, ज्योतिष आदि समस्त लौकिक एवं शास्त्रीय ज्ञान।
- परा
विद्या
— वह विद्या जिसके द्वारा अक्षर ब्रह्म का साक्षात्कार होता है।
यहाँ कर्म को
अस्वीकार नहीं किया गया
है, बल्कि उसे अपरा विद्या के क्षेत्र में
स्थापित किया गया है।
कर्म की आवश्यकता
मुण्डकोपनिषद् कर्म का विरोध
नहीं करता।
कर्म—
- समाज
की व्यवस्था बनाए रखता है।
- व्यक्ति
का नैतिक अनुशासन विकसित करता है।
- चित्त
की शुद्धि में सहायक होता है।
- धर्ममय
जीवन की आधारभूमि तैयार करता है।
इसलिए कर्म आध्यात्मिक यात्रा
का प्रारम्भिक चरण है।
कर्म की सीमा
उपनिषद् स्पष्ट करता है कि
केवल कर्म से अंतिम
मुक्ति नहीं मिलती।
यज्ञों
और कर्मकाण्डों के विषय में
कहा गया है— प्लवा
ह्येते अदृढा यज्ञरूपाः... (मुण्डकोपनिषद् 1.2.7)
भावार्थ
ये यज्ञरूपी साधन
ऐसे नौकाओं के समान हैं
जो स्थिर नहीं हैं; इनके
सहारे संसार-सागर का अंतिम
पार नहीं पाया जा
सकता।
यह कर्म की
निन्दा नहीं, बल्कि उसकी सीमाओं का यथार्थ निर्धारण है।
कर्म क्यों सीमित है?
मुण्डकोपनिषद् के अनुसार कर्म
की तीन सीमाएँ हैं—
(क) कर्म का फल अनित्य है - प्रत्येक कर्म का फल
समय के साथ समाप्त
हो जाता है।यज्ञ का
पुण्य भी क्षयशील है।
(ख) कर्म कारण-कार्य के क्षेत्र में है -कर्म प्रकृति के
नियमों के भीतर कार्य
करता है।वह जन्म-मरण के
चक्र को परिष्कृत कर
सकता है, समाप्त नहीं।
(ग) कर्म अज्ञान का प्रत्यक्ष नाश नहीं करता - बंधन का मूल
कारण अविद्या है। अविद्या का नाश केवल
विद्या से होता है।
जिस प्रकार अन्धकार को हटाने के
लिए दीपक चाहिए, उसी
प्रकार आत्म-अज्ञान को
हटाने के लिए आत्मज्ञान
चाहिए।
आत्मविद्या की महत्ता
उपनिषद् कहता है— परा
विद्या वही है जिसके द्वारा अक्षर ब्रह्म का ज्ञान होता है।
आत्मविद्या—आत्मा और ब्रह्म की
एकता का बोध कराती
है, भय का अंत करती
है, मृत्यु के रहस्य को
समाप्त करती है, मोक्ष का
मार्ग प्रशस्त करती है।यही उपनिषद्
का परम संदेश है।
गुरु की आवश्यकता
मुण्डकोपनिषद् का एक अत्यंत
प्रसिद्ध मंत्र है—
तद्विज्ञानार्थं
स गुरुमेवाभिगच्छेत् - समित्पाणिः
श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम्॥ (1.2.12)
भावार्थ
उस परम ज्ञान
की प्राप्ति के लिए मनुष्य
को ऐसे गुरु के
पास जाना चाहिए जो
शास्त्रों का ज्ञाता (श्रोत्रिय)
और ब्रह्मनिष्ठ (अनुभवसिद्ध) हो।
अर्थात् आत्मविद्या केवल पुस्तकीय सूचना
नहीं, बल्कि जीवंत परम्परा और अनुभूति का विषय है।
आत्मज्ञान का स्वरूप
उपनिषद् आगे कहता है—
ब्रह्मैवेदममृतं पुरस्ताद् ब्रह्म पश्चाद्...
और— ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति।
अर्थात्—
ब्रह्म का ज्ञान केवल
सूचना नहीं देता, बल्कि
ज्ञाता के अस्तित्व को
ही रूपान्तरित कर देता है।
गीता से संबंध
भगवद्गीता ने मुण्डकोपनिषद् की
इसी भावना को आगे बढ़ाया—
- श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः
परन्तप।
(4.33)
- न
हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते। (4.38)
गीता में कर्मयोग
और ज्ञानयोग का समन्वय है,
जबकि मुण्डकोपनिषद् ज्ञान की परम महत्ता
को रेखांकित करता है।
आधुनिक परिप्रेक्ष्य
शिक्षा
डिग्री, प्रमाणपत्र और तकनीकी दक्षता
आवश्यक हैं, परन्तु वे
केवल अपरा विद्या हैं।
आत्मबोध, नैतिकता और जीवन-दृष्टि
परा विद्या के क्षेत्र में
आते हैं।
विज्ञान
विज्ञान हमें बताता है
कि ब्रह्माण्ड कैसे कार्य करता
है।
आत्मविद्या यह प्रश्न पूछती
है— "जो इस ब्रह्माण्ड को जान रहा है, वह कौन है?"
सामाजिक जीवन
कर्म समाज को
व्यवस्थित करता है। आत्मविद्या समाज
को मानवीय बनाती है।
नेतृत्व
कुशल प्रबन्धन कर्म
है। स्वार्थरहित, मूल्य-आधारित नेतृत्व आत्मविद्या से प्रेरित होता
है।
दार्शनिक विश्लेषण
मुण्डकोपनिषद् कर्म और ज्ञान
के बीच विरोध स्थापित
नहीं करता, बल्कि उनके क्रम को स्पष्ट करता
है।
|
आयाम |
कर्म |
आत्मविद्या |
|
उद्देश्य |
चित्तशुद्धि, धर्मपालन |
आत्मसाक्षात्कार |
|
क्षेत्र |
कारण-कार्य, संसार |
ब्रह्म, मोक्ष |
|
फल |
सीमित एवं क्षयशील |
शाश्वत एवं मुक्तिदायक |
|
साधन |
यज्ञ, कर्तव्य, अनुशासन |
श्रवण, मनन, निदिध्यासन |
|
परिणाम |
पुण्य, व्यवस्था, नैतिकता |
ज्ञान, अभय, मोक्ष |
इस प्रकार कर्म
साधन है और आत्मविद्या
साध्य। कर्म आध्यात्मिक
यात्रा की तैयारी करता
है; आत्मविद्या उसे पूर्णता प्रदान
करती है।
मुण्डकोपनिषद् का मूल संदेश
यह है कि कर्म
का अपना आवश्यक स्थान है, किन्तु वह अंतिम साध्य नहीं है। वैदिक कर्म, यज्ञ, अनुष्ठान और सामाजिक कर्तव्य
मनुष्य के चित्त को
परिष्कृत करते हैं तथा
उसे आध्यात्मिक साधना के योग्य बनाते
हैं, परन्तु जन्म-मरण के
बन्धन से मुक्ति केवल
आत्मविद्या से संभव है।
इसलिए उपनिषद् कर्म का निषेध
नहीं करता, बल्कि उसे आत्मज्ञान की
तैयारी के रूप में
स्थापित करता है। इस
प्रकार मुण्डकोपनिषद् भारतीय दर्शन को यह अद्वितीय
शिक्षा देता है कि
कर्म से जीवन का परिष्कार होता है, परन्तु आत्मविद्या से जीवन का रूपान्तरण होता है। यही इसकी दार्शनिक,
नैतिक और आध्यात्मिक महत्ता
है।
छान्दोग्योपनिषद्
में कर्म, संकल्प और व्यक्तित्व का सम्बन्ध
एक
दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक एवं नैतिक अध्ययन
छान्दोग्योपनिषद्
सामवेद का एक अत्यंत
महत्त्वपूर्ण उपनिषद् है। यदि ईशावास्योपनिषद्
कर्म में अनासक्ति का
सिद्धान्त देता है, कठोपनिषद्
श्रेय-प्रेय के आधार पर
नैतिक विवेक का प्रतिपादन करता
है और मुण्डकोपनिषद् कर्म की सीमा
तथा आत्मविद्या की महत्ता स्पष्ट
करता है, तो छान्दोग्योपनिषद्
मनुष्य के आन्तरिक व्यक्तित्व (Inner
Personality) के निर्माण की प्रक्रिया का
विश्लेषण करता है। इसका
मुख्य प्रतिपादन यह है कि
मनुष्य का कर्म उसके संकल्प से उत्पन्न होता है, और उसके संकल्प उसके व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं।
छान्दोग्योपनिषद्
का दृष्टिकोण बाह्य कर्म से अधिक
आन्तरिक चेतना पर केन्द्रित है।
यह बताता है कि मनुष्य
जैसा सोचता है, जैसा संकल्प
करता है और जैसा
आचरण करता है, वैसा
ही उसका चरित्र और
अंततः उसका जीवन बन
जाता है।
संकल्प
: कर्म का बीज
छान्दोग्योपनिषद्
में मन और संकल्प
की शक्ति को अत्यंत महत्त्व
दिया गया है। उपनिषद्
संकेत करता है कि
संसार में कोई भी
कर्म बिना संकल्प के
उत्पन्न नहीं होता।
इस
विचार का सार है—
संकल्प
→ कर्म → संस्कार → व्यक्तित्व → भाग्य
अर्थात्
प्रत्येक कर्म का मूल
कारण बाहरी परिस्थिति नहीं, बल्कि मनुष्य का आन्तरिक संकल्प है।
"यथा क्रतुरस्मिन् लोके..." छान्दोग्योपनिषद् (3.14.1) का अत्यंत प्रसिद्ध
वाक्य है—
यथा
क्रतुरस्मिन् लोके पुरुषो भवति, तथेतः प्रेत्य भवति। स क्रतुं कुर्वीत॥
जैसा
मनुष्य का क्रतु (दृढ़ संकल्प, आन्तरिक अभिप्राय) होता है, वैसा
ही वह बनता है;
और मृत्यु के बाद भी
उसी के अनुरूप उसकी
गति होती है। इसलिए
मनुष्य को अपने संकल्प
को श्रेष्ठ बनाना चाहिए।
यहाँ
क्रतु केवल इच्छा नहीं
है, बल्कि वह दृढ़ निश्चय
है जो जीवन की
दिशा निर्धारित करता है।
व्यक्तित्व
का निर्माण
छान्दोग्योपनिषद्
के अनुसार व्यक्तित्व जन्म से पूर्णतः
निर्धारित नहीं होता; उसका
निर्माण निरन्तर होता रहता है।
यह
निर्माण तीन स्तरों पर
होता है—
(क) विचार
(Thought) - हर कर्म का जन्म
विचार से होता है।
(ख) संकल्प
(Intention) -विचार
जब दृढ़ निश्चय बन
जाता है, तब वह
संकल्प कहलाता है।
(ग) कर्म
(Action) -संकल्प कर्म में प्रकट
होता है।
बार-बार किए गए
कर्म संस्कार बनते हैं और
संस्कार व्यक्तित्व का निर्माण करते
हैं।
कर्म
का नैतिक मूल्य
छान्दोग्योपनिषद्
के अनुसार किसी कर्म की
नैतिकता केवल उसके बाहरी
परिणाम से नहीं आँकी
जा सकती।
कर्म
का वास्तविक मूल्य इस बात पर
निर्भर करता है कि—
- उसका
संकल्प क्या था?
- उसका
उद्देश्य क्या था?
- उसके
पीछे की चेतना कैसी थी?
इस
प्रकार उपनिषद् बाह्य कर्म और आन्तरिक प्रेरणा दोनों को समान महत्त्व
देता है।
"तत्त्वमसि" और व्यक्तित्व
छान्दोग्योपनिषद्
का महावाक्य है— तत्त्वमसि (6.8–16)
अर्थ-
"वह ब्रह्म ही तुम हो।"
जब
मनुष्य यह अनुभव करता
है कि उसका वास्तविक
स्वरूप आत्मा है, तब उसके
संकल्प भी बदल जाते
हैं।
- स्वार्थ
की जगह लोकमंगल आता है।
- लोभ
की जगह संतोष आता है।
- हिंसा
की जगह करुणा आती है।
इस
प्रकार आत्मज्ञान व्यक्तित्व के नैतिक रूपान्तरण
का आधार बनता है।
मन
और आहार का सम्बन्ध
छान्दोग्योपनिषद् (6.5–6) में एक महत्वपूर्ण
विचार मिलता है—
आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः।सत्त्वशुद्धौ ध्रुवा स्मृतिः।
भाव यह है
कि शुद्ध आहार से मन
(सत्त्व) शुद्ध होता है; मन
की शुद्धि से स्मृति स्थिर
होती है, और स्थिर
स्मृति से ज्ञान की
प्राप्ति होती है।
यहाँ "आहार" का अर्थ केवल
भोजन नहीं, बल्कि जो कुछ मन, बुद्धि और इन्द्रियाँ ग्रहण करती हैं—विचार, दृश्य, ध्वनि, साहित्य, संगति और डिजिटल सामग्री—सब भी व्यापक
अर्थ में आहार हैं।
अतः संकल्प की गुणवत्ता उस
मानसिक आहार से भी
प्रभावित होती है जिसे
मनुष्य प्रतिदिन ग्रहण करता है।
आधुनिक
मनोविज्ञान से साम्य
छान्दोग्योपनिषद्
का यह सिद्धान्त आधुनिक
मनोविज्ञान से उल्लेखनीय समानता
रखता है—
- Cognitive Psychology कहती है
कि विचार व्यवहार को प्रभावित करते हैं।
- Behavioral Science बताती है
कि बार-बार दोहराया गया व्यवहार आदत बनता है।
- Neuroplasticity के अनुसार
निरंतर अभ्यास मस्तिष्क में नए तंत्रिका-पथ (Neural Pathways) बनाता है।
छान्दोग्योपनिषद्
इन सबका दार्शनिक रूप
पहले ही प्रस्तुत कर
चुका है—संकल्प से कर्म, कर्म से संस्कार और संस्कार से व्यक्तित्व का निर्माण होता है।
सामाजिक
एवं नैतिक सन्दर्भ
शिक्षा
-केवल ज्ञान देना पर्याप्त नहीं;
श्रेष्ठ संकल्पों का निर्माण भी
शिक्षा का उद्देश्य होना
चाहिए।
नेतृत्व
-नेता का व्यक्तित्व उसके
पद से नहीं, बल्कि
उसके मूल संकल्पों से
निर्मित होता है।
परिवार
-माता-पिता का आचरण
बच्चों के संकल्पों और
संस्कारों को आकार देता
है।
समाज
-जिस समाज के सामूहिक
संकल्प न्याय, करुणा और सत्य पर
आधारित होंगे, उसका सामूहिक चरित्र
भी वैसा ही बनेगा।
दार्शनिक
विश्लेषण
छान्दोग्योपनिषद्
कर्म की उत्पत्ति का
एक सूक्ष्म मॉडल प्रस्तुत करता
है—
|
स्तर |
कार्य |
|
चेतना |
मूल
अस्तित्व (आत्मा) |
|
विचार |
मानसिक
प्रक्रिया |
|
संकल्प
(क्रतु) |
दिशा
और उद्देश्य |
|
कर्म |
व्यवहार |
|
संस्कार |
स्थायी
मानसिक छाप |
|
व्यक्तित्व |
जीवन
का चरित्र |
|
भाग्य |
कर्मों
का समेकित परिणाम |
यह
मॉडल दर्शाता है कि व्यक्तित्व
कोई स्थिर वस्तु नहीं, बल्कि संकल्पों और कर्मों से निरंतर निर्मित होने वाली चेतन प्रक्रिया है।
अन्य
उपनिषदों के साथ समन्वय
यदि
प्रमुख उपनिषदों के कर्म-दर्शन
को क्रमबद्ध रूप में देखें,
तो एक रोचक विकास
दिखाई देता है—
|
उपनिषद् |
कर्म-दर्शन
का मुख्य प्रतिपाद्य |
|
कठोपनिषद् |
श्रेय
और प्रेय के आधार पर
कर्म का नैतिक विवेक |
|
ईशावास्योपनिषद् |
कर्म
और अनासक्ति का समन्वय |
|
मुण्डकोपनिषद् |
कर्म
की सीमा तथा आत्मविद्या की सर्वोच्चता |
|
छान्दोग्योपनिषद् |
संकल्प
से कर्म और कर्म से
व्यक्तित्व का निर्माण |
इस
प्रकार छान्दोग्योपनिषद् कर्म के आन्तरिक
मनोवैज्ञानिक आधार को उद्घाटित करता
है और उपनिषदों के
कर्म-दर्शन को एक नई
गहराई प्रदान करता है।
छान्दोग्योपनिषद्
का मूल संदेश यह
है कि मनुष्य का व्यक्तित्व उसके कर्मों से बनता है, और उसके कर्म उसके संकल्पों से जन्म लेते हैं। इसलिए नैतिक जीवन का आरम्भ
बाह्य आचरण से पहले
आन्तरिक संकल्प की शुद्धि से
होता है। "यथा क्रतुरस्मिन् लोके पुरुषो भवति" का सिद्धान्त यह
प्रतिपादित करता है कि
मनुष्य अपने दृढ़ संकल्पों
का ही प्रतिरूप बन
जाता है। इस प्रकार
छान्दोग्योपनिषद् भारतीय दर्शन में कर्म को
केवल बाह्य क्रिया नहीं, बल्कि चेतना, संकल्प, संस्कार और व्यक्तित्व के
बीच एक सतत् विकासशील
प्रक्रिया के रूप में
प्रस्तुत करता है। यही
इसकी दार्शनिक, नैतिक, मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक महत्ता
है।
बृहदारण्यकोपनिषद् में कर्म, इच्छा और अस्तित्व का दार्शनिक विश्लेषण
एक
दार्शनिक, नैतिक एवं आध्यात्मिक अध्ययन
बृहदारण्यकोपनिषद् शुक्ल यजुर्वेद का सबसे विशाल
और गहन उपनिषद् है।
इसे उपनिषद्-साहित्य का दार्शनिक शिखर
कहा जाता है। यदि
कठोपनिषद् कर्म के नैतिक
विवेक, ईशावास्योपनिषद् कर्म और अनासक्ति
के समन्वय, मुण्डकोपनिषद् कर्म की सीमा
और आत्मविद्या की महत्ता तथा
छान्दोग्योपनिषद्
संकल्प से व्यक्तित्व-निर्माण
की प्रक्रिया का विवेचन करते
हैं, तो बृहदारण्यकोपनिषद् इन सबके आधार
में स्थित इच्छा (काम), संकल्प (क्रतु), कर्म और अस्तित्व (सत्ता) के पारस्परिक सम्बन्ध
का सर्वाधिक गहन विश्लेषण प्रस्तुत
करता है।
इस उपनिषद् का
मूल प्रतिपादन है कि मनुष्य
का अस्तित्व उसके कर्मों से निर्मित होता है, कर्म इच्छाओं से उत्पन्न होते हैं, और इच्छाएँ उसके ज्ञान अथवा अज्ञान की अभिव्यक्ति होती हैं। इसलिए कर्म का अंतिम
समाधान कर्म-संशोधन नहीं,
बल्कि अविद्या के निवारण और आत्मबोध में निहित है।
इच्छा
: कर्म का मूल कारण –
बृहदारण्यकोपनिषद्
का प्रसिद्ध कथन है— काममय एवायं पुरुषः। (बृहदारण्यकोपनिषद् 4.4.5)
भावार्थ
-यह मनुष्य इच्छाओं (काम) से निर्मित
है।
यहाँ
काम का अर्थ केवल
इन्द्रिय-भोग नहीं, बल्कि
इच्छा, आकांक्षा, अभिलाषा और आन्तरिक प्रेरणा है।
उपनिषद्
आगे कहता है—
यथाकामो
भवति तत्क्रतुर्भवति।यत्क्रतुर्भवति
तत्कर्म करोति।यत्कर्म करोति तदभिसम्पद्यते॥
भावार्थ
- जैसा
मनुष्य की इच्छा होती है,
- वैसा
उसका संकल्प बनता है,
- जैसा
संकल्प होता है,
- वैसा
वह कर्म करता है,
- और
जैसे कर्म करता है,
- वैसा
ही वह बन जाता है।
यह
भारतीय दर्शन में कर्म-मनोविज्ञान का सबसे सुव्यवस्थित सूत्र है।
2. इच्छा → संकल्प → कर्म → अस्तित्व
बृहदारण्यकोपनिषद्
मानव जीवन का एक
कारण-क्रम प्रस्तुत करता
है—
इच्छा
(काम) → संकल्प (क्रतु) → कर्म → संस्कार → व्यक्तित्व → अस्तित्व (जीवन-गति)
यह
केवल नैतिक सिद्धान्त नहीं, बल्कि अस्तित्व का सिद्धान्त (Ontology of Human
Becoming) है।
मनुष्य
अपने कर्मों से केवल समाज
को नहीं बदलता, वह
स्वयं भी निरन्तर बदलता
रहता है।
कर्म
और पुनर्जन्म
उपनिषद्
कहता है—
यथाकारी
यथाचारी तथा भवति।साधुकारी साधुर्भवति।पापकारी पापो भवति॥ (4.4.5)
भावार्थ
जैसा
कर्म और जैसा आचरण,
वैसा ही मनुष्य बनता
है।
- शुभ
कर्म शुभ व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं।
- अशुभ
कर्म अशुभ संस्कारों का।
यहाँ
कर्मफल केवल बाहरी पुरस्कार
या दण्ड नहीं, बल्कि
अस्तित्व का रूपान्तरण है।
कर्म
का दार्शनिक अर्थ
बृहदारण्यकोपनिषद्
के अनुसार कर्म केवल शारीरिक
क्रिया नहीं है।
कर्म
में सम्मिलित हैं— विचार,इच्छा,संकल्प,वाणी,व्यवहार,और
उनके द्वारा निर्मित संस्कार।
अतः
कर्म एक समग्र चेतन प्रक्रिया है।
ज्ञान
और कर्म का सम्बन्ध
उपनिषद्
स्पष्ट करता है कि
कर्म का मूल कारण
अविद्या है।
जब
मनुष्य स्वयं को केवल शरीर
या मन मानता है—
- इच्छाएँ
उत्पन्न होती हैं।
- इच्छाओं
से कर्म होते हैं।
- कर्म
से बन्धन उत्पन्न होता है।
परन्तु
जब आत्मज्ञान होता है— आत्मा
वा अरे द्रष्टव्यः, श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः। (2.4.5;
4.5.6)
तब
मनुष्य जान लेता है
कि उसका वास्तविक स्वरूप
नित्य, शुद्ध और अविकार आत्मा
है। इस ज्ञान से
कर्म समाप्त नहीं होते, बल्कि
कर्तापन (Doership) और भोक्तापन (Enjoyership) का मिथ्या अहंकार समाप्त हो जाता है।
अस्तित्व
का रूपान्तरण
बृहदारण्यकोपनिषद्
का लक्ष्य केवल नैतिक सुधार
नहीं है।
उसका
उद्देश्य है—
अस्तित्व
का रूपान्तरण।
जब
आत्मा का बोध होता
है— इच्छाएँ शुद्ध होती हैं। कर्म निष्काम
हो जाते हैं। भय समाप्त
हो जाता है।मृत्यु का
बन्धन टूट जाता है।
यही मोक्ष है।
7. "नेति-नेति" और कर्म
उपनिषद्
का प्रसिद्ध सिद्धान्त है— नेति नेति। (2.3.6)
यह
केवल दार्शनिक निषेध नहीं, बल्कि कर्म-दर्शन से
भी जुड़ा है।
जब
मनुष्य स्वयं को— शरीर नहीं,
मन नहीं, बुद्धि नहीं,अहंकार नहीं—
मानता,
तब कर्मों के साथ उसकी
मिथ्या पहचान टूटने लगती है। तब
कर्म होते हैं, परन्तु
वे आत्मा को बाँधते नहीं।
8. याज्ञवल्क्य का कर्म-दर्शन
याज्ञवल्क्य
और मैत्रेयी के संवाद में
याज्ञवल्क्य कहते हैं—
न
वा अरे सर्वस्य कामाय सर्वं प्रियं भवति। आत्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति॥ (2.4.5)
भावार्थ
कोई
वस्तु अपने लिए प्रिय
नहीं होती; सब कुछ आत्मा
के कारण प्रिय होता
है।
यह
कथन इच्छा के दार्शनिक विश्लेषण
का शिखर है।
मनुष्य
वास्तव में वस्तुओं की
नहीं, आनन्द और पूर्णता की खोज करता
है; और वह पूर्णता
आत्मा में ही है।
इसलिए जब तक यह
सत्य ज्ञात नहीं होता, इच्छाएँ
बाह्य वस्तुओं की ओर दौड़ती
रहती हैं और कर्मों
का चक्र चलता रहता
है।
आधुनिक
सन्दर्भ
मनोविज्ञान
आधुनिक
मनोविज्ञान प्रेरणा (Motivation) को व्यवहार का
आधार मानता है।
बृहदारण्यकोपनिषद्
इससे आगे जाकर कहता
है—
प्रेरणा
का भी मूल कारण आत्म-अज्ञान या आत्म-बोध है।
न्यूरोसाइंस
मस्तिष्क
में इच्छाएँ निर्णयों को प्रभावित करती
हैं। उपनिषद् जोड़ता है— इच्छा की
दिशा ज्ञान से निर्धारित होती
है।
नैतिक
दर्शन -आधुनिक नैतिकता अक्सर केवल व्यवहार का
मूल्यांकन करती है।
बृहदारण्यकोपनिषद्
कहता है— व्यवहार से पहले इच्छा और संकल्प का मूल्यांकन आवश्यक है।
नेतृत्व
-सच्चा नेतृत्व केवल नीतियों से
नहीं, बल्कि शुद्ध प्रेरणा और आत्मबोध से
जन्म लेता है।
उपनिषदों
में कर्म-दर्शन का क्रमिक विकास
यदि
प्रमुख उपनिषदों के कर्म-दर्शन
को क्रम में देखें,
तो एक स्पष्ट दार्शनिक
विकास दिखाई देता है—
|
उपनिषद् |
कर्म-दर्शन
का मुख्य प्रतिपाद्य |
|
कठोपनिषद् |
श्रेय
और प्रेय के आधार पर
कर्म का नैतिक विवेक |
|
ईशावास्योपनिषद् |
कर्म
और अनासक्ति का समन्वय |
|
मुण्डकोपनिषद् |
कर्म
की सीमा तथा आत्मविद्या की सर्वोच्चता |
|
छान्दोग्योपनिषद् |
संकल्प
से कर्म और कर्म से
व्यक्तित्व का निर्माण |
|
बृहदारण्यकोपनिषद् |
इच्छा
से संकल्प, संकल्प से कर्म और
कर्म से अस्तित्व का
निर्माण |
इस
प्रकार बृहदारण्यकोपनिषद् कर्म-दर्शन को
उसके सबसे गहरे अस्तित्वगत
(Ontological) आयाम तक ले जाता
है।
दार्शनिक
मूल्यांकन
बृहदारण्यकोपनिषद्
का विश्लेषण यह स्पष्ट करता
है कि—
- कर्म
केवल बाहरी कार्य नहीं है।
- इच्छा
कर्म की जड़ है।
- संकल्प
कर्म की दिशा निर्धारित करता है।
- संस्कार
व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं।
- आत्मज्ञान
इच्छा के मूल का रूपान्तरण कर देता है।
अतः
इस उपनिषद् में कर्म-दर्शन
का केन्द्र कर्म नहीं, बल्कि
चेतना है। चेतना बदलती
है तो इच्छा बदलती
है; इच्छा बदलती है तो कर्म
बदलते हैं; कर्म बदलते
हैं तो जीवन और
अस्तित्व का अनुभव बदल
जाता है।
बृहदारण्यकोपनिषद् भारतीय कर्म-दर्शन को
उसकी सर्वाधिक गहन दार्शनिक ऊँचाई
प्रदान करता है। यह
प्रतिपादित करता है कि
मनुष्य जैसा चाहता है, वैसा संकल्प करता है; जैसा संकल्प करता है, वैसा कर्म करता है; और जैसे कर्म करता है, वैसा ही उसका व्यक्तित्व और अस्तित्व बनता है। इसलिए कर्म का वास्तविक
समाधान केवल बाह्य आचरण
में परिवर्तन नहीं, बल्कि इच्छा और चेतना के
रूपान्तरण में है। आत्मज्ञान
के द्वारा इच्छाओं का परिष्कार होता
है, कर्तापन का अहंकार समाप्त
होता है और कर्म
बन्धन का कारण न
रहकर आत्म-अभिव्यक्ति का
साधन बन जाते हैं।
इस प्रकार बृहदारण्यकोपनिषद् कर्म, इच्छा और अस्तित्व को
एकीकृत करते हुए भारतीय
दर्शन को एक गहन
अस्तित्ववादी, नैतिक और आध्यात्मिक कर्म-दर्शन प्रदान करता है।
बृहदारण्यकोपनिषद्
में कर्म, इच्छा और अस्तित्व का दार्शनिक विश्लेषण
एक
दार्शनिक, नैतिक एवं आध्यात्मिक अध्ययन
बृहदारण्यकोपनिषद् शुक्ल यजुर्वेद का सबसे विशाल
और गहन उपनिषद् है।
इसे उपनिषद्-साहित्य का दार्शनिक शिखर
कहा जाता है। यदि
कठोपनिषद् कर्म के नैतिक
विवेक, ईशावास्योपनिषद् कर्म और अनासक्ति
के समन्वय, मुण्डकोपनिषद् कर्म की सीमा
और आत्मविद्या की महत्ता तथा
छान्दोग्योपनिषद्
संकल्प से व्यक्तित्व-निर्माण
की प्रक्रिया का विवेचन करते
हैं, तो बृहदारण्यकोपनिषद् इन सबके आधार
में स्थित इच्छा (काम), संकल्प (क्रतु), कर्म और अस्तित्व (सत्ता) के पारस्परिक सम्बन्ध
का सर्वाधिक गहन विश्लेषण प्रस्तुत
करता है।
इस उपनिषद् का
मूल प्रतिपादन है कि मनुष्य
का अस्तित्व उसके कर्मों से निर्मित होता है, कर्म इच्छाओं से उत्पन्न होते हैं, और इच्छाएँ उसके ज्ञान अथवा अज्ञान की अभिव्यक्ति होती हैं। इसलिए कर्म का अंतिम
समाधान कर्म-संशोधन नहीं,
बल्कि अविद्या के निवारण और आत्मबोध में निहित है।
इच्छा
: कर्म का मूल कारण
बृहदारण्यकोपनिषद्
का प्रसिद्ध कथन है— काममय
एवायं पुरुषः। (बृहदारण्यकोपनिषद् 4.4.5)
भावार्थ
यह
मनुष्य इच्छाओं (काम) से निर्मित
है।
यहाँ
काम का अर्थ केवल
इन्द्रिय-भोग नहीं, बल्कि
इच्छा, आकांक्षा, अभिलाषा और आन्तरिक प्रेरणा है।
उपनिषद्
आगे कहता है—
यथाकामो
भवति तत्क्रतुर्भवति।
यत्क्रतुर्भवति तत्कर्म करोति।
यत्कर्म करोति तदभिसम्पद्यते॥
भावार्थ
- जैसा
मनुष्य की इच्छा होती है,
- वैसा
उसका संकल्प बनता है,
- जैसा
संकल्प होता है,
- वैसा
वह कर्म करता है,
- और
जैसे कर्म करता है,
- वैसा
ही वह बन जाता है।
यह
भारतीय दर्शन में कर्म-मनोविज्ञान का सबसे सुव्यवस्थित सूत्र है।
इच्छा
→ संकल्प → कर्म → अस्तित्व
बृहदारण्यकोपनिषद्
मानव जीवन का एक
कारण-क्रम प्रस्तुत करता
है—
इच्छा
(काम) → संकल्प (क्रतु) → कर्म → संस्कार → व्यक्तित्व → अस्तित्व (जीवन-गति)
यह
केवल नैतिक सिद्धान्त नहीं, बल्कि अस्तित्व का सिद्धान्त (Ontology of Human
Becoming) है।
मनुष्य
अपने कर्मों से केवल समाज
को नहीं बदलता, वह
स्वयं भी निरन्तर बदलता
रहता है।
कर्म
और पुनर्जन्म
उपनिषद्
कहता है— यथाकारी यथाचारी तथा भवति। साधुकारी साधुर्भवति। पापकारी पापो भवति॥
(4.4.5) भावार्थ
जैसा
कर्म और जैसा आचरण,
वैसा ही मनुष्य बनता
है।
- शुभ
कर्म शुभ व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं।
- अशुभ
कर्म अशुभ संस्कारों का।
यहाँ
कर्मफल केवल बाहरी पुरस्कार
या दण्ड नहीं, बल्कि
अस्तित्व का रूपान्तरण है।
कर्म
का दार्शनिक अर्थ
बृहदारण्यकोपनिषद्
के अनुसार कर्म केवल शारीरिक
क्रिया नहीं है।
कर्म
में सम्मिलित हैं— विचार,इच्छा,संकल्प,वाणी,व्यवहार,और
उनके द्वारा निर्मित संस्कार।
अतः
कर्म एक समग्र चेतन प्रक्रिया है।
ज्ञान
और कर्म का सम्बन्ध
उपनिषद्
स्पष्ट करता है कि
कर्म का मूल कारण
अविद्या है।
जब
मनुष्य स्वयं को केवल शरीर
या मन मानता है—
- इच्छाएँ
उत्पन्न होती हैं।
- इच्छाओं
से कर्म होते हैं।
- कर्म
से बन्धन उत्पन्न होता है।
परन्तु
जब आत्मज्ञान होता है—
आत्मा
वा अरे द्रष्टव्यः, श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः।
(2.4.5; 4.5.6)
तब
मनुष्य जान लेता है
कि उसका वास्तविक स्वरूप
नित्य, शुद्ध और अविकार आत्मा
है। इस ज्ञान से
कर्म समाप्त नहीं होते, बल्कि
कर्तापन (Doership) और भोक्तापन (Enjoyership) का मिथ्या अहंकार समाप्त हो जाता है।
अस्तित्व
का रूपान्तरण
बृहदारण्यकोपनिषद्
का लक्ष्य केवल नैतिक सुधार
नहीं है।
उसका
उद्देश्य है—
अस्तित्व
का रूपान्तरण।
जब
आत्मा का बोध होता
है— इच्छाएँ शुद्ध होती हैं। कर्म निष्काम
हो जाते हैं। भय समाप्त
हो जाता है।मृत्यु का
बन्धन टूट जाता है।यही
मोक्ष है।
"नेति-नेति" और कर्म
उपनिषद्
का प्रसिद्ध सिद्धान्त है— नेति नेति। (2.3.6)
यह
केवल दार्शनिक निषेध नहीं, बल्कि कर्म-दर्शन से
भी जुड़ा है।
जब
मनुष्य स्वयं को— शरीर नहीं,
मन नहीं, बुद्धि नहीं, अहंकार नहीं—
मानता,
तब कर्मों के साथ उसकी
मिथ्या पहचान टूटने लगती है। तब
कर्म होते हैं, परन्तु
वे आत्मा को बाँधते नहीं।
याज्ञवल्क्य
का कर्म-दर्शन
याज्ञवल्क्य
और मैत्रेयी के संवाद में
याज्ञवल्क्य कहते हैं—
न
वा अरे सर्वस्य कामाय सर्वं प्रियं भवति। आत्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति॥ (2.4.5)
भावार्थ
कोई
वस्तु अपने लिए प्रिय
नहीं होती; सब कुछ आत्मा
के कारण प्रिय होता
है।
यह
कथन इच्छा के दार्शनिक विश्लेषण
का शिखर है।
मनुष्य
वास्तव में वस्तुओं की
नहीं, आनन्द और पूर्णता की खोज करता
है; और वह पूर्णता
आत्मा में ही है।
इसलिए जब तक यह
सत्य ज्ञात नहीं होता, इच्छाएँ
बाह्य वस्तुओं की ओर दौड़ती
रहती हैं और कर्मों
का चक्र चलता रहता
है।
आधुनिक
सन्दर्भ
मनोविज्ञान
आधुनिक
मनोविज्ञान प्रेरणा (Motivation) को व्यवहार का
आधार मानता है।
बृहदारण्यकोपनिषद्
इससे आगे जाकर कहता
है— प्रेरणा का भी मूल कारण आत्म-अज्ञान या आत्म-बोध है।
न्यूरोसाइंस
-मस्तिष्क में इच्छाएँ निर्णयों
को प्रभावित करती हैं। उपनिषद् जोड़ता
है— इच्छा की दिशा ज्ञान
से निर्धारित होती है।
नैतिक
दर्शन -आधुनिक नैतिकता अक्सर केवल व्यवहार का
मूल्यांकन करती है। बृहदारण्यकोपनिषद् कहता है—
व्यवहार से पहले इच्छा और संकल्प का मूल्यांकन आवश्यक है।
नेतृत्व
-सच्चा नेतृत्व केवल नीतियों से
नहीं, बल्कि शुद्ध प्रेरणा और आत्मबोध से
जन्म लेता है।
उपनिषदों
में कर्म-दर्शन का क्रमिक विकास
यदि
प्रमुख उपनिषदों के कर्म-दर्शन
को क्रम में देखें,
तो एक स्पष्ट दार्शनिक
विकास दिखाई देता है—
|
उपनिषद् |
कर्म-दर्शन
का मुख्य प्रतिपाद्य |
|
कठोपनिषद् |
श्रेय
और प्रेय के आधार पर
कर्म का नैतिक विवेक |
|
ईशावास्योपनिषद् |
कर्म
और अनासक्ति का समन्वय |
|
मुण्डकोपनिषद् |
कर्म
की सीमा तथा आत्मविद्या की सर्वोच्चता |
|
छान्दोग्योपनिषद् |
संकल्प
से कर्म और कर्म से
व्यक्तित्व का निर्माण |
|
बृहदारण्यकोपनिषद् |
इच्छा
से संकल्प, संकल्प से कर्म और
कर्म से अस्तित्व का
निर्माण |
इस
प्रकार बृहदारण्यकोपनिषद् कर्म-दर्शन को
उसके सबसे गहरे अस्तित्वगत
(Ontological) आयाम तक ले जाता
है।
दार्शनिक
मूल्यांकन
बृहदारण्यकोपनिषद्
का विश्लेषण यह स्पष्ट करता
है कि—
- कर्म
केवल बाहरी कार्य नहीं है।
- इच्छा
कर्म की जड़ है।
- संकल्प
कर्म की दिशा निर्धारित करता है।
- संस्कार
व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं।
- आत्मज्ञान
इच्छा के मूल का रूपान्तरण कर देता है।
अतः
इस उपनिषद् में कर्म-दर्शन
का केन्द्र कर्म नहीं, बल्कि
चेतना है। चेतना बदलती
है तो इच्छा बदलती
है; इच्छा बदलती है तो कर्म
बदलते हैं; कर्म बदलते
हैं तो जीवन और
अस्तित्व का अनुभव बदल
जाता है।
बृहदारण्यकोपनिषद्
भारतीय कर्म-दर्शन को
उसकी सर्वाधिक गहन दार्शनिक ऊँचाई
प्रदान करता है। यह
प्रतिपादित करता है कि
मनुष्य जैसा चाहता है, वैसा संकल्प करता है; जैसा संकल्प करता है, वैसा कर्म करता है; और जैसे कर्म करता है, वैसा ही उसका व्यक्तित्व और अस्तित्व बनता है। इसलिए कर्म का वास्तविक
समाधान केवल बाह्य आचरण
में परिवर्तन नहीं, बल्कि इच्छा और चेतना के
रूपान्तरण में है। आत्मज्ञान
के द्वारा इच्छाओं का परिष्कार होता
है, कर्तापन का अहंकार समाप्त
होता है और कर्म
बन्धन का कारण न
रहकर आत्म-अभिव्यक्ति का
साधन बन जाते हैं।
इस प्रकार बृहदारण्यकोपनिषद् कर्म, इच्छा और अस्तित्व को
एकीकृत करते हुए भारतीय
दर्शन को एक गहन
अस्तित्ववादी, नैतिक और आध्यात्मिक कर्म-दर्शन प्रदान करता है।
मुकेश
श्रीवास्तव ,
(आत्मसन्तुलन
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