चिंतन - क्या मनुष्य का सबसे बड़ा वैभव संग्रह नहीं, वितरण है?
चिंतन - क्या मनुष्य का सबसे बड़ा वैभव संग्रह नहीं, वितरण है?
मनुष्य जब इस संसार में आता है, उसके हाथ खाली होते हैं।
जब वह इस संसार से जाता है, तब भी उसके हाथ खाली ही होते हैं।
इन दो रिक्तताओं के बीच वह जीवन भर कुछ-न-कुछ इकट्ठा करता रहता है—धन, ज्ञान, प्रतिष्ठा, संबंध, अनुभव और स्मृतियाँ।
तभी मेरे भीतर एक प्रश्न जन्म लेता है—क्या मनुष्य का सबसे बड़ा वैभव संग्रह नहीं, वितरण है?
संग्रह प्रकृति का नियम नहीं है।
प्रवाह उसका नियम है।
नदी यदि अपना जल रोक ले, तो दलदल बन जाती है।
बादल यदि वर्षा रोक लें, तो स्वयं ही भारी हो जाते हैं।
वृक्ष यदि अपने फल न गिराएँ, तो नए बीज जन्म ही न लें।
प्रकृति की प्रत्येक सुंदर वस्तु इसलिए सुंदर है कि वह अपने पास जो है, उसे बाँटती रहती है।
केवल मनुष्य ने संग्रह को सुरक्षा समझ लिया है।
उसे लगता है कि जितना अधिक उसके पास होगा, वह उतना ही अधिक निश्चिंत होगा।
पर क्या वास्तव में ऐसा होता है?
जितना संग्रह बढ़ता है,
उतनी ही उसकी चिंता भी बढ़ती है।
धन बढ़ता है,
तो उसे बचाने की चिंता बढ़ती है।
प्रतिष्ठा बढ़ती है,
तो उसे बनाए रखने का भय जन्म लेता है।
सत्ता बढ़ती है,
तो उसे खोने की आशंका साथ चलने लगती है।
यानी संग्रह केवल वस्तुओं का नहीं होता,
भयों का भी होने लगता है।
मुझे लगता है कि मनुष्य के पास जो सबसे मूल्यवान संपत्ति है, वह धन नहीं है।
वह है—
उसका समय।
उसका ज्ञान।
उसकी करुणा।
उसका अनुभव।
और सबसे बढ़कर—
उसकी उपस्थिति।
इनका जितना वितरण किया जाए,
वे उतने ही समृद्ध होते जाते हैं।
दीपक अपना प्रकाश बाँटकर अंधकारमय नहीं होता।
सुगंध अपना अस्तित्व बाँटकर कम नहीं होती।
प्रेम साझा करने से घटता नहीं।
ज्ञान सिखाने से समाप्त नहीं होता।
यही जीवन का अद्भुत गणित है—
जो वस्तुएँ बाँटने से घटती हैं, वे बाहरी हैं।
जो बाँटने से बढ़ती हैं, वे भीतर की संपदा हैं।
भारतीय चिंतन ने दान को केवल धन देने का नाम नहीं दिया।
सबसे बड़ा दान अभयदान माना गया—
ऐसा जीवन जीना, जिससे किसी को भय न हो।
फिर विद्यादान।
फिर अन्नदान।
अर्थात् जो तुम्हारे पास है,
उसे अपने तक सीमित मत रखो।
क्योंकि जीवन अधिकार से नहीं,
अर्पण से विशाल होता है।
मुझे कभी-कभी लगता है कि किसी मनुष्य की समृद्धि का सही माप यह नहीं है कि उसने कितना अर्जित किया।
सही प्रश्न यह है—
उसके जाने के बाद कितने लोगों के जीवन में उसका प्रकाश बचा रहेगा?
यदि किसी शिक्षक के जाने के बाद भी उसके शिष्य सत्य की ओर बढ़ते रहें—
वह समृद्ध था।
यदि किसी माता की अनुपस्थिति में भी उसके संस्कार घर को जीवित रखें—
वह समृद्ध थी।
यदि किसी लेखक के शब्द उसके जीवन के बाद भी चेतना को प्रकाशित करते रहें—
वह समृद्ध था।
यही वास्तविक वैभव है।
जो व्यक्ति अपने साथ सब कुछ ले जाना चाहता है,
वह अंततः कुछ भी नहीं ले जा पाता।
और जो जीवन भर बाँटता रहता है,
वह स्वयं न रहते हुए भी लोगों के भीतर जीवित रहता है।
अंततः मनुष्य की पहचान उसके संग्रह से नहीं होती।
उसकी पहचान उस प्रकाश से होती है,
जो उसके स्पर्श से दूसरों के जीवन में पहुँचा।
तभी लगता है—
मनुष्य का सबसे बड़ा वैभव संग्रह नहीं, वितरण है।
क्योंकि जो केवल अपने लिए जीता है,
वह समय के साथ समाप्त हो जाता है।
पर जो अपने जीवन को बाँट देता है,
वह अपने शरीर से नहीं—
अपनी करुणा से अमर हो जाता है।
— मुकेश
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