ईशावास्योपनिषद् के पंचम मन्त्र की मीमांसात्मक व्याख्या
ईशावास्योपनिषद् के पंचम मन्त्र की मीमांसात्मक व्याख्या
ब्रह्म की परात्परता और सर्वान्तर्यामी सत्ता का दार्शनिक विवेचन
ईशावास्योपनिषद् का पंचम मन्त्र उपनिषद् के सर्वाधिक गूढ़ मन्त्रों में से एक है। यदि चतुर्थ मन्त्र में ब्रह्म की अचलता, सर्वव्यापकता और इन्द्रियातीत स्वरूप का निरूपण किया गया था, तो पंचम मन्त्र उसी सत्य को एक नए आयाम से उद्घाटित करता है। यहाँ उपनिषद् ब्रह्म को केवल जगत् का आधार नहीं बताता, बल्कि यह स्पष्ट करता है कि वही परम सत्ता दूर भी है और निकट भी, बाहर भी है और भीतर भी। पहली दृष्टि में यह कथन विरोधाभासी प्रतीत होता है, किन्तु मीमांसात्मक दृष्टि से यही विरोधाभास ब्रह्म के स्वरूप की ओर संकेत करने वाला दार्शनिक उपकरण बन जाता है। यह मन्त्र मनुष्य को तर्क की सीमाओं से आगे बढ़ाकर उस अनुभूति की ओर ले जाता है जहाँ विरोध एकत्व में विलीन हो जाते हैं।
मन्त्र है—
सामान्य अर्थ में इस मन्त्र का भाव यह बताया जाता है कि ब्रह्म चलता भी है और नहीं भी चलता; वह दूर भी है और निकट भी; वह सबके भीतर भी है और सबके बाहर भी। किन्तु मीमांसात्मक दृष्टि से प्रश्न यह है कि क्या श्रुति स्वयं अपने कथन का विरोध कर रही है? यदि नहीं, तो इन परस्पर विपरीत प्रतीत होने वाले वचनों का वास्तविक तात्पर्य क्या है? वैदिक वाक्य का अर्थ केवल शब्दों के बाह्य अर्थ से नहीं, बल्कि उसके प्रयोजन, प्रसंग और सम्पूर्ण प्रकरण से निर्धारित होता है। इसलिए इस मन्त्र का अध्ययन भी उसी पद्धति से किया जाना चाहिए।
महर्षि जैमिनि के अनुसार जहाँ किसी वैदिक वाक्य में प्रत्यक्ष विरोध दिखाई दे, वहाँ यह मान लेना उचित नहीं कि श्रुति असंगत है; अपितु यह देखना चाहिए कि भिन्न-भिन्न पद किस अपेक्षा से कहे गए हैं। चतुर्थ और पंचम मन्त्र एक ही प्रकरण के दो पक्ष हैं। चतुर्थ मन्त्र ने ब्रह्म की निर्विकार सत्ता का प्रतिपादन किया, जबकि पंचम मन्त्र उसी ब्रह्म के जगत् के साथ सम्बन्ध का विवेचन करता है। इस प्रकार यह मन्त्र किसी नए विषय का आरम्भ नहीं करता, बल्कि पूर्ववर्ती प्रतिपादन का विस्तार है। यही प्रकरण-संगति इस मन्त्र के तात्पर्य का प्रथम संकेत देती है।
मन्त्र का प्रारम्भ होता है—"तदेजति तन्नैजति"। "एजति" का अर्थ है—चलता है, गतिशील है; "न एजति" का अर्थ है—नहीं चलता। यदि इन दोनों पदों को एक ही अपेक्षा से ग्रहण किया जाए, तो स्पष्ट विरोध उत्पन्न होगा। किन्तु मीमांसा सिखाती है कि अर्थ का निर्धारण प्रसंगानुसार किया जाता है। स्वरूप की दृष्टि से ब्रह्म निर्विकार है, अतः उसमें गति का प्रश्न नहीं उठता। किन्तु उपाधियों की दृष्टि से वही चेतना सम्पूर्ण जगत् की प्रत्येक गति में अभिव्यक्त होती है। जिस प्रकार विद्युत् स्वयं स्थिर सिद्धान्त है, किन्तु उसी से असंख्य यन्त्र गतिशील होते हैं, उसी प्रकार ब्रह्म स्वयं अचल होते हुए भी समस्त गति का आधार है। अतः यहाँ विरोध नहीं, बल्कि दो भिन्न दृष्टियों का समन्वय है।
शबरस्वामी की प्रयोजन-मीमांसा के अनुसार वैदिक वाक्य का उद्देश्य साधक को किसी ऐसे सत्य तक पहुँचाना है जो सामान्य बुद्धि से ग्रहण नहीं किया जा सकता। यदि उपनिषद् केवल इतना कहता कि ब्रह्म अचल है, तो साधक उसे जड़ सत्ता समझ सकता था। यदि केवल यह कहता कि वह गतिशील है, तो उसे परिवर्तनशील वस्तु मान सकता था। इसलिए श्रुति दोनों कथनों को एक साथ रखकर यह स्पष्ट करती है कि ब्रह्म न तो जड़ है और न ही किसी सीमित वस्तु की भाँति गतिशील; वह उन दोनों का आधार है। यही इस विरोधाभास का प्रयोजन है।
मन्त्र का दूसरा भाग—"तद्दूरे तद्वन्तिके"—भी इसी प्रकार का गहन दार्शनिक प्रतिपादन है। जो व्यक्ति आत्मज्ञान से दूर है, उसके लिए ब्रह्म अत्यन्त दूर प्रतीत होता है। वह उसे किसी स्वर्ग, किसी भविष्य या किसी विशेष आध्यात्मिक उपलब्धि में खोजता है। किन्तु जिसने आत्मस्वरूप का विवेक प्राप्त कर लिया, उसके लिए ब्रह्म से अधिक निकट कुछ भी नहीं, क्योंकि वही उसके अस्तित्व का आधार है। अतः दूरी और निकटता स्थान की नहीं, ज्ञान की अवस्थाएँ हैं। मीमांसात्मक दृष्टि से यही गौण और मुख्य अर्थ का विवेक है।
कुमारिल भट्ट की वाक्यैकवाक्यता की पद्धति इस मन्त्र में विशेष रूप से उपयोगी सिद्ध होती है। यदि "दूर" और "निकट" को अलग-अलग देखा जाए, तो विरोध बना रहता है; किन्तु सम्पूर्ण वाक्य को एक साथ पढ़ने पर स्पष्ट होता है कि उपनिषद् साधक की भिन्न-भिन्न आध्यात्मिक अवस्थाओं का वर्णन कर रहा है। अज्ञानी के लिए ब्रह्म दूर है, ज्ञानी के लिए वही आत्मस्वरूप है। इस प्रकार विरोध केवल शब्दों में है, तात्पर्य में नहीं।
मन्त्र का अन्तिम भाग—"तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः"—ब्रह्म की सर्वान्तर्यामी और सर्वव्यापक सत्ता का अद्भुत प्रतिपादन है। सामान्यतः हम "भीतर" और "बाहर" को दो भिन्न स्थान मानते हैं। किन्तु जो सत्ता अनन्त है, उसके लिए भीतर और बाहर का भेद कैसे सम्भव हो सकता है? यह भेद केवल सीमित वस्तुओं पर लागू होता है। जो सर्वत्र है, वह सबके भीतर भी होगा और सबके बाहर भी। इसलिए यहाँ "भीतर" का अर्थ अन्तर्यामी और "बाहर" का अर्थ सर्वव्यापक है। ब्रह्म किसी विशेष स्थान में सीमित नहीं, बल्कि समस्त अस्तित्व का आधार है।
प्रभाकराचार्य के मत में ज्ञान का उद्देश्य व्यवहार की दृष्टि को परिवर्तित करना है। जब साधक यह समझ लेता है कि वही चेतना सबके भीतर समान रूप से विद्यमान है, तब उसका व्यवहार भी बदल जाता है। अहंकार, स्वार्थ, द्वेष और भेदभाव का आधार धीरे-धीरे समाप्त होने लगता है। इस प्रकार पंचम मन्त्र केवल ब्रह्म का दार्शनिक परिचय नहीं देता; वह आगे आने वाले षष्ठ मन्त्र की समदृष्टि की भूमिका भी तैयार करता है। इसलिए यह मन्त्र उपनिषद् की विचार-श्रृंखला में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है।
मीमांसा के तात्पर्य-निर्णय के सिद्धान्तों से भी यही निष्कर्ष प्राप्त होता है। उपक्रम में ईश्वरव्याप्ति की स्थापना है; अभ्यास के रूप में चतुर्थ और पंचम मन्त्रों में उसी सत्य का पुनः-पुनः प्रतिपादन है; अपूर्वता यह है कि ऐसा ज्ञान न प्रत्यक्ष से प्राप्त होता है और न अनुमान से; फल यह है कि साधक का दृष्टिकोण बदल जाता है; और उपपत्ति यह है कि यदि ब्रह्म अनन्त है, तो उसमें भीतर-बाहर, दूर-निकट और गति-अगति जैसे विरोध एक ही सत्य के भिन्न-भिन्न आयाम बन जाते हैं। इस प्रकार मीमांसा के सभी तात्पर्य-लक्षण इस मन्त्र में पूर्णतः परिलक्षित होते हैं।
आदि शंकराचार्य ने इस मन्त्र की व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया है कि ब्रह्म की गति और अगति, दूरता और निकटता, अन्तर्यामित्व और सर्वव्यापकता—ये सभी उपाधियों की दृष्टि से कही गई हैं। स्वरूपतः ब्रह्म निरवयव, निर्विकार और अद्वैत है। उपाधियों के कारण ही विविधता और विरोध का अनुभव होता है। यह व्याख्या मीमांसात्मक सिद्धान्तों के अनुकूल है, क्योंकि शब्दों का तात्पर्य उनके प्रसंग और अपेक्षा के अनुसार ग्रहण किया जाता है।
स्वामी परमार्थानन्द जी इस मन्त्र को आधुनिक उदाहरणों से स्पष्ट करते हैं। वे बताते हैं कि जैसे आकाश प्रत्येक पात्र के भीतर भी है और बाहर भी, किन्तु किसी पात्र में सीमित नहीं हो जाता, उसी प्रकार चैतन्य प्रत्येक जीव में विद्यमान होते हुए भी किसी एक शरीर में सीमित नहीं है। यह उदाहरण साधक को ब्रह्म की सर्वव्यापकता का सहज बोध कराता है, यद्यपि ब्रह्म आकाश से भी सूक्ष्म और उससे भी अधिक व्यापक है।
समकालीन दृष्टि से यह मन्त्र मानव जीवन के लिए गहरा सन्देश देता है। आधुनिक सभ्यता बाह्य दूरी को तकनीक से कम कर रही है, किन्तु मनुष्य अपने ही भीतर से दूर होता जा रहा है। उपनिषद् स्मरण कराता है कि जिस सत्य की खोज मनुष्य बाहर कर रहा है, वह उसके अपने अस्तित्व का आधार है। इसलिए वास्तविक यात्रा बाहर की नहीं, भीतर की है। और जब भीतर का सत्य ज्ञात हो जाता है, तब बाहर का समस्त जगत् भी उसी सत्य की अभिव्यक्ति के रूप में दिखाई देने लगता है।
अतः मीमांसात्मक दृष्टि से ईशावास्योपनिषद् का पंचम मन्त्र किसी काव्यात्मक विरोधाभास का उदाहरण नहीं, बल्कि ब्रह्म की अनन्त सत्ता का सूक्ष्म दार्शनिक प्रतिपादन है। जैमिनि की तात्पर्य-पद्धति, शबरस्वामी की प्रयोजन-मीमांसा, कुमारिल भट्ट की वाक्यैकवाक्यता, प्रभाकर की ज्ञान-दृष्टि तथा शंकराचार्य के अद्वैत विवेचन के आलोक में यह स्पष्ट होता है कि ब्रह्म सभी विरोधों से परे होकर भी उन सबका आधार है। वही अचल होकर गति का मूल है, दूर होकर निकट है, भीतर होकर बाहर है और सीमाओं से परे होकर भी प्रत्येक सीमा में विद्यमान है। यही इस मन्त्र का मीमांसात्मक सार है और यही उपनिषद् का शाश्वत दार्शनिक संदेश है।
— मुकेश
Comments
Post a Comment