अगर कभी तुम ग़ायब हो जाओ...

 अगर कभी तुम ग़ायब हो जाओ...

अगर कभी

एक सुबह ऐसा हो

कि तुम इस दुनिया में मौजूद तो हो,

मगर

किसी की आँखों को दिखाई न दो...

तो क्या करोगी?

क्या किसी बाग़ में जाकर

फूलों को छुओगी,

और देखोगी

कि वे तुम्हें पहचानते हैं या नहीं?

क्या बारिश की पहली बूँद

अपनी हथेली पर रोककर

उससे पूछोगी—

"बताओ... मैं सचमुच यहाँ हूँ न?"

या फिर

चुपके से

मेरे क़रीब आकर बैठ जाओगी...

और इंतज़ार करोगी

कि मैं

बिना देखे भी

तुम्हारी मौजूदगी महसूस कर लूँ।

जानती हो...

मुझे यक़ीन है,

मैं तुम्हें

आँखों से नहीं ढूँढ़ूँगा।

मैं हवा से पूछूँगा,

जो अचानक

इत्र की तरह महकने लगेगी।

मैं ख़ामोशी से पूछूँगा,

जो बेवजह

गुनगुनाने लगेगी।

मैं अपने दिल से पूछूँगा,

जो बिना वजह

तेज़ धड़कने लगेगा।

और फिर

मैं मुस्कुरा दूँगा...

क्योंकि

कुछ लोग दिखाई नहीं देते,

वे महसूस होते हैं।

ठीक वैसे ही,

जैसे रूह...

या दुआ...

या मोहब्बत।

— मुकेश

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