काफ्का का डर — (गद्यात्मक फिक्शन)
वह आदमी रोज़ सुबह उठता था, लेकिन जागना हमेशा पूरी तरह नहीं होता था।
जैसे नींद और वास्तविकता के बीच कोई तीसरा कमरा हो, जिसमें वह अक्सर फँसा रह जाता था।
उसके चारों ओर दुनिया सामान्य थी, लेकिन उसके लिए सामान्यता हमेशा थोड़ी असामान्य लगती थी।
वह किसी नियम को तोड़ता नहीं था, फिर भी हर नियम उसके भीतर जाकर बदल जाता था।
और उसे पता भी नहीं चलता था कि उसने कुछ गलत किया है या सिर्फ़ मौजूद है।
एक दिन उसने पाया कि उसका नाम कागज़ों में थोड़ा बदल गया है।
पहले यह छोटी-सी गलती लगी।
फिर वह गलती नहीं रही — वह व्यवस्था बन गई।
वह पूछता था, लेकिन जवाब किसी ऐसे स्थान से आते थे जहाँ प्रश्न पहले से दर्ज नहीं थे।
धीरे-धीरे उसे समझ में आने लगा कि उसके होने का प्रमाण हमेशा अधूरा है।
जैसे वह किसी प्रक्रिया का हिस्सा है, पर पूरी प्रक्रिया उसके खिलाफ काम कर रही हो।
लोग उसे देखते थे, पर पहचानते नहीं थे।
या शायद पहचानते थे, लेकिन स्वीकार नहीं करते थे।
उसके भीतर डर नहीं था, बल्कि डर का एक स्थायी वातावरण था
जैसे हवा नहीं, दबाव सांस ले रहा हो।
कभी-कभी उसे लगता था कि वह किसी आरोप में नहीं है,
बल्कि आरोप ही उसका रूप ले चुका है।
और फिर भी वह हर दिन उसी तरह चलता रहा
न किसी दोष के प्रमाण की ओर,
न किसी निर्दोषता की पुष्टि की ओर।
बस उस भूलभुलैया में,
जहाँ रास्ते बदलते नहीं,
सिर्फ़ उन्हें चलने वाला बदल जाता है।
मुकेश ,,,,,,,,
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