चिंतन -क्या त्याग वस्तुओं का नहीं, 'मैं' का होता है?
चिंतन -क्या त्याग वस्तुओं का नहीं, 'मैं' का होता है?
त्याग शब्द सुनते ही मन में एक संन्यासी की छवि उभरती है—हाथ में कमंडल, शरीर पर गेरुए वस्त्र और संसार से दूर किसी वन की निस्तब्धता। हमें लगता है कि त्याग का अर्थ है घर छोड़ देना, धन छोड़ देना, संबंध छोड़ देना।
परंतु क्या त्याग इतना ही है?
तभी मेरे भीतर एक प्रश्न जन्म लेता है—क्या त्याग वस्तुओं का नहीं, 'मैं' का होता है?
वस्तुएँ छोड़ देना सरल है।
उनका स्मरण छोड़ देना कठिन है।
घर छोड़ देना संभव है।
पर घर का अहंकार छोड़ देना दुर्लभ है।
धन का त्याग किया जा सकता है।
पर "मैं त्यागी हूँ"—इस भाव का त्याग करना कहीं अधिक कठिन है।
यहीं से त्याग का वास्तविक दर्शन आरंभ होता है।
मुझे लगता है कि वस्तुएँ मनुष्य को उतना नहीं बाँधतीं, जितना उनसे जुड़ा हुआ 'मेरा' बाँधता है।
घर समस्या नहीं है।
"मेरा घर"—यह आग्रह समस्या बन जाता है।
ज्ञान बाधा नहीं है।
"मेरा ज्ञान"—यह अहंकार बाधा बन जाता है।
धर्म भी बंधन नहीं है।
"केवल मेरा धर्म ही सत्य है"—यह आग्रह बंधन बन जाता है।
वस्तुएँ बाहर रहती हैं।
बंधन भीतर जन्म लेते हैं।
प्रकृति को देखिए।
वृक्ष अपने फल पकने पर उन्हें रोककर नहीं रखता।
नदी अपने जल को बाँधकर नहीं बैठती।
बादल अपनी वर्षा का हिसाब नहीं रखते।
सूर्य अपने प्रकाश का मूल्य नहीं माँगता।
प्रकृति का समस्त वैभव त्याग से नहीं,
अनासक्ति से प्रकाशित होता है।
वह देती है,
पर देने का अभिमान नहीं करती।
भारतीय दर्शन ने त्याग को कभी अभाव नहीं माना।
उसने उसे स्वतंत्रता कहा।
क्योंकि जो जितना कम बँधा होता है,
वह उतना ही अधिक मुक्त होता है।
उपनिषदों का उद्घोष—"तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा"—केवल वस्तुओं को छोड़ने का संदेश नहीं देता।
वह कहता है—
"त्याग की दृष्टि से भोगो।"
अर्थात् वस्तुएँ तुम्हारे पास रहें,
पर तुम्हारे भीतर न बस जाएँ।
मुझे कभी-कभी लगता है कि मनुष्य संसार से नहीं थकता।
वह अपने 'मैं' के बोझ से थक जाता है।
हर सफलता को अपने नाम से जोड़ना।
हर असफलता को अपनी हार मान लेना।
हर प्रशंसा को अपना अधिकार समझना।
हर आलोचना को अपना अपमान मान लेना।
यही 'मैं' धीरे-धीरे इतना भारी हो जाता है कि जीवन का सहज संगीत दब जाता है।
त्याग का अर्थ इस संगीत को फिर से सुन लेना है।
यह स्वयं को मिटाना नहीं।
स्वयं को विशालतर में देखना है।
जैसे नदी समुद्र में जाकर नष्ट नहीं होती,
वह अपने छोटे नाम को छोड़कर व्यापक हो जाती है।
वैसे ही मनुष्य जब 'मैं' के संकुचित घेरे से बाहर आता है,
तब उसका अस्तित्व छोटा नहीं होता—
वह विस्तृत हो जाता है।
अंततः त्याग का अर्थ गरीबी नहीं है।
वह भीतर की समृद्धि है।
वह यह जान लेना है कि वस्तुएँ उपयोग के लिए हैं,
पहचान के लिए नहीं।
संबंध प्रेम के लिए हैं,
स्वामित्व के लिए नहीं।
ज्ञान प्रकाश के लिए है,
अहंकार के लिए नहीं।
तभी लगता है—
त्याग वस्तुओं का नहीं, 'मैं' का होता है।
और जिस दिन यह 'मैं' थोड़ा-सा हल्का हो जाता है,
उसी दिन संसार वैसा ही रहता है,
पर उसे देखने वाली दृष्टि बदल जाती है।
शायद यही त्याग का सबसे बड़ा चमत्कार है—
वह संसार नहीं बदलता, देखने वाला बदल देता है।
— मुकेश
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