तुम, तुम्हारी हँसी और ये बारिश
तुम, तुम्हारी हँसी और ये बारिश
बारिश जब भी होती है,
मुझे तुम्हारी हँसी याद आती है।
शायद इसलिए
कि दोनों की फ़ितरत एक-सी है
बिना दस्तक दिए आते हैं,
और जाते-जाते
दिल की ज़मीन को
हरियाली दे जाते हैं।
आज भी
खिड़की पर ठहरी हुई
बारिश की बूँदें
तुम्हारा नाम लिख रही हैं,
और मैं
धुँधले शीशे पर
उँगलियों से
तुम्हारी मुस्कुराहट का चेहरा बना रहा हूँ।
तुम हँसती हो,
तो लगता है
बादलों ने अपना सारा बोझ
रौशनी में बदल दिया हो।
हवा भी
भीगते दरख़्तों के दरमियान
तुम्हारी हँसी का तरन्नुम
धीरे-धीरे गुनगुनाने लगती है।
काश...
कभी ऐसा हो
कि एक ही छतरी के नीचे
तुम, मैं
और ये बारिश
तीनों एक साथ हों।
तुम्हारे भीगे हुए बाल
मेरे कंधे से छूकर गुज़रें,
तुम्हारी हँसी
बारिश की बूँदों में घुल जाए,
और वक़्त
अपनी तमाम रफ़्तार भूलकर
उसी लम्हे में ठहर जाए।
फिर
न कोई मंज़िल ज़रूरी हो,
न कोई सफ़र।
बस तुम्हारा हाथ,
तुम्हारी हँसी,
और बारिश की वह ख़ामोश सरगोशी,
जो हर बूँद के साथ
मेरे दिल से यही कहे—
कुछ मोहब्बतें इज़हार से नहीं,
बरसात से मुकम्मल होती हैं।
— मुकेश
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