अधूरा

 अधूरा

तुम मिली होतीं,

तो शायद

यह नज़्म

लिखी ही न जाती।

कुछ अल्फ़ाज़

सिर्फ़ अधूरी मुहब्बतें लिखवाती हैं।

मुकेश ,,,,,,,

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