तुझसे बिछड़ के दिल को करार कम न हुआ,
खामोशियों में तेरी ही आवाज़ बढ़ गई।
छूटे जो हाथ, रिश्ता कहीं टूटा ही नहीं,
दूरी मिली तो चाहत की ज़ात बढ़ गई।
तन्हा हुए तो खुद से मुलाक़ात हो गई,
तेरे बिना भी जीने की औक़ात बढ़ गई।
माना कि अब वो साथ का मौसम नहीं रहा,
पर याद की हर एक बरसात बढ़ गई।
आज़ाद कर दिया तुझे दिल की कैद से,
फिर भी तेरी ही चाह में जज़्बात बढ़ गई।
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