“जो बचा रह गया”
अब मेरे भीतर
बहुत कम शोर बचा है।
जैसे किसी पुराने मकान में
सारे लोग जा चुके हों,
और सिर्फ़
दीवारों की सीलन
रह गई हो।
मैं पहले
हर रिश्ते को
आख़िरी सच समझता था,
हर मुस्कुराहट में
वफ़ा ढूँढ़ता था,
हर हाथ में
अपना हाथ।
मगर अब
लोग मिलते हैं
तो मैं उनके लफ़्ज़ नहीं,
उनकी ख़ामोशियाँ सुनता हूँ।
क्योंकि मैंने देखा है
आदमी
झूठ बोलते वक़्त
आँखों से ज़्यादा
आवाज़ बदलता है।
अब किसी से शिकायत नहीं होती,
बस एक थकान-सी रहती है
जो शाम ढले
मेरे कंधों पर उतर आती है।
कभी-कभी
मैं देर रात तक जागता हूँ
और सोचता हूँ
आख़िर
हम अपने ही लोगों से
इतना दूर कैसे हो जाते हैं?
कैसे
एक दिन वही आवाज़
जिसके बिना नींद नहीं आती थी,
सिर्फ़ एक याद बन जाती है?
मेरे कमरे में
अब भी कुछ चीज़ें
तुम्हारी तरह बाकी हैं—
एक आधी पढ़ी किताब,
कुछ सूखे फूल,
और खिड़की पर ठहरी हुई
उदास धूप।
मैंने उन्हें हटाया नहीं।
शायद
इंसान मोहब्बत को नहीं,
उसकी आदत को
सबसे ज़्यादा याद करता है।
अब मैं कम बोलता हूँ,
कम हँसता हूँ,
कम यक़ीन करता हूँ।
मगर अजीब बात ये है
इतना सब खोने के बाद भी
मेरे अंदर
अब भी कोई हिस्सा
तुम्हारा इंतज़ार करता है।
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