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Monday, 4 May 2026

जो लफ़्ज़ों में ढलना था, ढल न पाया,

 जो लफ़्ज़ों में ढलना था, ढल न पाया,

वो एहसास दिल में ठहर-सा गया है।

मेरे ख़्वाब का हर रंग फीका पड़ा है,

मेरे सामने सब बिखर-सा गया है।


तेरी याद की धूप में जलते-जलते,

मेरा साया मुझसे सिहर-सा गया है।

कभी जो था दिल में उजालों का मौसम,

वही आज भीतर उभर-सा गया है।

मैं ख़ामोश रहकर भी कहता रहा हूँ,

मगर हर इशारा ही गुज़र-सा गया है।

ये दुनिया, ये रिश्ते, ये चेहरे सभी कुछ,

मेरी आँख में बस निखर-सा गया है।

'मुकेश' अपने दिल की कहानी अजब है,

कहते-कहते भी बिखर-सा गया है।

मुकेश ,,,,,,,

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