चिन्तन -आत्मावलोकन -मेरी झोली में रखा जीवन
आत्मावलोकन -मेरी झोली में रखा जीवन
इससे "आत्मावलोकन" एक विधा (reflection) बन जाता है और "मेरी झोली में रखा जीवन" वास्तविक शीर्षक। यह पुस्तक या ब्लॉग—दोनों के लिए अधिक परिपक्व प्रस्तुति होगी।
साथ ही, मैंने अंतिम अनुच्छेद को थोड़ा और संयत किया है। "प्रभु" शब्द की जगह "खेल पूरी ईमानदारी से खेला था" को अंतिम वाक्य रहने दिया है। इससे लेख किसी एक धार्मिक भाव के बजाय सार्वभौमिक मानवीय अनुभव पर समाप्त होता है, और उसका प्रभाव अधिक देर तक बना रहता है।
आत्मावलोकन
मेरी झोली में रखा जीवन
जब कभी अपने बारे में सोचता हूँ तो लगता है कि मैं किसी मदारी की तरह हूँ—सड़क के किनारे तमाशा दिखाने वाला एक साधारण-सा आदमी।
जिसके पास न कोई स्थायी मंच है, न निश्चित दर्शक, न किसी एक कला का दावा।
बस एक झोली है। हर तमाशे के बाद वह अपना सारा सामान उसमें समेटता है और अगले पड़ाव की ओर चल देता है।
कभी-कभी सोचता हूँ, शायद मेरे जीवन की सबसे बड़ी कमी यही रही कि मैं कभी एक उद्देश्य लेकर नहीं चला। लोग पूरी उम्र एक ही वृक्ष की छाया में बैठे रहते हैं; मैं हर थोड़ी दूर पर पेड़ बदलता रहा। किसी एक नदी का यात्री नहीं बन सका। जहाँ कोई पगडंडी दिखाई दी, उधर मुड़ गया।
अध्ययन किया तो कभी दर्शन में उतर गया, कभी साहित्य में, कभी तंत्र के धुँधलके में, कभी मनोविज्ञान की भूलभुलैया में। दर्शन पढ़ने बैठा तो सांख्य ने बुला लिया, फिर न्याय ने रोक लिया, वैशेषिक ने उलझाया, मीमांसा ने प्रश्न खड़े कर दिए और वेदान्त ने भीतर झाँकने को कहा।
वेदान्त तक पहुँचा तो वहाँ भी कहाँ ठहरा! कभी ईशावास्योपनिषद्, कभी केनोपनिषद्, कभी कठोपनिषद्, कभी मुण्डकोपनिषद्। एक ग्रंथ समाप्त होते-होते दूसरा सामने खड़ा मुस्कुरा रहा होता।
उस समय डमरू उपनिषदों का था।
तमाशा चलता रहा।
लेखन भी शायद मेरी इसी बेचैनी का दूसरा नाम था। कभी नज़्म लिखी, कभी अतुकान्त कविता, कभी कहानी, कभी लेख, कभी उपन्यास। शब्दों ने भी मुझे कभी एक ही घर में रहने नहीं दिया।
लेकिन इस भटकन में एक बात हमेशा स्थिर रही।
मैंने कभी कोई तमाशा अधूरा नहीं छोड़ा।
शाम होती है। भीड़ छँट जाती है। तालियाँ थम जाती हैं। मदारी डमरू, रस्सी, रंगीन कपड़े और अपना छोटा-सा संसार समेटकर झोली में रख लेता है। अगले दिन किसी दूसरे चौक पर फिर वही मुस्कान लिए खड़ा हो जाता है।
शायद मैंने भी यही किया।
काम चाहे देर से पूरा हुआ हो, पर अधूरा छोड़ने की आदत कभी नहीं बनी।
भगवद्गीता पढ़ी तो केवल प्रेरक श्लोक चुनकर संतोष नहीं किया। अठारहों अध्याय पढ़े। बार-बार पढ़े। अनेक भाष्य पढ़े। फिर सात सौ के सात सौ श्लोकों पर वीडियो बनाए।
उस दिन डमरू गीता का था।
शाम को वह भी झोली में रख दिया।
भक्ति-दर्शन की ओर गया तो नारद भक्ति सूत्र ने हाथ पकड़ लिया। चौरासी सूत्र पढ़े, समझे, उन पर मनन किया और फिर प्रत्येक सूत्र पर वीडियो बनाए।
एक और तमाशा पूरा हुआ।
फिर झोली थोड़ी और भारी हो गई।
उपन्यास लिखने बैठा तो एक बोर आदमी का रोज़नामचा लिखा। प्रकाशित हुआ। फिर बूढ़े पेड़ों का वसंत लिखा। वह भी पाठकों तक पहुँचा। नज़्मों और कविताओं के साझा संग्रह आए। कहानियाँ समाचारपत्रों और पत्रिकाओं में छपीं। एक और उपन्यास प्रेस में है—शायद अपने समय की प्रतीक्षा करता हुआ।
ब्लॉग बनाया। बीच में कुछ समय मौन रहा, पर बुझा नहीं। आज भी कहीं-न-कहीं कोई नया शब्द उस पर दस्तक दे ही देता है।
ज्योतिष की ओर गया तो वह भी केवल जिज्ञासा भर नहीं रही। सीखते-सीखते वह आजीविका का एक शांत साधन भी बन गई। बिना किसी प्रचार के आज भी कुछ लोग चले आते हैं। सत्ताईसों नक्षत्रों पर शोधग्रंथ लिखे। अभी आर्थिक कारणों से प्रकाशित नहीं हो पाए। मुझे विश्वास है कि पुस्तकों का भी अपना भाग्य होता है। कुछ समय पर जन्म लेती हैं, कुछ समय की प्रतीक्षा करती हैं।
रंगमंच से जुड़ा तो लगभग दस वर्ष वहीं जीया। अभिनय किया। निर्देशन किया। नाटक लिखे। तमसो मा ज्योतिर्गमय मंचित हुआ। नासिक में मराठी कलाकारों ने उसे अपनाया। अन्य नाटक पुणे और प्रयागराज तक पहुँचे।
कुछ समय मंच ही मेरा चौक था।
तालियाँ मिलीं।
रोशनियाँ बुझीं।
और अंत में वेशभूषा भी उसी झोली में चली गई, जिसमें पहले से इतने तमाशे रखे थे।
नौकरी भी की तो उसे भी बीच रास्ते नहीं छोड़ा। जहाँ टिकने योग्य स्थान मिला, वहाँ पूरे तैंतीस वर्षों तक बना रहा। उससे पहले भी कुछ जगह काम किया, पर अंततः एक ही संस्थान से सेवा-निवृत्त हुआ। मुझे हमेशा लगता रहा कि निष्ठा भी एक प्रकार का मौन अभिनय है, जिसमें दर्शक कम होते हैं और परीक्षा अधिक।
विवाह हुआ। विचार मिले या नहीं, आदतें एक थीं या नहीं—इन प्रश्नों का उत्तर समय ने अपने ढंग से दिया। तीस वर्षों का साथ निभा। बेटे को पढ़ाया। उसके विवाह की जिम्मेदारी निभाई। आज भी परामर्श और कंसल्टेंसी के माध्यम से काम कर रहा हूँ।
अर्थात...
तमाशा अभी जारी है।
लोग कभी-कभी पूछ लेते हैं—"आख़िर आपकी पहचान क्या है? लेखक, दार्शनिक, ज्योतिषी, रंगकर्मी, शोधकर्ता या कुछ और?"
मैं उत्तर नहीं दे पाता।
क्योंकि सच तो यह है कि मैं इनमें से कोई भी पूरी तरह नहीं हूँ।
और शायद इसलिए थोड़ा-थोड़ा सब हूँ।
अब पीछे मुड़कर देखता हूँ तो समझ में आता है कि मुझे मंज़िलों से अधिक यात्राएँ प्रिय थीं। मुझे किसी एक सत्य का स्वामी बनने की जल्दी नहीं थी। मैं तो बस हर दरवाज़े पर दस्तक देकर आगे बढ़ता गया।
संभव है किसी विशेषज्ञ की दृष्टि में यह मेरी सबसे बड़ी कमजोरी हो।
लेकिन मेरे भीतर का यात्री इसे अपनी सबसे बड़ी पूँजी मानता है।
अब लगता है, मैं मदारी भी नहीं था।
मैं तो अपनी ही जिज्ञासाओं का दर्शक था।
हर नया विषय एक नया तमाशा था।
हर तमाशे ने मेरी झोली में एक नया अनुभव रख दिया।
किसी ने शब्द दिए।
किसी ने प्रश्न।
किसी ने मंच।
किसी ने मौन।
किसी ने पराजय।
किसी ने धैर्य।
और धीरे-धीरे मुझे समझ में आया कि मैं उपलब्धियाँ नहीं बटोर रहा था; मैं अपना जीवन समेट रहा था।
शायद मनुष्य का जीवन भी इससे बहुत अलग नहीं।
हम सब अपने-अपने चौक पर खड़े हैं।
कोई धन का तमाशा दिखा रहा है।
कोई ज्ञान का।
कोई प्रसिद्धि का।
कोई प्रेम का।
कोई आध्यात्म का।
संध्या होगी।
सब अपनी-अपनी झोलियाँ समेटेंगे।
डमरू यहीं रह जाएगा।
तालियाँ भी यहीं रह जाएँगी।
दर्शक भी बदल जाएँगे।
यदि कुछ साथ जाएगा, तो वह केवल यह संतोष कि हमने अपने हिस्से का जीवन कितनी ईमानदारी से जिया।
अब मुझे इस बात का कोई अफ़सोस नहीं कि मैं एक ही रास्ते पर क्यों नहीं चला।
शायद मेरा रास्ता ही अनेक रास्तों से होकर गुजरता था।
आज भी कोई नया विषय मुझे बुलाता है।
कोई नई पुस्तक आवाज़ देती है।
कोई नया प्रश्न जन्म लेता है।
मैं फिर अपनी झोली उठाता हूँ...
और अगले चौक की ओर चल पड़ता हूँ।
शायद आख़िरी साँस तक यही चलता रहेगा।
और जब एक दिन अंतिम बार अपनी झोली समेटूँगा, तब पीछे मुड़कर देखूँगा और मुस्कुरा दूँगा।
क्योंकि मेरी झोली खाली नहीं होगी।
उसमें कुछ पुस्तकें होंगी, कुछ अधूरी पांडुलिपियाँ, कुछ मंचों की रोशनियाँ, कुछ अनुत्तरित प्रश्न, कुछ सफलताएँ, कुछ असफलताएँ, कुछ मित्र, कुछ बिछोह, कुछ सपने और बहुत-सी यात्राएँ।
और तब मैं न किसी उपलब्धि का हिसाब करूँगा, न किसी असफलता का।
बस इतना कह सकूँ—
"खेल पूरी ईमानदारी से खेला था।"
— मुकेश श्रीवास्तव
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