चिंतन - क्या मनुष्य धैर्य नहीं, स्वयं को खोता जा रहा है?

 चिंतन - क्या मनुष्य धैर्य नहीं, स्वयं को खोता जा रहा है?

हमारे समय की सबसे बड़ी त्रासदी यह नहीं कि मनुष्य के पास समय कम है। त्रासदी यह है कि उसके भीतर धैर्य कम होता जा रहा है।

पहले लोग समय को जीते थे, अब समय को हराना चाहते हैं। पहले प्रतीक्षा जीवन का स्वाभाविक हिस्सा थी, अब प्रतीक्षा अपमान लगती है। कुछ क्षण मोबाइल का पृष्ठ खुलने में देर हो जाए, तो अधैर्य जन्म ले लेता है। संदेश का उत्तर तुरंत न मिले, तो संबंधों पर संदेह होने लगता है। सफलता कुछ वर्षों में न मिले, तो जीवन व्यर्थ प्रतीत होने लगता है।

तभी मेरे भीतर एक प्रश्न उठता है—क्या मनुष्य धैर्य नहीं, स्वयं को खोता जा रहा है?

धैर्य केवल एक नैतिक गुण नहीं है। वह चेतना की गति है।

प्रकृति का प्रत्येक नियम धैर्य पर आधारित है। बीज वृक्ष बनने की जल्दी नहीं करता। नदी समुद्र तक पहुँचने के लिए अपने किनारों को नहीं तोड़ती। सूर्य प्रतिदिन निश्चित समय पर उगता है; वह कभी यह नहीं सोचता कि आज थोड़ा पहले निकल आऊँ।

केवल मनुष्य ही है, जिसने समय से स्पर्धा आरंभ कर दी है।

और जो समय से प्रतिस्पर्धा करता है, वह अंततः स्वयं से हार जाता है।

हमारे भीतर का अधैर्य केवल व्यवहार में नहीं, विचार में भी दिखाई देता है। अब हम विचारों को परिपक्व होने का अवसर नहीं देते। कोई समाचार सुनते ही निर्णय सुना देते हैं। किसी व्यक्ति को देखे बिना उसके विषय में मत बना लेते हैं। किसी पुस्तक के कुछ पृष्ठ पढ़कर उसे समझ लेने का दावा कर देते हैं।

ज्ञान की जगह सूचना ने ले ली है।

और सूचना की गति, धैर्य की शत्रु है।

ध्यान से देखिए, महान रचनाएँ कभी जल्दी में नहीं लिखी गईं। कोई उपनिषद एक दिन में नहीं बना। कोई महान चित्रकार एक ही रेखा से अमर नहीं हुआ। कोई संगीतकार एक ही रियाज़ से सिद्ध नहीं हुआ।

पर आज का मनुष्य परिणाम चाहता है, प्रक्रिया नहीं।

उसे फल चाहिए, जड़ें नहीं।

उसे ऊँचाई चाहिए, गहराई नहीं।

यही अधैर्य धीरे-धीरे जीवन का स्वभाव बनता जा रहा है।

मुझे लगता है कि अधैर्य का सबसे बड़ा कारण समय की कमी नहीं, विश्वास की कमी है।

हमें विश्वास नहीं रहा कि जीवन अपने समय पर भी सुंदर हो सकता है।

हमें लगता है कि यदि अभी नहीं मिला, तो कभी नहीं मिलेगा।

यदि अभी सफलता नहीं मिली, तो सब समाप्त हो गया।

यदि अभी सम्मान नहीं मिला, तो हमारा अस्तित्व व्यर्थ है।

यह भय ही अधैर्य को जन्म देता है।

भारतीय दर्शन में धैर्य को केवल प्रतीक्षा नहीं माना गया। उसे श्रद्धा का समय कहा जा सकता है। श्रद्धा का अर्थ है—मैं अपना कर्म करूँगा और परिणाम को समय पर छोड़ दूँगा।

यही कर्मयोग का भी मर्म है।

धैर्य का एक गहरा संबंध प्रेम से भी है।

जो प्रेम अधैर्य से भरा हो, वह अधिकार बन जाता है।

जो प्रेम धैर्य से भरा हो, वह विश्वास बन जाता है।

इसी प्रकार शिक्षा में धैर्य न हो, तो ज्ञान रटना बन जाता है।

साधना में धैर्य न हो, तो ध्यान केवल तकनीक रह जाता है।

संबंधों में धैर्य न हो, तो संवाद विवाद बन जाता है।

और जीवन में धैर्य न हो, तो सफलता भी अशांति का कारण बन जाती है।

हमने गति बढ़ाई है, पर दिशा खो दी है।

हमने साधन बढ़ाए हैं, पर साधना छोड़ दी है।

हमने संचार बढ़ाया है, पर संवाद कम कर दिया है।

यह सब धैर्य के क्षय के ही लक्षण हैं।

सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि अब बच्चों को भी प्रतीक्षा करना नहीं सिखाया जा रहा। उन्हें तुरंत मनोरंजन, तुरंत उत्तर, तुरंत सुविधा उपलब्ध है। धीरे-धीरे उनका मन उस वृक्ष की तरह हो जाता है जिसकी जड़ें गहरी होने से पहले ही उसकी शाखाएँ फैलने लगती हैं।

ऐसा वृक्ष पहली आँधी में गिर जाता है।

मनुष्य भी ऐसा ही है।

जिसके भीतर धैर्य नहीं, वह पहली असफलता में टूट जाता है।

पहली आलोचना में बिखर जाता है।

पहले ही दुःख में जीवन से निराश हो जाता है।

धैर्य वास्तव में दुःख सहने की शक्ति नहीं है।

धैर्य जीवन पर विश्वास करने की शक्ति है।

यह विश्वास कि हर अंधकार स्थायी नहीं होता।

हर बीज का अपना मौसम होता है।

हर आँसू का अपना अर्थ होता है।

और हर संघर्ष अपने भीतर एक अदृश्य शिक्षा लेकर आता है।

अंततः मुझे लगता है कि मनुष्य का संकट समय का नहीं, चेतना का है। उसने घड़ी को तो जीत लिया, पर अपने मन को हार गया।

इसलिए धैर्य को पुनः सीखना केवल एक सद्गुण अपनाना नहीं है; यह अपनी मनुष्यता को बचाना है।

क्योंकि जिस दिन धैर्य समाप्त हो जाता है, उसी दिन अनुभव की गहराई भी समाप्त हो जाती है।

और जहाँ अनुभव नहीं बचता, वहाँ केवल घटनाएँ बचती हैं—जीवन नहीं।

शायद इसलिए आज आवश्यकता तेज़ चलने की नहीं, ठहरकर चलने की है।

क्योंकि जो ठहरना जानता है, वही वास्तव में आगे बढ़ना भी जानता है।

— मुकेश

Comments

Popular posts from this blog

एक मुसाफिर की डायरी से --------------

एकांत एक नदी है

बात दोनों तरफ हो तो मज़ा देता है