तुम्हारी हँसी के बाद
तुम्हारी हँसी के बाद
तुम जब हँसती हो,
तो ऐसा नहीं लगता
कि सिर्फ़ तुम्हारे लबों पर
एक मुस्कुराहट खिली है।
यूँ महसूस होता है,
जैसे किसी ख़ामोश फ़िज़ा में
अचानक रूह का कोई परिंदा
तरन्नुम छेड़ दे।
तुम्हारी हँसी
गुलाब की ख़ुशबू जैसी नहीं,
क्योंकि ख़ुशबू
कुछ देर ठहरकर बिखर जाती है।
तुम्हारी हँसी तो
उस दुआ की मानिंद है
जो बरसों बाद भी
अपने असर से महरूम नहीं होती।
मैंने कई बार
तुम्हें चुपचाप मुस्कुराते देखा है।
हर बार
तुम्हारी पलकों के साये में
एक नई कहानी जन्म लेती है,
और तुम्हारी आँखों की चमक
मेरे तमाम अल्फ़ाज़ से
ज़्यादा फ़सीह हो जाती है।
अजीब बात है...
तुम कुछ कहती नहीं,
मगर तुम्हारी मुस्कुराहट
मेरे दिल के हर सवाल का
जवाब लिख देती है।
उस एक लम्हे में
न कोई शिकवा रहता है,
न कोई फ़ासला,
न कोई अधूरापन।
बस ऐसा लगता है,
जैसे पूरी कायनात
अपने तमाम रंग समेटकर
तुम्हारे लबों पर आ ठहरी हो।
अगर मोहब्बत की
कोई सूरत होती,
तो यक़ीनन
वो तुम्हारी यही
बेआवाज़ मुस्कुराहट होती—
जो हर बार
मुझे तुमसे
पहली बार की तरह
मोहब्बत करना सिखा जाती है।
— मुकेश
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