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Wednesday, 20 May 2026

नीत्शे का अकेलापन — (गद्यात्मक फिक्शन)

 नीत्शे का अकेलापन — (गद्यात्मक फिक्शन)

वह आदमी बहुत ऊँचा सोचता था, लेकिन उसके विचारों की ऊँचाई पर कोई साथ खड़ा नहीं था।

शहर उसके आसपास था, पर वह शहर के भीतर नहीं था।

लोग उसे सुनते थे, पर समझने से पहले ही थक जाते थे।

और वह बोलता था, पर जैसे अपने ही भीतर किसी खाली सभागार में।

उसके शब्द सरल नहीं थे, लेकिन कठिन भी नहीं थे —

वे उस जगह के थे जहाँ अर्थ अभी जन्म ले रहा होता है।

वह अक्सर अकेला चलता था।

अकेलापन उसके लिए परिस्थिति नहीं था, वह एक दृष्टि बन चुका था।

वह भीड़ में भी था और भीड़ से बाहर भी।

कभी-कभी वह हँसता था, पर उसकी हँसी में हल्कापन नहीं होता था।

वह हँसी किसी पुराने सत्य के टूटने की आवाज़ जैसी लगती थी।

उसने कहा था — “ईश्वर मर चुका है।”

पर लोग यह समझ नहीं पाए कि यह किसी ईश्वर के अंत की घोषणा नहीं थी,

बल्कि मनुष्य के भीतर एक बड़े खालीपन की शुरुआत थी।

वह रिश्तों में भी था, पर पूरी तरह नहीं।

वह प्रेम को भी एक प्रश्न की तरह देखता था 

जिसका उत्तर देना जरूरी नहीं, केवल सहना जरूरी है।

कभी-कभी लगता था कि वह स्वयं अपने विचारों से डरता नहीं,

बल्कि उनके अकेलेपन से डरता है।

और फिर भी वह चलता रहा 

न किसी मंज़िल की ओर,

न किसी वापसी की ओर।

बस उस जगह की ओर जहाँ विचार अपने सबसे अकेले रूप में खड़े होते हैं,

और उन्हें सुनने वाला कोई नहीं होता।

मुकेश' ,,,,,,,,,,,,,

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