चिंतन - जो यह सब जानता है, क्या मैं उसे जानता हूँ?

 चिंतन - जो यह सब जानता है, क्या मैं उसे जानता हूँ?

मनुष्य संसार को जानने में अपना पूरा जीवन लगा देता है।

वह भाषाएँ सीखता है।

शास्त्र पढ़ता है।

विज्ञान का अध्ययन करता है।

इतिहास, दर्शन, कला, मनोविज्ञान—

ज्ञान की कोई सीमा नहीं।

पर एक क्षण ऐसा भी आता है,

जब समस्त ज्ञान के बीच एक अद्भुत प्रश्न उठ खड़ा होता है—

"जो यह सब जानता है, क्या मैं उसे जानता हूँ?"

यही वह क्षण है,

जहाँ दर्शन समाप्त नहीं होता—

वह जन्म लेता है।

मैं जानता हूँ कि यह वृक्ष है।

यह नदी है।

यह आकाश है।

यह शरीर है।

यह विचार है।

यह स्मृति है।

यह सुख है।

यह दुःख है।

पर जो इन सबको जान रहा है,

वह कौन है?

क्या मैंने कभी उसे देखने का प्रयास किया है?

या मैं केवल उसके द्वारा देखी गई वस्तुओं में ही उलझा रहा?

मुझे लगता है कि मनुष्य की सबसे बड़ी विस्मृति यही है।

वह दर्पण में दिखाई देने वाले चेहरे को जानता है,

पर दर्पण में देखने वाले को नहीं।

वह अपने विचारों से परिचित है,

पर विचारों के साक्षी से नहीं।

वह अपनी भावनाओं को पहचानता है,

पर उन भावनाओं को आते-जाते देखने वाली चेतना से नहीं।

भारतीय उपनिषदों की समूची यात्रा इसी प्रश्न के इर्द-गिर्द घूमती है।

"द्रष्टा कौन है?"

"ज्ञाता कौन है?"

"श्रुति को सुनने वाला कौन है?"

केनोपनिषद् पूछता है—

"जिससे मन सोचता है, उसे मन कैसे सोचे?"

"जिससे आँख देखती है, उसे आँख कैसे देखे?"

यहीं भाषा रुकने लगती है।

क्योंकि ज्ञाता कभी ज्ञेय नहीं बन सकता।

आँख सबको देख सकती है,

पर स्वयं को देखने के लिए उसे दर्पण चाहिए।

चेतना का दर्पण मौन है।

जब विचार थोड़ी देर के लिए शांत हो जाते हैं,

जब इच्छाएँ थोड़ी देर के लिए थम जाती हैं,

जब 'मैं' की सारी परिभाषाएँ ढीली पड़ने लगती हैं,

तब भीतर एक ऐसी उपस्थिति का आभास होता है,

जो कभी बदलती नहीं।

बचपन में भी वही थी।

यौवन में भी वही है।

वृद्धावस्था में भी वही रहेगी।

शरीर बदल गया।

विचार बदल गए।

विश्वास बदल गए।

संबंध बदल गए।

पर जो इन सब परिवर्तनों का साक्षी रहा,

क्या मैंने कभी उसकी ओर देखा?

मुझे कभी-कभी लगता है कि आत्मज्ञान कोई नई वस्तु प्राप्त करना नहीं है।

वह उस ज्ञाता की ओर लौटना है,

जिसे हम जीवन भर सबसे निकट होकर भी सबसे अधिक अनदेखा करते रहे।

अंततः मनुष्य का अंतिम प्रश्न बाहर नहीं होता।

वह भीतर लौट आता है।

वह पूछता है—

"मैंने बहुत कुछ जाना।"

"पर जो जान रहा था..."

"क्या मैं उसे जान पाया?"

और शायद,

यही वह प्रश्न है,

जिसके बाद उत्तर शब्दों में नहीं मिलते।

वे केवल अनुभव में प्रकट होते हैं।

तभी लगता है—

जो यह सब जानता है, क्या मैं उसे जानता हूँ?

यदि इस प्रश्न ने एक बार भी भीतर सचमुच जन्म ले लिया,

तो समझिए—

दर्शन पढ़ना समाप्त हुआ,

दर्शन जीना आरंभ हो गया।

— मुकेश

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