जहाँ प्रेम बोलता नहीं
जहाँ प्रेम बोलता नहीं
उससे पहली मुलाक़ात किसी फ़िल्म की तरह नहीं हुई थी।
न कोई तेज़ हवा चली,
न कोई बारिश हुई,
न समय अचानक ठहर गया।
बस एक साधारण-सी दोपहर थी...
और उसी साधारण दोपहर में,
वह मेरी ज़िंदगी की सबसे असाधारण घटना बन गई।
वह खिड़की के पास बैठी थी।
धूप उसके चेहरे पर नहीं,
उसकी चुप्पी पर उतर रही थी।
मैंने उसे पहली बार देखा,
तो लगा जैसे किसी ने बहुत पुराने गीत का वह अंतरा सुना दिया हो,
जिसे मैं बरसों से भूल चुका था।
हमारे बीच परिचय हुआ।
नाम पता चले।
कुछ औपचारिक बातें हुईं।
फिर अचानक बातचीत समाप्त हो गई...
लेकिन अजीब बात यह थी कि बातचीत समाप्त होने के बाद भी
हमारे बीच कुछ चलता रहा।
शायद मौन...
या शायद वही,
जिसे लोग प्रेम कहते हैं।
उसके साथ बैठना किसी नदी के किनारे बैठने जैसा था।
वह कम बोलती थी,
लेकिन उसकी आँखों में अनगिनत मौसम रहते थे।
कभी सावन,
कभी पतझर,
कभी धूप की सुनहरी थकान।
मैं अक्सर उसे देखता नहीं था।
मैं उसे महसूस करता था।
जब वह मुस्कुराती,
तो लगता कमरे में रखी हर निर्जीव वस्तु भी थोड़ी-सी जीवित हो गई है।
एक दिन उसने पूछा—
"तुम इतने चुप क्यों रहते हो?"
मैं हँसा।
कहा—
"जो बातें तुम्हारे सामने कहनी हों,
वे शब्दों में पूरी नहीं उतरतीं।"
उसने कुछ नहीं कहा।
बस अपनी उँगलियों से मेज़ पर एक अदृश्य वृत्त बनाती रही।
उस दिन पहली बार मुझे समझ आया—
कुछ उत्तर सुनने के लिए नहीं,
देखने के लिए होते हैं।
दिन बीतते गए।
हमने साथ में कई शामें देखीं।
कई चाय के प्याले ठंडे हुए।
कई बार एक ही किताब के अलग-अलग पन्ने पढ़े।
कई बार बिना किसी कारण हँसे।
और कई बार बिना किसी दुख के चुप रहे।
धीरे-धीरे मुझे महसूस हुआ—
प्रेम साथ रहने का नाम नहीं।
प्रेम किसी के भीतर धीरे-धीरे घर बन जाने का नाम है।
फिर एक दिन उसे जाना था।
कोई शिकायत नहीं थी।
कोई वादा भी नहीं।
उसने बस इतना कहा—
"अगर कभी मेरी याद आए,
तो मुझे ढूँढ़ना मत...
बस उसी तरह मुस्कुरा देना,
जैसे मैं तुम्हारे सामने बैठी हूँ।"
वह चली गई।
लेकिन जाने वाले हमेशा चले कहाँ जाते हैं?
कुछ लोग हमारे घर से नहीं,
हमारी साँसों से होकर गुज़रते हैं।
आज भी जब शाम की धूप खिड़की पर उतरती है,
मैं अनायास दूसरी कुर्सी की ओर देख लेता हूँ।
वहाँ कोई नहीं होता।
फिर भी लगता है—
किसी ने अभी-अभी मुस्कुराकर मेरी ओर देखा है।
और मैं समझ जाता हूँ—
सच्चा प्रेम कभी समाप्त नहीं होता।
वह केवल दिखाई देना छोड़ देता है।
बाक़ी...
वह हमेशा वहीं रहता है—
दो धड़कनों के बीच,
दो साँसों के बीच,
और उस मौन में,
जहाँ प्रेम बोलता नहीं...
सिर्फ़ उपस्थित रहता है।
मुकेश',,,,,,,,,,,,,,,,,
Comments
Post a Comment