तुम्हारी छोटी-छोटी आदतें
तुम्हारी छोटी-छोटी आदतें
मुझे नहीं पता कि प्रेम कब शुरू होता है। शायद उस दिन नहीं, जब कोई पहली बार अच्छा लगता है; शायद उस दिन भी नहीं, जब दिल उसकी धड़कनों का हिसाब रखने लगता है। प्रेम तो शायद तब जन्म लेता है, जब किसी की छोटी-छोटी आदतें हमारी अपनी ज़िंदगी का हिस्सा बनने लगती हैं।
तुम्हारी भी कुछ ऐसी ही आदतें हैं। बात करते-करते अचानक कहीं खो जाना, फिर जैसे ही मैं तुम्हें पुकारूँ, हल्की-सी मुस्कुराकर मेरी ओर देखना। कभी बेख़याली में अपनी ज़ुल्फ़ों को कान के पीछे सरका लेना, कभी चाय का प्याला दोनों हथेलियों में लेकर देर तक उसकी भाप को निहारते रहना। तुम्हें शायद ये सब बिल्कुल साधारण लगता होगा, लेकिन मुझे इन्हीं क्षणों में तुम्हारा सबसे सच्चा परिचय मिलता है।
अजीब बात है, इंसान किसी के चेहरे का नहीं, उसकी आदतों का आदी हो जाता है। चेहरे समय के साथ बदल जाते हैं, लेकिन आदतें स्मृतियों में उसी तरह जीवित रहती हैं, जैसे किसी पुराने घर में अब भी किसी प्रिय की हँसी गूँजती हो।
मैंने कभी तुम्हें बदलने की इच्छा नहीं की। तुम्हारी छोटी-सी ज़िद, तुम्हारी बेवजह की मुस्कान, बातों के बीच अचानक चुप हो जाने की तुम्हारी आदत—ये सब तुम्हारे व्यक्तित्व के ऐसे रंग हैं, जिनसे तुम्हारी पूरी तस्वीर बनती है। अगर इनमें से एक भी रंग कम हो जाए, तो शायद तुम वही नहीं रहोगी, जिसे मैंने अपने मन में इतने स्नेह से सँजोया है।
शायद प्रेम का अर्थ किसी को अपने अनुरूप बदल देना नहीं, बल्कि उसकी छोटी-छोटी आदतों में अपना सुकून खोज लेना है। फिर वे आदतें धीरे-धीरे हमारी प्रतीक्षा बन जाती हैं, हमारी मुस्कान बन जाती हैं, और एक दिन ऐसा आता है जब उनकी अनुपस्थिति भी उनकी उपस्थिति जितनी गहरी महसूस होने लगती है।
तुम्हें देखकर मुझे हमेशा यही लगता है कि मनुष्य को महान बनाने के लिए असाधारण होना आवश्यक नहीं। कभी-कभी किसी की सबसे साधारण आदतें ही उसे किसी की स्मृतियों में असाधारण बना देती हैं।
और सच कहूँ...
अगर कभी कोई मुझसे पूछे कि तुम्हारी सबसे ख़ूबसूरत बात क्या है, तो मैं तुम्हारी आँखों, तुम्हारी मुस्कान या तुम्हारी ख़ूबसूरती का ज़िक्र नहीं करूँगा। मैं बस इतना कहूँगा—
"मुझे तुम्हारी छोटी-छोटी आदतों से मोहब्बत है; क्योंकि उन्हीं में तुम सबसे ज़्यादा तुम हो।"
— मुकेश
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