तुम्हारे पास

 तुम्हारे पास

तुम्हारे पास बैठना,

मुझे हमेशा

किसी किताब का

आख़िरी सफ़ा पढ़ने जैसा लगता है।

जहाँ कहानी ख़त्म नहीं होती,

बस...

दिल पढ़ना बंद कर देता है।

तुम कुछ कहती नहीं,

मैं भी

कोई सवाल नहीं करता।

हमारे दरमियान

एक ख़ामोशी बैठी रहती है,

जो

हर लफ़्ज़ से ज़्यादा

ख़ूबसूरत बातें जानती है।

तुम कभी

अपनी ज़ुल्फ़ कान के पीछे करती हो,

कभी

बिना वजह मुस्कुरा देती हो,

और मैं...

उसी एक लम्हे को

अपनी पूरी शाम बना लेता हूँ।

तुम्हें शायद ख़बर भी नहीं,

तुम्हारी मौजूदगी

कैसे-कैसे चमत्कार करती है।

चाय

ज़रा और ख़ुशबूदार हो जाती है,

हवा

थोड़ी और मुलायम,

और वक़्त...

वह तो जैसे

अपनी कलाई से घड़ी उतारकर

हमारे पास रख देता है।

मैंने

मोहब्बत का इज़हार

कभी ऊँची आवाज़ में नहीं किया।

मैंने तो बस

हर मुलाक़ात के बाद

अपनी तन्हाई से कहा—

आज फिर ज़िंदगी,
कुछ देर के लिए
बहुत ख़ूबसूरत थी।

— मुकेश

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