तुम... और तुम्हारी शरारतें
तुम... और तुम्हारी शरारतें
तुम्हारी सबसे ख़ूबसूरत बात तुम्हारी मुस्कुराहट नहीं है।
तुम्हारी सबसे ख़ूबसूरत बात है—तुम्हारी शरारतें।
वो शरारतें जिनका कोई शोर नहीं होता, कोई ऐलान नहीं होता। बस आँखों के किसी कोने में चुपके से जन्म लेती हैं और बिना इजाज़त दिल में उतर जाती हैं।
कभी तुम बात करते-करते अचानक रुक जाती हो, जैसे कोई राज़ अपने ही होंठों के पीछे छिपा लिया हो। कभी मेरी ओर देखकर यूँ मुस्कुरा देती हो, मानो तुम्हें पहले से मालूम हो कि मैं अगले ही पल अपनी नज़रें झुका लूँगा। और फिर तुम धीरे से हँस देती हो—उस हँसी में जीत का कोई अहंकार नहीं होता, बस अपनापन होता है।
तुम्हारी शरारतें अजीब हैं। वे किसी बच्चे की तरह मासूम भी हैं और किसी ग़ज़ल के मतले की तरह दिलकश भी। वे कभी किसी तितली की तरह मेरे आसपास मंडराती हैं, तो कभी किसी ख़ुशबू की तरह मेरे भीतर उतर जाती हैं। उन्हें पकड़ना मुमकिन नहीं, बस महसूस किया जा सकता है।
कई बार सोचता हूँ, अगर तुम इतनी शरारती न होतीं, तो शायद मेरी ज़िंदगी इतनी ख़ामोश होती कि उसमें हँसी की आवाज़ गुम हो जाती। तुम्हारी वही छोटी-छोटी अदाएँ, बेवजह की छेड़छाड़, और आँखों से कही गई बातें ही तो हैं जिन्होंने मेरी साधारण-सी दोपहरों को यादगार शामों में बदल दिया।
अजीब बात है...
तुम्हारी हर शरारत के बाद मैं तुम्हें डाँटना चाहता हूँ, लेकिन हर बार मुस्कुरा देता हूँ। शायद इसलिए कि दिल जानता है—कुछ शरारतें सुधर जाने के लिए नहीं होतीं, उन्हें तो उम्र भर याद रखने के लिए बनाया जाता है।
इसलिए...
तुम यूँ ही मेरी बात काटती रहना, यूँ ही बिना वजह मुस्कुराकर मुझे उलझाती रहना, यूँ ही मेरी ख़ामोशियों में अपनी शरारतों के छोटे-छोटे रंग घोलती रहना।
क्योंकि मोहब्बत हमेशा बड़े वादों से नहीं जीती जाती, कभी-कभी वह सिर्फ़ किसी की प्यारी-सी शरारतों के सहारे पूरी उम्र मुस्कुराती रहती है।
— मुकेश
Comments
Post a Comment