चिंतन - क्या यंत्र बुद्धि का विस्तार कर सकते हैं, पर चेतना का नहीं?
चिंतन - क्या यंत्र बुद्धि का विस्तार कर सकते हैं, पर चेतना का नहीं?
मनुष्य ने अपने हाथों की शक्ति बढ़ाने के लिए औज़ार बनाए। फिर उसने अपनी गति बढ़ाने के लिए वाहन बनाए। उसके बाद उसने अपनी स्मृति, गणना और विश्लेषण की क्षमता बढ़ाने के लिए यंत्रों का निर्माण किया। आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता ऐसे कार्य कर रही है, जिनकी कभी कल्पना भी कठिन थी।
पर तभी मेरे भीतर एक प्रश्न जन्म लेता है—क्या यंत्र बुद्धि का विस्तार कर सकते हैं, पर चेतना का नहीं?
बुद्धि जानती है।
चेतना जागती है।
बुद्धि तुलना करती है।
चेतना साक्षी होती है।
बुद्धि उत्तर खोजती है।
चेतना प्रश्न के पीछे छिपे हुए स्वयं को खोजती है।
यहीं से दोनों के बीच का अंतर स्पष्ट होने लगता है।
यंत्र गणना कर सकते हैं।
वे स्मृतियों का विशाल भंडार बन सकते हैं।
वे भाषा रच सकते हैं।
चित्र बना सकते हैं।
संगीत की रचना भी कर सकते हैं।
पर क्या वे किसी शिशु की मुस्कान देखकर भीतर उठने वाली करुणा का अनुभव कर सकते हैं?
क्या वे किसी प्रियजन के वियोग में मौन हो जाने का अर्थ जी सकते हैं?
क्या वे मृत्यु के सामने खड़े होकर अपने अस्तित्व पर प्रश्न कर सकते हैं?
यहीं चेतना का क्षेत्र आरंभ होता है।
मुझे लगता है कि बुद्धि का उद्देश्य संसार को समझना है।
चेतना का उद्देश्य स्वयं को समझना है।
बुद्धि पूछती है—
"यह क्या है?"
चेतना पूछती है—
"मैं कौन हूँ?"
पहला प्रश्न विज्ञान की ओर ले जाता है।
दूसरा अध्यात्म की ओर।
दोनों विरोधी नहीं हैं।
पर दोनों एक-दूसरे के स्थानापन्न भी नहीं हैं।
भारतीय दर्शन ने चित् को मनुष्य का मूल स्वरूप माना है।
विचार आते हैं, चले जाते हैं।
भावनाएँ बदलती रहती हैं।
शरीर बदलता है।
स्मृतियाँ बदलती हैं।
पर जो इन सबको देख रहा है,
वह चेतना है।
उसे न किसी यंत्र में स्थापित किया जा सकता है,
न किसी सूत्र में बाँधा जा सकता है।
क्योंकि वह वस्तु नहीं,
अनुभव है।
आज का समय हमें असाधारण बुद्धि दे रहा है।
पर एक प्रश्न और भी महत्वपूर्ण होता जा रहा है—
क्या हमारी चेतना भी उतनी ही विकसित हो रही है?
यदि बुद्धि बढ़े और करुणा न बढ़े,
तो ज्ञान विनाश का साधन भी बन सकता है।
यदि तकनीक बढ़े और विवेक न बढ़े,
तो सुविधा के साथ संकट भी बढ़ेंगे।
इसलिए यंत्रों का विकास जितना आवश्यक है,
उतना ही मनुष्य के अंतःकरण का विकास भी।
मुझे कभी-कभी लगता है कि भविष्य का सबसे बड़ा संकट यह नहीं होगा कि यंत्र मनुष्य जैसे हो जाएँ।
संकट यह होगा कि कहीं मनुष्य ही यंत्रों जैसा न हो जाए—
तेज़,
सटीक,
कुशल,
पर भीतर से संवेदनहीन।
यदि ऐसा हुआ,
तो हमने तकनीक तो जीत ली होगी,
पर स्वयं को खो दिया होगा।
अंततः यंत्र हमारे सहायक हो सकते हैं।
वे हमारी बुद्धि का विस्तार कर सकते हैं।
वे हमें अधिक जानने, अधिक बनाने और अधिक समझने में सहायता दे सकते हैं।
पर स्वयं को देखने की क्षमता,
करुणा की अग्नि,
मौन का रस,
और सत्य के लिए बेचैन होने वाली जिज्ञासा—
ये किसी यंत्र से नहीं आतीं।
ये मनुष्य की चेतना से जन्म लेती हैं।
तभी लगता है—
यंत्र बुद्धि का विस्तार कर सकते हैं; चेतना का नहीं।
क्योंकि बुद्धि हमें संसार तक पहुँचा सकती है,
पर चेतना ही हमें
स्वयं तक पहुँचाती है।
— मुकेश
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