धूप, तुम और ख़ामोशी

 धूप, तुम और ख़ामोशी

मुझे हमेशा हैरत होती है...

धूप

आख़िर तुम्हारे चेहरे तक पहुँचकर

इतनी ख़ामोश क्यों हो जाती है?

वह जो

हर सुबह

पहाड़ों को जगाती है,

नदियों में चमक भरती है,

पेड़ों की शाख़ों पर

सुनहरी सरगोशियाँ लिखती फिरती है,

वही धूप

तुम्हारे सामने आकर

एकदम ठहर जाती है।

शायद...

उसे भी

तुम्हें देखने का अदब मालूम है।

मैंने कई बार

तुम्हें खिड़की के पास खड़े देखा है।

धूप

तुम्हारी ज़ुल्फ़ों में

उँगलियाँ फेरती रहती है,

और तुम

बेख़बर-सी

दूर कहीं देखती रहती हो।

उस वक़्त

तुम किसी लड़की जैसी नहीं लगतीं,

बल्कि

ऐसी नज़्म लगती हो

जिसे ख़ुद रब ने

रौशनी की स्याही से लिखा हो।

तुम्हारी पलकों पर

ठहरी हुई वह सुनहरी चमक,

तुम्हारे रुख़्सारों पर

फिसलती हुई किरणें,

और तुम्हारे लबों पर

बिना वजह चली आई

वह हल्की-सी मुस्कान...

इन तीनों को साथ देखकर

दिल यही कहता है—

हुस्न

शायद इसी मंज़र का दूसरा नाम है।

मैं चाहता भी नहीं

कि वह धूप

तुम्हारे चेहरे से कभी हटे।

क्योंकि

जब तक वह वहाँ रहती है,

मुझे यक़ीन बना रहता है

कि दुनिया में

अब भी कुछ चीज़ें ऐसी हैं

जिन्हें देखकर

मोहब्बत पर

ईमान और गहरा हो जाता है।

— मुकेश

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