चिंतन -क्या मनुष्य का सबसे बड़ा संघर्ष संसार से नहीं, अपने ही बने हुए स्वरूप से होता है?
चिंतन -क्या मनुष्य का सबसे बड़ा संघर्ष संसार से नहीं, अपने ही बने हुए स्वरूप से होता है?
मनुष्य जब जन्म लेता है, तब उसके पास कोई परिचय नहीं होता। न कोई पद, न कोई प्रतिष्ठा, न कोई उपाधि। वह केवल एक संभावना होता है।
धीरे-धीरे संसार उसे नाम देता है।
परिवार उसे पहचान देता है।
समाज उसे भूमिकाएँ देता है।
और एक दिन वह स्वयं भी अपने बारे में एक कहानी बना लेता है।
तभी मेरे भीतर एक प्रश्न जन्म लेता है—क्या मनुष्य का सबसे बड़ा संघर्ष संसार से नहीं, अपने ही बने हुए स्वरूप से होता है?
हम सोचते हैं कि हमारा संघर्ष परिस्थितियों से है।
प्रतिस्पर्धा से है।
समय से है।
भाग्य से है।
पर यदि ध्यान से देखें, तो पाएँगे कि सबसे अधिक थकान हमें उन चेहरों को बचाने में होती है, जिन्हें हमने स्वयं गढ़ा है।
हम एक छवि बना लेते हैं—
"मैं हमेशा सफल दिखूँ।"
"मैं कभी कमज़ोर न दिखाई दूँ।"
"लोग मुझे असाधारण समझें।"
फिर जीवन का बड़ा भाग उस छवि की रक्षा में बीत जाता है।
मुझे लगता है कि मनुष्य का सबसे बड़ा कारागार बाहर नहीं होता।
वह उसके भीतर बना हुआ 'मैं कौन हूँ' का कठोर चित्र होता है।
वह भूल जाता है कि जीवन नदी है।
और स्वयं को पत्थर बना लेता है।
नदी बदलती है,
इसलिए जीवित रहती है।
पत्थर नहीं बदलता,
इसलिए धीरे-धीरे क्षरित होता रहता है।
आज का मनुष्य स्वयं को जानने से अधिक,
स्वयं को सिद्ध करने में लगा है।
वह जीने से अधिक,
दिखने की चिंता करता है।
उसे यह भय सताता रहता है कि यदि उसकी बनाई हुई छवि टूट गई,
तो लोग उसके बारे में क्या सोचेंगे?
पर शायद उसने यह नहीं सोचा कि
यदि वह छवि बच भी गई,
और उसका वास्तविक व्यक्तित्व खो गया,
तो बचा क्या?
भारतीय दर्शन में अहंकार का अर्थ केवल घमंड नहीं है।
अहंकार वह झूठी पहचान भी है,
जिससे हम स्वयं को बाँध लेते हैं।
हम अपने पद को ही स्वयं समझ लेते हैं।
अपने धन को।
अपने ज्ञान को।
अपने संबंधों को।
जबकि ये सब बदलने वाली चीज़ें हैं।
जो बदल सकता है,
वह हमारी अंतिम पहचान कैसे हो सकता है?
मुझे कभी-कभी लगता है कि आत्मज्ञान का आरंभ किसी नए सत्य को प्राप्त करने से नहीं होता।
वह एक-एक करके उन असत्य पहचानों को छोड़ने से होता है,
जिन्हें हमने वर्षों तक अपना समझ लिया था।
जब वे परतें उतरने लगती हैं,
तब भीतर का मनुष्य पहली बार स्वयं से मिलता है।
वह हल्का हो जाता है।
क्योंकि अब उसे किसी भूमिका का अभिनय नहीं करना पड़ता।
वह जैसा है,
वैसा होने का साहस पा लेता है।
अंततः जीवन की सबसे बड़ी विजय दूसरों पर नहीं होती।
वह स्वयं की बनाई हुई सीमाओं पर होती है।
जो अपने ही अहंकार से मुक्त हो गया,
उसे संसार हराने में समर्थ नहीं होता।
क्योंकि अब उसकी शक्ति तुलना से नहीं,
सत्य से आती है।
तभी लगता है—
मनुष्य का सबसे बड़ा संघर्ष संसार से नहीं, अपने ही बने हुए स्वरूप से होता है।
और जिस दिन वह उस कृत्रिम स्वरूप से बाहर निकल आता है,
उसी दिन उसे पहली बार अनुभव होता है
कि स्वतंत्रता बाहर नहीं मिली,
वह तो भीतर प्रतीक्षा कर रही थी।
— मुकेश
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