हम, तुम और प्रतीक्षा

 हम, तुम और प्रतीक्षा

कभी-कभी मुझे लगता है कि हमारे बीच सबसे जीवित चीज़ मुलाक़ातें नहीं हैं।

वह प्रतीक्षा है।

तुम्हारा इंतज़ार करते-करते

मैंने जाना,

इंतज़ार किसी के आने का नाम नहीं,

किसी के लिए अपने भीतर जगह बचाए रखने का नाम है।

अजीब है...

तुम्हारे आने से ज़्यादा

तुम्हारे आने की उम्मीद ने

मुझे बदल दिया।

पहले मैं वक़्त देखता था।

अब मैं एहसास देखता हूँ।

घड़ी की सुइयाँ

अपनी चाल चलती रहती हैं,

लेकिन प्रेम...

वह किसी एक लम्हे पर

घंटों बैठा रह सकता है।

तुम्हें शायद कभी पता भी न चला हो,

कि कितनी बार

मैंने दरवाज़ा नहीं,

अपने दिल को खोला था।

कितनी बार

कदमों की आहट

तुम्हारी नहीं थी,

फिर भी

मैं मुस्कुरा दिया।

क्योंकि प्रेम

पहचान से पहले

विश्वास करता है।

लोग कहते हैं,

इंतज़ार थका देता है।

मुझे नहीं लगता।

थकान

उस दिन होती है,

जिस दिन

उम्मीद चली जाती है।

जब तक

किसी के आने की

हल्की-सी भी रौशनी बची रहती है,

दिल

अपने दरवाज़े बंद नहीं करता।

अगर कभी

तुम सचमुच आ गए,

तो शायद

मैं सबसे पहले

तुम्हें नहीं देखूँगा।

मैं देखूँगा

उस प्रतीक्षा को,

जो इतने बरसों से

चुपचाप

मेरे भीतर बैठी थी।

और उससे कहूँगा—

अब तुम भी

थोड़ा आराम कर लो।

मुकेश

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