जो लफ़्ज़ों में ढलना था, ढल न पाया,
वो एहसास दिल में ठहर-सा गया है।
मेरे ख़्वाब का हर रंग फीका पड़ा है,
मेरे सामने सब बिखर-सा गया है।
तेरी याद की धूप में जलते-जलते,
मेरा साया मुझसे सिहर-सा गया है।
कभी जो था दिल में उजालों का मौसम,
वही आज भीतर उभर-सा गया है।
मैं ख़ामोश रहकर भी कहता रहा हूँ,
मगर हर इशारा ही गुज़र-सा गया है।
ये दुनिया, ये रिश्ते, ये चेहरे सभी कुछ,
मेरी आँख में बस निखर-सा गया है।
'मुकेश' अपने दिल की कहानी अजब है,
कहते-कहते भी बिखर-सा गया है।
मुकेश ,,,,,,,
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