कालसूक्त — द्वितीय मन्त्र : काल — ब्रह्माण्डीय चक्रों का अक्ष

 कालसूक्त — द्वितीय मन्त्र : काल — ब्रह्माण्डीय चक्रों का अक्ष

मन्त्र

सप्त चक्रान् वहति काल एष सप्तास्य नाभीरमृतं न्वक्षः।

स इमा विश्वा भुवनान्यञ्जत् कालः स ईयते प्रथमो नु देवः॥२॥


हिन्दी अर्थ

यह काल सात चक्रों को धारण करता हुआ गतिमान है। इसके सात नाभि-केन्द्र हैं और इसका अक्ष अमृत अर्थात् अविनाशी है।

यही काल इन सम्पूर्ण भुवनों को प्रकट करता हुआ आगे बढ़ता है। काल ही आदि देव के रूप में सबसे पहले गतिमान है।


वैज्ञानिक व्याख्या

प्रथम मन्त्र में ऋषि ने काल को अश्व के रूप में देखा था।

द्वितीय मन्त्र में वही काल अब चक्र और अक्ष के रूप में प्रकट होता है।

यह परिवर्तन अत्यन्त महत्वपूर्ण है।

अश्व गति का प्रतीक था।

चक्र नियमित और पुनरावर्ती गति का प्रतीक है।

आधुनिक विज्ञान की दृष्टि से ब्रह्माण्ड में गति केवल सीधी रेखा में नहीं होती। ग्रह अपनी कक्षाओं में घूमते हैं। पृथ्वी अपने अक्ष पर घूमती है। वह सूर्य की परिक्रमा करती है। ऋतुएँ चक्र में लौटती हैं।

प्रकृति में परिवर्तन का एक बड़ा भाग चक्रीय संरचना में दिखाई देता है।

इसीलिए मन्त्र का पहला कथन है—

“सप्त चक्रान् वहति काल एष।”

यह काल सात चक्रों को वहन करता है।

यहाँ ‘सात’ को केवल आधुनिक वैज्ञानिक संख्या से जोड़ देना उचित नहीं होगा। मन्त्र स्वयं काल को चक्रात्मक व्यवस्था से जोड़ता है। वैदिक परम्परा में ‘सप्त’ एक पूर्ण क्रम का संकेत भी है।

आधुनिक विज्ञान में भी प्रकृति को समझने के लिए अनेक प्रकार के चक्रों का अध्ययन किया जाता है।

दिन और रात का चक्र।

ऋतु-चक्र।

जल-चक्र।

कार्बन-चक्र।

जैविक जीवन-चक्र।

तारकीय जीवन-चक्र।

इस दृष्टि से यह मन्त्र हमें एक अत्यन्त गहरी वैज्ञानिक सम्भावना की ओर संकेत करता है—

काल केवल आगे बढ़ने वाला क्रम नहीं है; वह अनेक स्तरों पर चक्रीय प्रक्रियाओं को भी संचालित करता है।

मन्त्र कहता है—

“सप्तास्य नाभीः।”

इसके सात नाभि-केन्द्र हैं।

चक्र की नाभि वह स्थान है, जिसके चारों ओर गति व्यवस्थित होती है।

यदि चक्र की नाभि न हो, तो गति में केन्द्र नहीं रहेगा।

आधुनिक भौतिकी में भी प्रत्येक गतिशील व्यवस्था को समझने के लिए उसके केन्द्र, धुरी और संदर्भ-बिन्दु का अध्ययन किया जाता है।

ग्रहों की गति में गुरुत्वीय केन्द्र महत्वपूर्ण होता है।

घूर्णन में अक्ष महत्वपूर्ण होता है।

कक्षीय गति में केन्द्र और दूरी का सम्बन्ध महत्वपूर्ण होता है।

इसलिए ‘नाभि’ को हम वैज्ञानिक भाषा में व्यवस्था के केन्द्र या संगठन-बिन्दु के रूप में समझ सकते हैं।

ऋषि कह रहे हैं कि काल की गति अव्यवस्थित नहीं है।

उसके भीतर क्रम है, केन्द्र है और संरचना है

इसके बाद आता है—

“अमृतं न्वक्षः।”

इसका अक्ष अमृत है।

चक्र घूमता है।

लेकिन उसका अक्ष स्थिर रहता है।

यही इस मन्त्र का सबसे गहरा वैज्ञानिक प्रतीक है।

ब्रह्माण्ड में परिवर्तन निरन्तर है। वस्तुएँ बदलती हैं। ऊर्जा के रूप बदलते हैं। जीव जन्म लेते हैं और मरते हैं। तारे बनते हैं और नष्ट होते हैं।

फिर भी प्रत्येक परिवर्तन किसी न किसी नियम, संरचना या स्थायित्व के भीतर घटित होता है।

विज्ञान इसे प्रकृति के नियमों के रूप में देखता है।

गुरुत्वाकर्षण बदलते हुए ग्रहों की गति को व्यवस्थित करता है।

ऊष्मागतिकी के नियम ऊर्जा के परिवर्तन को सीमित करते हैं।

भौतिक नियमों की स्थिरता ही हमें ब्रह्माण्ड का अध्ययन सम्भव बनाती है।

इस दृष्टि से ‘अमृत अक्ष’ को निरन्तर परिवर्तन के पीछे स्थित स्थायी नियम-व्यवस्था का वैदिक प्रतीक माना जा सकता है।

यहाँ एक महत्वपूर्ण दार्शनिक प्रश्न उठता है—

यदि सब कुछ बदल रहा है, तो परिवर्तन की पहचान किस आधार पर होती है?

परिवर्तन को पहचानने के लिए किसी क्रम की आवश्यकता है।

और क्रम के लिए किसी नियम की।

ऋषि ने उस स्थायी आधार को अमृत अक्ष कहा है।

अगली पंक्ति कहती है—

“स इमा विश्वा भुवनान्यञ्जत्।”

यही काल सम्पूर्ण भुवनों को प्रकट करता है।

आधुनिक ब्रह्माण्ड-विज्ञान की दृष्टि से ब्रह्माण्ड कोई स्थिर चित्र नहीं है। ब्रह्माण्ड का वर्तमान स्वरूप एक दीर्घ विकास-क्रम का परिणाम है।

समय के साथ पदार्थ की अवस्थाएँ बदलीं।

तारों का निर्माण हुआ।

तत्व बने।

ग्रह बने।

जीवन की सम्भावनाएँ विकसित हुईं।

अर्थात् आज जो ब्रह्माण्ड हमें दिखाई देता है, वह काल के भीतर घटित दीर्घ प्रक्रियाओं का परिणाम है

इस अर्थ में काल को सृष्टि का ‘प्रकटकर्ता’ कहना एक गहरे दार्शनिक अर्थ में समझा जा सकता है।

काल स्वयं पदार्थ का निर्माण करता है—ऐसा विज्ञान नहीं कहता।

लेकिन काल के बिना सृजन की कोई विकास-प्रक्रिया घटित नहीं हो सकती

समय के बिना कोई ‘पहले’ और ‘बाद में’ नहीं होगा।

और ‘पहले’ तथा ‘बाद में’ के बिना विकास की कोई वैज्ञानिक कथा सम्भव नहीं है।

अन्तिम पद है—

“कालः स ईयते प्रथमो नु देवः।”

काल सबसे पहले गतिमान है।

यहाँ ‘प्रथम’ का अर्थ केवल समय की गणना में पहला नहीं है।

यह एक गहरा दार्शनिक संकेत है।

किसी भी घटना के लिए पहले उसका घटित होना आवश्यक है।

किसी भी विकास के लिए क्रम आवश्यक है।

किसी भी परिवर्तन के लिए समय आवश्यक है।

इस अर्थ में काल सभी प्रक्रियाओं का मौलिक आधार बन जाता है।

आधुनिक भौतिकी में समय को ब्रह्माण्ड की संरचना से अलग करके समझना सरल नहीं है। सापेक्षता के सिद्धान्त ने स्थान और समय को एक संयुक्त संरचना—space-time—के रूप में समझने का मार्ग दिया।

ऋषि ने गणितीय समीकरण नहीं लिखे।

उन्होंने एक चक्र देखा।

उसकी नाभि देखी।

उसका अक्ष देखा।

और कहा—

काल ही प्रथम गति है।

इस मन्त्र की वैज्ञानिक दृष्टि से सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ काल को केवल घटनाओं का मापक नहीं माना गया।

काल यहाँ—

चक्रों को गति देने वाला है।

व्यवस्थाओं को क्रम देने वाला है।

परिवर्तन को सम्भव बनाने वाला है।

और ब्रह्माण्डीय विकास की पृष्ठभूमि है।

पहले मन्त्र का काल अश्व था।

दूसरे मन्त्र का काल चक्र है।

अर्थात् ऋषि की दृष्टि में काल केवल आगे बढ़ता हुआ प्रवाह नहीं है।

वह गति और चक्र—दोनों का आधार है

वह परिवर्तन को चलाता है।

और परिवर्तन को एक व्यवस्था में बाँधता भी है।

यही कारण है कि कालसूक्त का यह मन्त्र आधुनिक वैज्ञानिक चिन्तन के सामने एक अत्यन्त मौलिक प्रश्न रखता है—

क्या समय केवल घटनाओं के बीच की दूरी है, या स्वयं ब्रह्माण्डीय व्यवस्था की आधारभूत संरचना?

मुकेश श्रीवास्तव
(आत्मसन्तुलन आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र)
(इस ब्लॉग के सभी लेख ब्लॉग धारक के मौलिक विचार एवं शोध-आधारित लेखन हैं।)


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