रिश्ता जो टूटा नहीं”
छूटकर भी वो रिश्ता तो टूटा नहीं,
बस हाथों की गर्माहट उँगलियों से उतरकर
याद की रगों में बस गई है।
अब हम साथ नहीं चलते,
मगर रास्ते
अजीब तरह से एक-दूसरे की ख़बर रखते हैं।
मैं जिस मोड़ से गुज़रता हूँ,
वहाँ तेरे क़दमों की आहट पहले से रखी मिलती है।
छूटकर भी वो रिश्ता तो टूटा नहीं,
वो बस नाम बदलकर
“ख़ामोशी” हो गया है
और ख़ामोशी, तुम जानती हो,
सबसे ऊँची आवाज़ होती है।
हमने जो बातें कभी पूरी नहीं कीं,
वो अब हवा में तैरती हैं—
जैसे शाम के धुंधलके में
कोई अधूरी रौशनी,
जो बुझती भी नहीं,
जलती भी नहीं
बस रहती है।
कभी-कभी
मैं आईने में ख़ुद को देखता हूँ,
तो लगता है
तुम्हारी नज़र
अब भी मेरी आँखों के पीछे कहीं ठहरी है।
छूटकर भी वो रिश्ता तो टूटा नहीं,
वो बस ज़िम्मेदारियों की भीड़ में
अपनी जगह बदल गया है
दिल के किसी कोने में
जहाँ अब कोई दावा नहीं,
सिर्फ़ एक सच्चाई है।
न कोई शिकवा,
न कोई गिला
बस एक सलीक़ा है जीने का,
जिसमें तुम शामिल हो
बिना साथ हुए भी।
और शायद
यही उस रिश्ते की असली उम्र है
जो ख़त्म नहीं होता,
बस अपने होने का ढंग बदलता रहता है।
मुकेश ,,,,,,,,,
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