ईशावास्योपनिषद् के चतुर्थ मन्त्र की मीमांसात्मक व्याख्या

 ईशावास्योपनिषद् के चतुर्थ मन्त्र की मीमांसात्मक व्याख्या

ब्रह्म की अचलता और सर्वव्यापकता का दार्शनिक विवेचन

ईशावास्योपनिषद् का चतुर्थ मन्त्र उपनिषद्-दर्शन के उन विलक्षण मन्त्रों में है जहाँ भाषा अपनी सामान्य सीमाओं का अतिक्रमण करती प्रतीत होती है। अब तक उपनिषद् ने ईश्वरव्याप्ति, निष्काम कर्म तथा आत्मविस्मृति के परिणाम का निरूपण किया था; किन्तु इस मन्त्र में वह उस परम तत्त्व का स्वरूप प्रतिपादित करता है, जिसकी अनुभूति से पूर्ववर्ती सभी शिक्षाएँ अर्थपूर्ण हो जाती हैं। यह मन्त्र किसी दृश्य वस्तु का वर्णन नहीं करता, बल्कि उस चैतन्य सत्ता का संकेत करता है जो समस्त परिवर्तनशील जगत् का अपरिवर्तनीय आधार है।

मन्त्र है—

"अनेजदेकं मनसो जवीयो नैनद्देवा आप्नुवन् पूर्वमर्षत्।
तद्धावतोऽन्यानत्येति तिष्ठत्तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति॥"

सामान्य अर्थ में इस मन्त्र का भाव यह बताया जाता है कि ब्रह्म अचल होते हुए भी मन से अधिक वेगवान है; इन्द्रियाँ उसे प्राप्त नहीं कर सकतीं; वह स्थिर रहकर भी सबको पीछे छोड़ देता है और उसी में सम्पूर्ण विश्व-व्यवस्था स्थित है। किन्तु मीमांसात्मक दृष्टि से प्रश्न यह है कि क्या यह केवल काव्यात्मक अलंकार है, अथवा किसी सिद्ध तत्त्व का दार्शनिक प्रतिपादन? यदि वेद का प्रत्येक वाक्य प्रयोजनयुक्त है, तो इन परस्पर विरोधी प्रतीत होने वाले कथनों का वास्तविक तात्पर्य क्या है?

महर्षि जैमिनि के अनुसार वैदिक वाक्य का अर्थ उसके प्रयोजन, प्रसंग और सम्पूर्ण प्रकरण से निर्धारित होता है। चतुर्थ मन्त्र से पहले उपनिषद् ने यह स्पष्ट कर दिया है कि आत्मज्ञान ही जीवन का परम लक्ष्य है। अब स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि वह आत्मा या ब्रह्म है क्या? इस प्रश्न का उत्तर यह मन्त्र देता है। अतः यह मन्त्र न किसी कर्म का विधान करता है, न किसी निषेध का; यह एक सिद्धवस्तु-प्रतिपादक श्रुति है। इसका उद्देश्य ब्रह्म के स्वरूप का ऐसा निरूपण करना है जिसे प्रत्यक्ष और अनुमान जैसे लौकिक प्रमाण ग्रहण नहीं कर सकते।

मन्त्र का प्रथम शब्द "अनेजत्" अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। इसका अर्थ है—जो कभी कम्पित नहीं होता, जो परिवर्तन के अधीन नहीं है। संसार की प्रत्येक वस्तु परिवर्तनशील है; शरीर बदलता है, मन बदलता है, विचार बदलते हैं, परिस्थितियाँ बदलती हैं। यदि सब कुछ बदल रहा है, तो परिवर्तन का ज्ञान किसके कारण सम्भव है? परिवर्तन का बोध तभी सम्भव है जब कोई अपरिवर्तनीय सत्ता भी विद्यमान हो। उपनिषद् उसी अपरिवर्तनीय सत्ता को "अनेजत्" कहता है। यह अचलता स्थानगत नहीं, बल्कि स्वरूपगत है। ब्रह्म कहीं स्थिर बैठा हुआ नहीं है; वह इसलिए अचल है क्योंकि उसमें किसी प्रकार का विकार सम्भव नहीं।

इसके बाद मन्त्र कहता है—"एकम्"। यह केवल संख्या का एकत्व नहीं है। यहाँ "एक" का अर्थ अद्वितीय है—जिसका दूसरा कोई नहीं। यदि दूसरा भी होता, तो सीमाएँ उत्पन्न होतीं; जहाँ सीमा है, वहाँ अनन्तता नहीं रह सकती। इसलिए ब्रह्म का एकत्व गणितीय नहीं, अस्तित्वगत है। यही वह तत्त्व है जिसकी प्रतिध्वनि आगे चलकर "नेह नानास्ति किञ्चन" और "सर्वं खल्विदं ब्रह्म" जैसे महावाक्यों में सुनाई देती है।

मन्त्र का अगला वाक्य—"मनसो जवीयः"—पहली दृष्टि में विरोधाभासी प्रतीत होता है। जो अचल है, वह मन से भी अधिक वेगवान कैसे हो सकता है? मीमांसा की दृष्टि से यह विरोध वास्तविक नहीं, बल्कि भिन्न-भिन्न अपेक्षाओं का परिणाम है। मन किसी भी स्थान की कल्पना क्षणभर में कर सकता है, किन्तु जहाँ मन पहुँचता है, वहाँ चैतन्य पहले से ही विद्यमान होता है। मन का प्रत्येक विचार उसी चेतना में प्रकट होता है। अतः ब्रह्म मन से तेज इसलिए नहीं कि वह दौड़ता है, बल्कि इसलिए कि मन का अस्तित्व भी उसी पर आश्रित है। कारण अपने कार्य से कभी पीछे नहीं होता।

"नैनद्देवा आप्नुवन्"—यहाँ "देव" शब्द का अर्थ इन्द्रियाँ ग्रहण करना अधिक संगत है। उपनिषद् यह नहीं कह रहा कि देवता ब्रह्म तक नहीं पहुँच सकते, बल्कि यह बता रहा है कि इन्द्रियाँ ब्रह्म को अपने विषय की भाँति ग्रहण नहीं कर सकतीं। आँख रंग देख सकती है, कान ध्वनि सुन सकते हैं, किन्तु वह चैतन्य जिससे देखना और सुनना सम्भव है, वही इन्द्रियों का विषय नहीं बन सकता। इस प्रकार यह मन्त्र ज्ञानमीमांसा का भी एक मूल सिद्धान्त प्रस्तुत करता है कि आत्मा ज्ञाता है, ज्ञेय नहीं।

शबरस्वामी की प्रयोजन-मीमांसा के अनुसार वैदिक वाक्य का प्रयोजन साधक को उस सत्य तक पहुँचाना है जो अन्य प्रमाणों से उपलब्ध नहीं हो सकता। चतुर्थ मन्त्र इसी कसौटी पर पूर्णतः खरा उतरता है। प्रत्यक्ष केवल दृश्य वस्तुओं का ज्ञान देता है, अनुमान उनके सम्बन्धों का। किन्तु जो समस्त ज्ञान का आधार है, उसका ज्ञान केवल श्रुति से ही सम्भव है। इसलिए यह मन्त्र अपूर्व विषय का प्रतिपादन करता है और श्रुति के स्वतःप्रमाण स्वरूप को पुष्ट करता है।

मन्त्र का अगला भाग—"तद्धावतोऽन्यानत्येति तिष्ठत्"—भी गहन मीमांसात्मक अर्थ रखता है। यहाँ ब्रह्म के दौड़ने का वर्णन नहीं है। इसका अभिप्राय यह है कि समस्त गति उसी पर आश्रित है। जैसे चलचित्र के सभी दृश्य स्थिर पर्दे पर घटित होते हैं, किन्तु पर्दा स्वयं नहीं चलता, उसी प्रकार समस्त विश्व की गति उस अचल चेतना में घटित होती है। वह स्वयं अपरिवर्तित रहते हुए भी सभी परिवर्तनों का आधार है। इसलिए कहा गया कि वह स्थिर रहकर भी सबको पीछे छोड़ देता है।

मन्त्र के अन्त में कहा गया है—"तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति।" "मातरिश्वा" का अर्थ प्राण या वायु से लिया जाता है। इसका तात्पर्य यह है कि सम्पूर्ण विश्व-व्यवस्था, पंचमहाभूतों का संतुलन, जीवन की गति और प्रकृति का क्रम उसी परम सत्ता पर आश्रित है। यहाँ ब्रह्म को किसी दूरस्थ सत्ता के रूप में नहीं, बल्कि समस्त अस्तित्व के आधारभूत सत्य के रूप में प्रस्तुत किया गया है। मीमांसा की दृष्टि से यह वाक्य उपपत्ति का कार्य करता है—अर्थात् यह बताता है कि ब्रह्म केवल दार्शनिक कल्पना नहीं, बल्कि सम्पूर्ण व्यवस्था का आधार है।

कुमारिल भट्ट के अनुसार किसी वैदिक वाक्य के सभी पदों का समन्वय किए बिना उसका तात्पर्य ग्रहण नहीं किया जा सकता। यदि केवल "अनेजत्" पर बल दिया जाए, तो ब्रह्म निष्क्रिय प्रतीत होगा; यदि केवल "मनसो जवीयः" को ग्रहण किया जाए, तो उसमें गति का आरोप होगा। किन्तु सम्पूर्ण वाक्य को एक साथ देखने पर स्पष्ट होता है कि उपनिषद् भौतिक गति का नहीं, चेतना की सर्वव्यापकता का वर्णन कर रहा है। यही वाक्यैकवाक्यता का सिद्धान्त है।

प्रभाकराचार्य के मत में ज्ञान का उद्देश्य केवल बौद्धिक तृप्ति नहीं, बल्कि दृष्टि का रूपान्तरण है। जब साधक यह समझ लेता है कि समस्त गति, परिवर्तन और अनुभव का आधार एक अपरिवर्तनीय चैतन्य है, तब वह स्वयं को परिवर्तनशील शरीर और मन तक सीमित नहीं मानता। यही आत्मबोध का प्रारम्भ है। इसलिए यह मन्त्र केवल ब्रह्म का परिचय नहीं देता; यह साधक की आत्मपहचान को भी परिवर्तित करता है।

आदि शंकराचार्य ने इस मन्त्र की व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया है कि ब्रह्म निरवयव, निर्विकार और सर्वव्यापक है। उसमें गति और अगति का विरोध नहीं है, क्योंकि ये दोनों उपाधियों की दृष्टि से कहे गए हैं। स्वरूपतः वह अचल है, किन्तु उपाधियों के माध्यम से समस्त गति का आधार भी वही है। यह व्याख्या मीमांसात्मक दृष्टि से भी संगत है, क्योंकि प्रसंगानुसार शब्दों के मुख्य और गौण अर्थ का विवेक आवश्यक है।

स्वामी परमार्थानन्द जी इस मन्त्र को आधुनिक दृष्टि से समझाते हुए कहते हैं कि ब्रह्म कोई ऐसी वस्तु नहीं जिसे खोजकर कहीं प्राप्त किया जाए। वह वही चेतना है जिसके कारण खोज सम्भव है। खोजने वाला, खोज की प्रक्रिया और खोज का विषय—इन सबका आधार वही एक चैतन्य है। इस प्रकार ब्रह्म को प्राप्त करना किसी स्थान तक पहुँचना नहीं, बल्कि अपनी वास्तविक पहचान का अनावरण है।

समकालीन सन्दर्भ में यह मन्त्र अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। आज मनुष्य गति को ही प्रगति समझ बैठा है। विज्ञान, तकनीक और संचार ने अभूतपूर्व वेग प्रदान किया है, किन्तु आन्तरिक स्थिरता का संकट भी उतना ही बढ़ा है। उपनिषद् स्मरण कराता है कि बाह्य गति तभी सार्थक है जब उसका आधार आन्तरिक स्थिरता हो। जो अपने भीतर के अचल चैतन्य से जुड़ा नहीं है, उसकी बाहरी उपलब्धियाँ भी अन्ततः अशान्ति का कारण बन सकती हैं। इसलिए यह मन्त्र केवल दार्शनिक नहीं, गहन अस्तित्वगत और व्यावहारिक महत्त्व भी रखता है।

अतः मीमांसात्मक दृष्टि से ईशावास्योपनिषद् का चतुर्थ मन्त्र ब्रह्म के स्वरूप का सिद्धवस्तु-प्रतिपादक वाक्य है। जैमिनि की तात्पर्य-पद्धति, शबरस्वामी की प्रयोजन-मीमांसा, कुमारिल भट्ट की वाक्यैकवाक्यता, प्रभाकर की ज्ञान-दृष्टि तथा शंकराचार्य के अद्वैत भाष्य—इन सभी के आलोक में यह स्पष्ट होता है कि ब्रह्म न गति का विषय है, न स्थूल अनुभव का; वह समस्त गति का आधार, समस्त ज्ञान का प्रकाश और समस्त अस्तित्व की एकमात्र अपरिवर्तनीय सत्ता है। उसी के ज्ञान से मनुष्य परिवर्तनशील जगत् के मध्य रहते हुए भी आन्तरिक स्थिरता, निर्भयता और आत्मस्वरूप की अनुभूति प्राप्त करता है। यही इस चतुर्थ मन्त्र का मीमांसात्मक सार और उपनिषद् का गम्भीर दार्शनिक संदेश है।

— मुकेश

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