ठिठका हुआ चाँद, ठहरा हुआ समंदर

बैठे ठाले की तरंग ---------------------
ठिठका हुआ चाँद, ठहरा हुआ  समंदर
हर तरफ देखूं आज,सहमा हुआ मंज़र
क्या हाल बयाँ करूं, अब इस शहर का
ये टूटी हुई मस्जिद, ये टूटा हुआ मंदर
बस  इक  जिश्म ही रह गया है साबुत
वरना है रेज़ा रेज़ा बिखरा हुआ अन्दर

मुकेश इलाहाबादी ----------------------

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