चिंतन - क्या सुविधा ने मनुष्य से संघर्ष का सौंदर्य छीन लिया है?
चिंतन - क्या सुविधा ने मनुष्य से संघर्ष का सौंदर्य छीन लिया है?
सभ्यता की सबसे बड़ी उपलब्धि सुविधा है। मनुष्य ने पहाड़ काटकर रास्ते बनाए, नदियों पर पुल बनाए, अग्नि को वश में किया, मशीनें बनाई, और अंततः एक ऐसी दुनिया रच दी जहाँ अधिकांश कार्य एक स्पर्श से पूरे हो जाते हैं।
यह सब विकास है।
परंतु हर विकास अपने साथ एक प्रश्न भी लाता है।
और आज वह प्रश्न मेरे भीतर इस रूप में उठता है—क्या सुविधा ने मनुष्य से संघर्ष का सौंदर्य छीन लिया है?
संघर्ष केवल कठिनाई का नाम नहीं है।
संघर्ष वह अग्नि है, जिसमें व्यक्तित्व तपकर अपना वास्तविक रूप प्राप्त करता है।
सोना आग से बच जाए, तो आभूषण नहीं बनता।
मिट्टी चाक और भट्ठी से गुज़रे बिना घड़ा नहीं बनती।
बीज धरती का अंधकार न सहे, तो वृक्ष नहीं बनता।
प्रकृति की हर सुंदर रचना संघर्ष की कोख से जन्म लेती है।
केवल मनुष्य ने संघर्ष को अभिशाप मान लिया है।
आज हम ऐसे समय में हैं जहाँ प्रतीक्षा कम हो गई है, पर अधीरता बढ़ गई है।
सुविधाएँ बढ़ी हैं, पर संतोष घट गया है।
साधन बढ़े हैं, पर सहनशक्ति कम हो गई है।
यह विरोधाभास केवल सामाजिक नहीं, आध्यात्मिक भी है।
क्योंकि सुविधा शरीर को आराम देती है, पर हर सुविधा आत्मा को परिपक्व नहीं बनाती।
मैं यह नहीं कहता कि सुविधा बुरी है।
समस्या सुविधा में नहीं, सुविधा की आदत में है।
जब मनुष्य हर कठिनाई से बचने लगता है, तब धीरे-धीरे उसका साहस भी क्षीण होने लगता है।
वह छोटे-छोटे दुःखों से घबरा जाता है।
छोटी-सी असफलता उसे निराश कर देती है।
थोड़ी-सी आलोचना उसके आत्मविश्वास को तोड़ देती है।
ऐसा इसलिए नहीं कि जीवन कठिन हो गया है।
बल्कि इसलिए कि मनुष्य संघर्ष का अभ्यास भूल गया है।
हमारी पीढ़ियों के बीच सबसे बड़ा अंतर शायद यही है।
पुरानी पीढ़ी के पास साधन कम थे, पर धैर्य अधिक था।
नई पीढ़ी के पास साधन अधिक हैं, पर सहनशीलता कम होती जा रही है।
इसका कारण केवल तकनीक नहीं है।
कारण यह है कि हमने सुविधा को जीवन का लक्ष्य बना लिया, साधन नहीं।
भारतीय दर्शन में तप का विचार इसी कारण इतना महत्त्वपूर्ण था।
तप का अर्थ स्वयं को कष्ट देना नहीं था।
तप का अर्थ था—अपने भीतर इतनी स्थिरता उत्पन्न करना कि परिस्थितियाँ तुम्हें नियंत्रित न कर सकें।
जिसे थोड़ी-सी गर्मी विचलित कर दे, थोड़ी-सी भूख क्रोधित कर दे, थोड़ी-सी असफलता तोड़ दे—उसकी स्वतंत्रता अभी अधूरी है।
सच्ची स्वतंत्रता सुविधा से नहीं आती।
वह आती है—आत्मबल से।
मुझे कभी-कभी लगता है कि पर्वतारोहण का आनंद शिखर पर पहुँचने में नहीं, चढ़ाई में है।
यदि कोई हमें हेलीकॉप्टर से शिखर पर उतार दे, तो ऊँचाई मिल जाएगी, पर उपलब्धि नहीं।
यात्रा का अर्थ दूरी तय करना नहीं है।
यात्रा का अर्थ है—उस दूरी को तय करते हुए स्वयं का बदल जाना।
संघर्ष हमें यही परिवर्तन देता है।
वह हमें सिखाता है कि गिरना हार नहीं है।
थकना पराजय नहीं है।
धीरे चलना रुक जाना नहीं है।
और यही शिक्षाएँ जीवन की सबसे स्थायी पूँजी बनती हैं।
दुःख का महिमामंडन करना उचित नहीं।
पर संघर्ष का अपमान भी उचित नहीं।
क्योंकि जिसने कभी संघर्ष नहीं किया, वह सफलता का मूल्य भी नहीं जानता।
और जिसने परिश्रम का स्वाद नहीं चखा, वह उपलब्धि का रस भी पूर्णतः नहीं समझ सकता।
शायद इसलिए प्रकृति अपने श्रेष्ठ उपहार तुरंत नहीं देती।
वह मनुष्य की पात्रता बनाती है, फिर प्रसाद देती है।
अंततः प्रश्न सुविधा का नहीं, संतुलन का है।
सुविधा जीवन को सरल बनाए, यह शुभ है।
पर यदि वही सुविधा मनुष्य को दुर्बल बना दे, तो वह वरदान नहीं रहती।
धीरे-धीरे वह हमारी इच्छाशक्ति का स्थान लेने लगती है।
और तब मनुष्य मशीनों से घिरा हुआ होकर भी भीतर से असहाय हो जाता है।
तभी लगता है—
संघर्ष जीवन का शत्रु नहीं, उसका शिल्पकार है।
सुविधा हमें आराम दे सकती है, पर चरित्र नहीं।
चरित्र उन पगडंडियों पर बनता है, जहाँ पाँव थकते हैं, पर मन हारता नहीं।
और शायद मनुष्य की सबसे सुंदर आकृति वही है, जो सुविधा की गोद में नहीं, संघर्ष की धूप में आकार लेती है।
— मुकेश
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