चिंतन - क्या मनुष्य अपने विचारों से अधिक, अपने प्रश्नों से पहचाना जाता है?
चिंतन - क्या मनुष्य अपने विचारों से अधिक, अपने प्रश्नों से पहचाना जाता है?
जब हम किसी मनुष्य से मिलते हैं, तो सबसे पहले उसके विचार सुनते हैं। वह क्या मानता है, किसका समर्थन करता है, किसका विरोध करता है—इन सबके आधार पर हम उसके व्यक्तित्व का अनुमान लगाने लगते हैं।
पर क्या मनुष्य की पहचान केवल उसके विचारों से होती है?
तभी मेरे भीतर एक प्रश्न जन्म लेता है—क्या मनुष्य अपने विचारों से अधिक, अपने प्रश्नों से पहचाना जाता है?
विचार समय के साथ बदलते रहते हैं।
जो बात हमें बीस वर्ष की आयु में सत्य लगती थी,
वह चालीस वर्ष की आयु में अधूरी प्रतीत हो सकती है।
अनुभव, अध्ययन और जीवन,
तीनों मिलकर विचारों को बदलते रहते हैं।
पर प्रश्न...
वे मनुष्य के भीतर बहुत गहराई से जन्म लेते हैं।
वे उसकी जिज्ञासा का परिचय देते हैं।
उसकी बेचैनी का।
उसकी ईमानदारी का।
जिस मनुष्य के प्रश्न छोटे हैं,
उसका संसार भी प्रायः छोटा रह जाता है।
और जिसके प्रश्न बड़े हैं,
उसका जीवन उत्तर मिलने से पहले ही विस्तृत होने लगता है।
मुझे लगता है कि सभ्यता का विकास उत्तरों से कम,
प्रश्नों से अधिक हुआ है।
यदि किसी ने यह न पूछा होता,
"आकाश नीला क्यों है?"
"दुःख क्यों है?"
"मैं कौन हूँ?"
"न्याय क्या है?"
तो न विज्ञान आगे बढ़ता,
न दर्शन,
न अध्यात्म।
हर नया ज्ञान,
किसी पुराने प्रश्न की संतान है।
भारतीय परंपरा में प्रश्न पूछना असभ्यता नहीं माना गया।
नचिकेता ने यम से प्रश्न किया।
गार्गी ने याज्ञवल्क्य से प्रश्न किया।
अर्जुन ने कृष्ण से प्रश्न किया।
और उपनिषदों का अधिकांश साहित्य प्रश्नों की अग्नि से ही प्रकाशित हुआ।
क्योंकि जहाँ प्रश्न जीवित रहते हैं,
वहाँ विचार जड़ नहीं होते।
आज का संकट यह नहीं कि मनुष्य के पास उत्तर कम हैं।
संकट यह है कि उसने प्रश्न पूछना कम कर दिया है।
वह जानकारी जुटाता है,
पर जिज्ञासा नहीं।
वह तथ्य याद रखता है,
पर आश्चर्य खो देता है।
ज्ञान का सबसे बड़ा शत्रु अज्ञान नहीं है,
यह भ्रम है कि अब सब कुछ जान लिया गया है।
मुझे कभी-कभी लगता है कि मनुष्य का वास्तविक विकास तब शुरू होता है,
जब वह अपने ही विश्वासों से प्रश्न करना सीख लेता है।
क्योंकि जो केवल दूसरों पर प्रश्न करता है,
वह आलोचक बन सकता है।
पर जो स्वयं पर भी प्रश्न कर सके,
वही साधक बनता है।
स्वयं से पूछा गया एक ईमानदार प्रश्न,
दूसरों को दिए गए सौ उपदेशों से अधिक मूल्यवान होता है।
अंततः उत्तर हमें संतोष देते हैं,
पर प्रश्न हमें जीवित रखते हैं।
उत्तर यात्रा का एक पड़ाव हैं।
प्रश्न यात्रा की ऊर्जा हैं।
जिस दिन प्रश्न समाप्त हो जाएँ,
उसी दिन भीतर का विकास भी ठहरने लगता है।
तभी लगता है—
मनुष्य अपने विचारों से अधिक, अपने प्रश्नों से पहचाना जाता है।
क्योंकि विचार बताते हैं कि उसने क्या सीखा है।
पर प्रश्न बताते हैं कि वह अभी कितना सीखना चाहता है।
और शायद वही जिज्ञासा,
मनुष्य को मनुष्य बनाती है।
— मुकेश
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