लबों की तितली

 लबों की तितली

आपके लबों पर ठहरी हुई
ये नर्म-सी मुस्कुराहट...

यूँ लगती है,

जैसे कोई रंगीन तितली

कँवल की पंखुड़ी पर

अपने नाज़ुक पर समेटे

उड़ान से पहले

एक आख़िरी लम्हा ठहर गई हो।

उस हँसी में

न जाने कितनी रौशनियाँ आबाद हैं,

कितनी दुआएँ,

कितनी मासूम शरारतें,

और कितनी अनकही मोहब्बतें,

जो अल्फ़ाज़ का सहारा लिए बग़ैर

सीधे दिल तक उतर जाती हैं।

मैं जब भी

आपके लबों की जानिब देखता हूँ,

वक़्त अपनी रफ़्तार भूल जाता है।

धड़कनों पर

एक मीठी-सी ख़ामोशी उतर आती है,

और रूह

आपकी मुस्कुराहट का दामन थामकर

दूर तलक भटकने लगती है।

काश...

उस मुस्कुराहट का

एक छोटा-सा सबब

मैं भी होता।

काश...

उसके पीछे छिपी

हर ख़ुशी का

एक नाम मेरा भी होता।

फिर शायद

हर सुबह का आफ़्ताब

कुछ और रौशन होता,

हर शाम की चाँदनी

कुछ और नरम होती,

और मेरी हर दुआ

आपके लबों पर ठहरी

उसी मुस्कुराहट की हिफ़ाज़त माँगती।

क्योंकि सच तो यह है—

दुनिया में

हसीन चेहरे बहुत होंगे,

मगर दिल को अपना घर

हर मुस्कुराहट नहीं देती।

कुछ मुस्कुराहटें

सिर्फ़ देखी नहीं जातीं,

उन्हें उम्र भर

महसूस किया जाता है।

— मुकेश

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