बस एक मुस्कुराहट
बस एक मुस्कुराहट
आप जब भी मुस्कुरा देती हैं,
लगता है
किसी ने आसमान की तह से
एक मुट्ठी रौशनी उतारकर
ज़मीं पर बिखेर दी हो।
लबों की वह हल्की-सी जुंबिश
कोई साधारण मुस्कान नहीं,
वो तो
दिल की सल्तनत का
बेआवाज़ फ़रमान होती है।
मैं उसे देखता नहीं,
अपने भीतर उतरते हुए महसूस करता हूँ।
उस एक मुस्कुराहट में
महकते गुलाबों का लम्स भी है,
बारिश की पहली बूँद का सुकून भी,
और उस दुआ की तासीर भी,
जो बरसों से
किसी पाक दिल ने माँगी हो।
कभी-कभी
यूँ लगता है,
आपके होंठ मुस्कुराते नहीं,
बल्कि
मोहब्बत ख़ुद
आपकी सूरत इख़्तियार करके
लबों पर आ बैठती है।
मैंने चाहा भी नहीं
कि उस लम्हे को क़ैद कर लूँ,
कुछ हुस्न
यादों में ज़्यादा ख़ूबसूरत रहते हैं।
बस इतना चाहता हूँ—
जब कभी
ज़िंदगी आपको उदास करने लगे,
तो मेरी मोहब्बत
आपकी मुस्कुराहट की वजह बन जाए।
और अगर
मेरी तक़दीर में
आपका साथ न भी लिखा हो,
तो भी
रब से यही दुआ रहेगी—
आपके लबों पर
यह मुस्कुराहट
हमेशा ऐसे ही महकती रहे,
जैसे चाँदनी
झील के पानी पर,
या जैसे
एक नाज़ुक तितली
कँवल की पंखुड़ी पर
अपने पर फैलाकर
दुनिया को हुस्न का मतलब समझा रही हो।
— मुकेश
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