चिंतन - क्या ऐसी उन्नति ही वास्तविक है, जिससे किसी और का पतन न हो?

 चिंतन - क्या ऐसी उन्नति ही वास्तविक है, जिससे किसी और का पतन न हो?

मनुष्य का जीवन निरंतर आगे बढ़ने की आकांक्षा से भरा हुआ है। वह ऊँचा उठना चाहता है, सफल होना चाहता है, सम्मान पाना चाहता है। यह आकांक्षा स्वाभाविक है। बीज भी वृक्ष बनना चाहता है। नदी भी समुद्र तक पहुँचना चाहती है। पक्षी भी आकाश की ऊँचाइयाँ नापना चाहता है।

पर तभी मेरे भीतर एक प्रश्न जन्म लेता है—क्या ऐसी उन्नति ही वास्तविक है, जिससे किसी और का पतन न हो?

ऊँचा उठना कभी समस्या नहीं रहा।

समस्या तब आरंभ होती है, जब अपनी ऊँचाई के लिए हम किसी और की ज़मीन खिसकाने लगते हैं।

यदि मेरी सफलता किसी की अस्मिता को कुचलकर आई है,

यदि मेरी समृद्धि किसी की विवशता पर खड़ी है,

यदि मेरी प्रतिष्ठा किसी के अपमान से बनी है,

तो वह उन्नति नहीं—

सिर्फ़ ऊँचाई है।

और ऊँचाई, बिना नैतिकता के, अक्सर अकेली रह जाती है।

प्रकृति को देखिए।

वृक्ष जितना ऊँचा होता है, उतनी ही गहरी छाया देता है।

नदी जितनी विशाल होती है, उतने ही अधिक गाँवों की प्यास बुझाती है।

बादल जितने समृद्ध होते हैं, उतने ही उदार होकर बरसते हैं।

प्रकृति की उन्नति कभी किसी के हिस्से का आकाश नहीं छीनती।

वह अपने विस्तार में दूसरों के लिए भी स्थान बनाती है।

शायद यही विकास का वास्तविक अर्थ है।

मुझे लगता है कि मनुष्य की पहचान उसकी उपलब्धियों से कम,

उन उपलब्धियों के प्रभाव से अधिक होती है।

यदि किसी के आगे बढ़ने से अनेक हाथ भी आगे बढ़ जाएँ,

तो वह उन्नति समाज की संपत्ति बन जाती है।

पर यदि उसकी सफलता के पीछे भय, छल, ईर्ष्या और शोषण की लंबी छाया हो,

तो वह सफलता बाहर से चमकती हुई भी भीतर से खोखली होती है।

भारतीय चिंतन में लोकसंग्रह का विचार इसी कारण महत्त्वपूर्ण है।

व्यक्ति केवल अपने लिए न जिए।

उसका कर्म ऐसा हो कि उससे समाज का भी कल्याण हो।

जो केवल स्वयं के लिए बढ़ता है,

वह बड़ा हो सकता है।

महान नहीं।

महानता का माप पद नहीं,

प्रभाव है।

आज प्रतिस्पर्धा ने हमें यह विश्वास दिला दिया है कि संसार में स्थान सीमित है।

यदि दूसरा आगे बढ़ेगा, तो मैं पीछे रह जाऊँगा।

यही सोच ईर्ष्या को जन्म देती है।

जबकि प्रकृति का विधान कुछ और है।

एक दीपक दूसरे दीपक को जलाता है,

तो उसका प्रकाश कम नहीं होता।

ज्ञान बाँटने से घटता नहीं।

प्रेम देने से सूखता नहीं।

करुणा खर्च करने से समाप्त नहीं होती।

जीवन की सबसे मूल्यवान संपत्तियाँ बाँटने से बढ़ती हैं।

मुझे कभी-कभी लगता है कि सबसे सुंदर मनुष्य वह नहीं,

जो सबसे ऊँचा पहुँचा।

सबसे सुंदर वह है,

जिसकी यात्रा में किसी को धक्का नहीं लगा।

जिसकी सफलता ने दूसरों का साहस बढ़ाया।

जिसकी उपलब्धियों ने दूसरों के लिए भी रास्ते खोले।

जिसके हाथ ऊपर उठे,

तो किसी और को उठाने के लिए भी बढ़े।

अंततः उन्नति का प्रश्न यह नहीं है कि हम कितनी दूर पहुँचे।

प्रश्न यह है कि वहाँ पहुँचकर हमारे कारण कितने लोग सुरक्षित, सम्मानित और प्रेरित हुए।

यदि हमारी ऊँचाई से किसी का क्षितिज छोटा हो जाए,

तो हमें अपनी ऊँचाई पर पुनर्विचार करना चाहिए।

तभी लगता है—

ऐसा जीवन जियो कि तुम्हारी उन्नति से किसी और का पतन न हो।

क्योंकि वह उन्नति, जो दूसरों को गिराकर प्राप्त हो,

समय उसे उपलब्धि कह सकता है—

पर इतिहास उसे महानता कभी नहीं कहेगा।

— मुकेश

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