चिंतन - क्या कर्म, कर्ता और भोक्ता तीन नहीं, एक ही यात्रा के तीन पड़ाव हैं?

 चिंतन - क्या कर्म, कर्ता और भोक्ता तीन नहीं, एक ही यात्रा के तीन पड़ाव हैं?

मनुष्य जब जीवन को देखता है, तो उसे लगता है कि वह कर्म कर रहा है। जब वह स्वयं को देखता है, तो उसे कर्ता होने का अनुभव होता है। और जब कर्म का फल सामने आता है, तब वह स्वयं को भोक्ता मानने लगता है।

यहीं से दर्शन का एक प्राचीन प्रश्न जन्म लेता है—

क्या कर्म, कर्ता और भोक्ता वास्तव में तीन अलग-अलग सत्य हैं, या एक ही चेतना की तीन अवस्थाएँ?

कर्म वह नहीं जो केवल हाथ करते हैं।

विचार भी कर्म हैं।

वाणी भी कर्म है।

मौन भी कर्म है।

यहाँ तक कि किसी अवसर पर कुछ न करना भी एक प्रकार का कर्म है।

मनुष्य एक क्षण भी कर्म से बाहर नहीं रह सकता।

जैसे अग्नि का स्वभाव जलाना है,

वैसे ही जीवन का स्वभाव कर्म करना है।

पर कर्म अपने आप नहीं होता।

उसके पीछे एक भाव होता है।

वही भाव कर्ता को जन्म देता है।

जब मनुष्य कहता है—

"मैंने किया।"

तभी कर्ता प्रकट होता है।

और जब वह कहता है—

"मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ?"

तभी भोक्ता जन्म लेता है।

मुझे लगता है कि कर्म संसार में घटित होता है,

पर कर्ता और भोक्ता मनुष्य की चेतना में जन्म लेते हैं।

यही कारण है कि एक ही कर्म दो व्यक्तियों के लिए दो भिन्न अनुभव बन जाता है।

एक व्यक्ति सेवा करता है और आनंद अनुभव करता है।

दूसरा वही सेवा करता है और अहंकार अनुभव करता है।

कर्म एक है।

कर्ता अलग है।

और इसलिए फल का अनुभव भी अलग है।

भारतीय दर्शन का अद्भुत सौंदर्य यही है कि उसने कर्म को केवल बाहरी क्रिया नहीं माना।

उसने पूछा—

कर्म करते समय भीतर कौन उपस्थित था?

यदि वहाँ अहंकार था,

तो वही कर्ता बनेगा।

यदि वहाँ अपेक्षा थी,

तो वही भोक्ता बनेगा।

यदि वहाँ समर्पण था,

तो कर्म साधना बन जाएगा।

शायद इसी कारण भगवद्गीता में कर्म का त्याग नहीं, कर्तृत्व के अहंकार का त्याग सिखाया गया है।

क्योंकि कर्म छोड़ना संभव नहीं।

पर 'मैं ही सब कुछ कर रहा हूँ'—इस आग्रह को छोड़ना संभव है।

नदी बहती है।

पर कभी नहीं कहती—

"मैंने खेतों को जीवन दिया।"

वृक्ष फल देता है।

पर कभी नहीं कहता—

"यह फल मेरा उपकार है।"

सूर्य प्रकाश देता है।

पर वह प्रतिदान नहीं माँगता।

प्रकृति कर्म करती है,

पर कर्ता होने का अभिमान नहीं करती।

यही उसकी सहजता है।

मुझे कभी-कभी लगता है कि मनुष्य का दुःख कर्म से नहीं जन्मता।

वह कर्ता और भोक्ता की गाँठ से जन्मता है।

जब तक मैं स्वयं को हर कर्म का अकेला कर्ता मानूँगा,

हर परिणाम का अकेला भोक्ता भी बनूँगा।

सफलता आएगी तो अहंकार बढ़ेगा।

असफलता आएगी तो निराशा।

दोनों ही मन को बाँध देंगे।

पर जिस दिन यह समझ आ जाए कि मैं केवल एक माध्यम हूँ,

उस दिन कर्म रहेगा,

पर बोझ नहीं रहेगा।

फल आएगा,

पर उसका विष या मद भीतर नहीं उतरेगा।

अंततः जीवन का उद्देश्य कर्म से भागना नहीं है।

कर्ता के अहंकार को पहचानना है।

और भोक्ता की आसक्ति को समझना है।

क्योंकि जहाँ कर्ता हल्का हो जाता है,

वहाँ कर्म पूजा बन जाता है।

और जहाँ भोक्ता शांत हो जाता है,

वहाँ फल प्रसाद बन जाता है।

तभी लगता है—

कर्म, कर्ता और भोक्ता तीन अलग-अलग सत्य नहीं हैं।

वे चेतना की एक ही यात्रा के तीन पड़ाव हैं।

पहले मनुष्य कर्म करता है।

फिर स्वयं को कर्ता मानता है।

और अंततः यदि उसका विवेक जाग जाए,

तो वह समझता है—

कर्म मेरा था, पर मैं कर्म नहीं था।

कर्ता का भाव मेरा था, पर वह भी शाश्वत नहीं था।

और जो फल मैंने भोगा, वह भी एक दिन समय में विलीन हो गया।

शेष यदि कुछ बचा,

तो केवल साक्षी।

और शायद वही मनुष्य की अंतिम पहचान है।

— मुकेश

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