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Thursday, 14 May 2026

पहला तमाशा

 पहला तमाशा

शायद

इस पूरी दुनिया का पहला तमाशा

ईश्वर खुद है।


वही

जो दिखाई नहीं देता,

फिर भी

हर जगह मौजूद बताया जाता है।


जिसके नाम पर

सदियों से

युद्ध भी हुए,

मंदिर भी बने,

और अकेले आदमी ने

अँधेरे कमरों में

रो-रोकर प्रार्थनाएँ भी कीं।


वह चुपचाप देखता रहा

राजाओं को मरते हुए,

सभ्यताओं को मिट्टी बनते हुए,

प्रेम को नफ़रत में बदलते हुए।


कभी-कभी लगता है

ईश्वर कोई सत्ता नहीं,

बल्कि

एक विराट दर्शक है

जो इस पूरे ब्रह्मांड को

एक अनंत नाटक की तरह देख रहा है।


हम जन्म लेते हैं,

भागते हैं,

लड़ते हैं,

कमाते हैं,

प्रेम करते हैं,

घृणा करते हैं,

और फिर

धीरे-धीरे मिट्टी में बदल जाते हैं।


मगर

उसकी आँखों में

शायद कोई हैरानी नहीं होती।


क्योंकि

जिसे हम त्रासदी कहते हैं,

वह शायद

उसकी दृष्टि में

सिर्फ़ एक क्षण हो।


हम मंदिरों में

घंटियाँ बजाकर

उसे जगाना चाहते हैं,

जबकि संभव है

वह कभी सोया ही न हो।


या शायद

वह हमारी तरह

किसी पक्ष में नहीं है।


न अच्छे के,

न बुरे के।


वह बस देख रहा है

कि मनुष्य

अपनी इच्छाओं,

अपने भय,

अपने अहंकार

और अपने अकेलेपन से

कैसे-कैसे संसार बना लेता है।


आज के समय में तो

ईश्वर भी अजीब दुविधा में होगा।


लोग

प्रार्थना कम,

प्रदर्शन ज़्यादा करते हैं।


भक्ति भी अब

रील्स में संपादित होकर आती है।

धर्म भी

हैशटैग लेकर चलता है।


हर आदमी

अपने ईश्वर को

दूसरे के ईश्वर से बड़ा साबित करने में लगा है।


और ईश्वर

शायद मुस्कराकर देख रहा है

कि जिन्हें मैंने

प्रेम सिखाने भेजा था,

वे मेरे नाम पर

घृणा का व्यापार कर रहे हैं।


कभी-कभी मैं सोचता हूँ

यदि ईश्वर सचमुच है,

तो वह सबसे ज़्यादा

मंदिरों में नहीं,

बल्कि

उन क्षणों में होगा

जहाँ कोई आदमी

बिना कैमरे के

किसी रोते हुए आदमी का हाथ पकड़ता है।


बाक़ी सब

बहुत संभव है

सिर्फ़ मंच-सज्जा हो।


और इस विराट रंगमंच पर

जहाँ ग्रह, नक्षत्र, युद्ध, प्रेम, राजनीति,

सभ्यताएँ और स्क्रीनें

सब अपनी-अपनी भूमिकाएँ निभा रही हैं


ईश्वर

शायद

पहला तमाशा है।


मुकेश ,,,,,,,

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